Updated 28th November 2007
What follows is a transcription of the Hindi text of 'Amrita-Kana' - a collection of quotations of Shankaracharya Swami Brahmananda Saraswati (1870-1953). Having been passed the book by Swami SuryaSatyanand, allegedly a direct disciple of Gurudeva, I feel it is only right to begin work on a translation of Gurudeva's words. Initially I have created a copy in 'Itrans' which, with the use of 'Itranslator 99' or 'Itranslator 2003' (free programs available on the net), can be reformatted directly into Devanagari script! I am also working to compile a dictionary to use alongside Gurudeva's quotations. As I work on the Guru Dev Hindi-English Dictionary, I can debug the likely typos from the Itrans [beta] version. I offer this text file AKfull.txt in the spirit of research.
Jaya Gurudeva
जय गुरुदेव
Paul Mason
http://www.paulmason.info/

卐 श्री शङ्कराचार्योंविजयतेतराम् 卐
अमृत
- कणअनन्त श्री विभूषित जगद्गुरु भगवान श्री शङ्कराचार्य
श्री मज्जोतिष्पीठाधीश्वर
स्वामी श्री ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज
ज्योतिर्मठ
- बदरिकाश्रमके आर्ष वचनों का संग्रह
बालब्रह्मचारी श्री महेशजी
श्री शंकराचार्य उपदेश माला
- १अमृत
- कणअनन्त श्री विभूषित जगद्गुरु भगवान् शङ्कराचार्य
श्री मज्ज्योतिष्पीठीश्वर
स्वामी श्री ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज
ज्योतिर्मठ
- बदरिकाश्रमके आर्ष वचनों का संग्रह
बालब्रह्मचारी श्री महेशजी
मूल्य
- 15 रुपये मात्रप्रकाशक
:-प्रथमबार सं। २००९
द्वितीयबार सं। २०३५
--
सर्वाघिकार
- सुरक्षित--
मूल्य ३
-५० ) सजिल्द ५ ) रु।मुद्रक
श्री वैष्णव प्रेस
दारागंज
श्री हरिः
प्रकाशकीय वक्तव्य
प्रातः स्मरणीय धर्मसम्राट अनन्त श्री समलङ्कृत साक्षात् शंकर स्वरूप भगवान् जगद्गुरु श्री शंकराचार्य ज्योतिष्पीठोद्धारक स्वामी श्रीमद् ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम के उपदेशों का प्रकाशन सहज सुबोध भाषा में
, वेद वेदान्त सिद्धान्त सार स्वरूप ब्रह्मविध्या का ही प्रकाशन है।वर्तमान् समय शास्त्र के सिद्धान्त को महापुरुषों के वाक्यों द्वारा सामान्य जन की भाषा एवं राष्ट्रभाषा का पद प्राप्त हिन्दी भाषा में प्रकाशित कर जन समुदाय तक पहुँचाना प्रकाशन का सबसे बड़ा कार्य जनहित में है। आज समय की माँग है धार्मिक प्रकाशन शंका रहित एवं प्रमाण युक्त शास्त्र एवं तर्क सम्मत होना चाहिए। प्रस्तुत ग्रन्थ भगवत्पूज्यपाद् जगद्गुरु श्री शङ्कराचार्यं ब्रह्मलीन श्री स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज के मङ्गलमय सर्वजन हितकारी उपदेशों के साथ
- साथ गीता , उपनिषद् ब्रह्मसूत्र , शास्त्र पुरणादि प्रामाणिक धर्मग्रन्थों का सार स्वरूप में प्रकाशित किया जाता है। जिसके द्वारा समाज अपनी शङ्काओं का इसे पढ़कर स्वतः निराकरण करके असन्दिग्ध होकर परमोज्ज्वल सर्व हितैषी सिद्धान्तों से लाभ उठा सके।श्री शङ्कराचार्य उपदेशामृत माला का प्रथम पुष्प अमृत कण प्रथम संस्करण सम्वत २००६ में श्री शङ्कराचार्य उपदेश कार्यालय लखनू से स्वर्गीय मदनेश जी शुक्ल द्वारा प्रकाशित किया गया था। जो इस समय अप्राप्य हो चुका था। परन्तु ब्रह्मलीन आचार्य चरणानुरागी भक्तों के माँग के कारण उसका पुनः प्रकाशन किया जा रहा है। अमृत कण
(आ)
में सत्यतः ब्रह्मलीन आचार्य चरणों के उपदेशों का अमृत कण ही ब्रह्मचारी महेश जी द्वारा संचय किया गया है। इसका प्रत्येक कण जीवत्व से अमरतत्व प्राप्त कराने वाला हैं। हो इसका पठन
- पाठन मनन एवं आचरण करेगा वह अपने दुःखादि की निवृत्ति करके आत्मनिष्ठता को प्राप्त करेगा ऐसा पूर्ण विश्वास है।ब्रह्मलीन गुरुदेव ज्योतिष्पीठोद्वारक जगद्गुरु श्री शङ्कराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज के प्राचीन उपदेशों का संग्रह दो भागों में श्री
" शङ्कराचार्य उपदेशामृत " नामक पुस्तक का दो संस्करण समाप्त हो चुका है वह शीघ्र ही तृतीय संस्करण के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है एवं ज्योतिष्पीठोद्वारक नामक पुस्तक जिसमें ब्रह्मलीन गुरुदेव भगवान् का संक्षिप्त जीवन चरित्र है का प्रथम संस्करण समाप्त है पुनः उसके द्वितीय संस्करण का प्रकाशन किया जा रहा है।श्री ज्योतिष्पीठ संरक्षक वरिष्ठ जगद्गुरु श्रीशङ्कराचार्य श्रीमद् स्वामी शान्तानन्द सरस्वती जी महाराज के उपदेशों का संग्रह श्री शङ्कराचार्य उपदेशामृत के स्वरूप में आगामी शीघ्र समय में प्रकाशित करने का संकल्प है भगवान् इस संकल्प को पूर्ण करें ऐसी भगवत् पूज्यपाद श्री गुरुदेव भगवान् के चरणों में प्रार्थना है।
प्रस्तुत ग्रन्थ
" अमृत कण " का संग्रह ब्रह्मचारी महेश जी द्वारा किया गया। आज गुरुदेव भगवान् की जस पताका को समग्र विश्व में फहराते हुए स्वतः महर्षि पद प्राप्त कर वर्तमान् में भावातीत ध्यान एक वैज्ञानिक ध्यान प्रकृया का प्रचालन कर रहे हैं , यह श्री गुरुदेव कृपा का प्रत्यक्ष प्रमाण है। हमारी मंगल कामना है कि श्री गुरुदेव भगवान् की कृपा से अपने सत्कार्य में अग्रसरित होते रहें।द्वितीय संस्करण के प्रकाशकीय वक्तव्य में अधिक न लिखकर भगवत् पूज्यवाद् गुरुदेव निवर्तमान् शङ्कराचार्य स्वामी शान्तानन्द सरस्वती जी महाराज की कृपा एवं अभिनव शङ्कराचार्य श्री स्वामी विष्णुदेवानन्द
(इ)
सरस्वती जी महाराज की प्रेरणा का आभारी हूँ जिसने
" अमृत कण " के प्रकाशन कार्य में प्रवृत्त किया। आशा है जन समाज इसका पठन - पाठन कर अपने सुख दुःख निबृत्ति कर अन्त में अपने स्वरूप स्थिति लाभ प्राप्त करेंगे ऐसी गुरुदेव भगवान् के चरणो में प्रार्थना है।गीता जयन्ती
सम्वत २०३५
ब्रह्मचारी सोमनाथ
पुराण
-
(क)
प्राक्कथन
भगवान् शङ्कर को जटाओं से होकर आई हुई सुरसरी भागीरथी के पुण्यप्रवाह के कण
- कण में जैसे शीतलता , मधुरता , पवित्रता और महापाप् नाशिनी शक्ति स्वभाव से ही विध्यमान् रहती है , उसी प्रकार शङ्कर स्वरूप भगवान् शङ्कराचार्य श्रीमुख से निस्सृत वाणी के सुर - सुरी प्रवाह के कण - कण में शीतलता सरसता मधुरता के साथ - साथ सन्ताप - हारणी कलिमल - नाशिनी महाशक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव होता है। जिसने इस सुधा - धारा के दुकूल में बैठकर इससे संस्पृष्ट वायु का भी सेवन किया है , वह इसके सौगन्ध - सौरस्य - मधुर्य में झूमकर मस्त हो उठा है।भगवान् शङ्कराचार्य के उपदेशामृत
- वर्षा का एक - एक बंद मुमुक्षु चातक के लिये स्वाती का अलभ्य बूंद है और बुभुक्षु - संसारी के लिये है भवसागर में डूब जाने से बचाने वाला सबल संबल। इसके कण - कण का यश वैभव गौरव गुणगान गाकर नहीं , लिख पढ़ कर नहीं , कह सुनकर नहीं , स्वयं अनुभव करके ही जाना जा सकता है। पाठकों के जीवन रस में मिलकर ये अमृत कण अपनी महती उपादेयता का स्वयं अनुभव करायेंगे।इनकी महत्ता पर्वंतराज हिमालय की महामहिम महिमा से ऊपर स्थित है और इनकी सूक्ष्मता सूक्ष्म आकाशादि तत्वों से परे सूक्ष्माति सूक्ष्मतम परब्रह्म सत्ता की सुक्ष्मता का उद्घाटन करने वाली है।
अणोरणीयान् महतोमहीयान् का रहस्य खोलने वाले इन उपदेशामृत कणों की महिमा अवर्णनीय है। ऐसे अवर्णनीय
- महिमागार - सुधारस - सार - श्रुतिसार रूप यह उपदेशामृत- कण - संचय सर्वावस्था में सर्वोपयोगी
(ख)
सिद्ध होगा
- हिमालय की एकाकी कन्दराओं में समाधिस्थ साधकों को नित्य - समाधि की भूमिका में पहुँचाने के लिये , और संसार के कोलाहलपूर्ण वातावरण में अहर्निश निवास करने वाले मनुष्यों को प्रत्येक परिस्थिति में सुख शान्ति का अनुभव कराने के लिये ये कण अमोघ मन्त्र रूप सिद्ध होंगे।व्यवहार
- परमार्थ - साधक , सुत्र - रूप मन्त्र - रूप इन उपदेशामृत कणों की महिमा इसलिये महान है कि ये आप्त - काम , पूर्णकाम , परमनिष्काम अमलात्मान्तःकरण के स्वाभाविक उद्गार हैं। जिस ऋतम्भरा प्रज्ञा में स्थित होकर मन्त्रद्रष्टा महर्षियों ने अपौरुषेय वेद का प्रकाश पाया और उसका यथार्थ भाव शास्त्रों द्वारा व्यक्त किया , जिस ऋतम्भरा में स्थित होकर दैवी जगत् की कृपा प्राप्त करने के लिये उपयोगी मन्त्र शास्त्र का निर्माण हुआ , और जिस ऋतम्भरा में स्थित होकर ब्रह्माण्ड के समस्त पदार्थां का ज्ञान करामलकवत् प्रत्यक्ष कर लिया है , वही बुद्धि की विशुद्ध सत्वप्रधानावस्था ऋतम्भरा प्रज्ञा इन उपदेशामृत - कणों का उद्गम केन्द्र है ; यही इनके सर्वकल्याणकारी एवं अनन्त महिमावान होने का प्रधान कारण है।भूमि से बाहर आये हुए अंकुर के द्वारा जिस प्रकार भूमि की उर्वंरता का पता चलता है
, उसी प्रकार मुख से बाहर आये हुए शब्दों के द्वारा व्यक्तित्व की शक्ति पर निर्भर रहती है। शुद्ध संस्कृत निर्मलान्तःकरण पुरुषों द्वारा प्रोच्चारित मन्त्रों का विलक्षण प्रभाव देख जाता है ; और वही मन्त्र जब अशुद्ध असंस्कृत मलिनान्तःकरण वाले मनुष्यों द्वारा उच्चरित होते हैं तो उनका प्रभाव कुछ भी नहीं रह जाता यह प्रत्यक्ष बात है -श्री भगवान् शंकराचार्य के शब्दों में जो विलक्षण ओज तेज गम्भीरता हृदयमार्मिकता और विचित्र आकर्षक है वह उनके व्यक्तित्व की अन्तरिक
(ग)
महत्ता का ध्योतक है और उनके अखण्ड ब्रह्मचर्य से सम्पुटित महान तप योग एवं ज्ञान निष्ठ का परिचायक है।
जिन्हें श्रीचरण के उपदेश सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है वे जानते हैं कि उनका एक
- एक वाक्य कितना प्रभावशाली होता है। प्रत्येक शब्द इतना मधुर और इतना चित्ताकर्षक होता है कि ऐसा लगता है कि बस , भगवान बोलते रहें और हम सुनते रहें। सभी चाहते हैं कि जितनी देर हो सके इनके समीप बैठने को मिल जाय , कुछ बात करने का अवसर मिल जाय ; और हमें अपनी कहने का समय न मिले तो यही बोलते रहें और हम सुनते रहें - ऐसी ही इच्छा सबकी रहती है। साधारण से साधारण और बड़े से बड़े बुद्धिजीवी विश्व के प्रख्यात दार्शनिकों तक का ऐसा ही अनुभव है -भारतीय दर्शन परिषद की रजत जयन्ती के अवसर पर दिसम्बर १९५० में कल्कत्ता में एकत्रित हुए विश्व के दार्शनिक महारथियों ने जब सभा में महाराज श्री का उपदेश सुना तब उनसे एकान्त में मिलने की इच्छा प्रकट की और भारत के सर्वमान्य दार्शनिक शिरोमणि डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन
( जो उस समय मास्को , रूस में भारतीय राजदूत थे और अब भारत के उपराष्ट्रपति हैं ) को आगे करके अमेरिका के प्रसिद्ध दार्शनिक डा। कांगर और डा। शिल्प एक दिन रात्रि में लगभग दस बजे श्री शंकराचार्य शिविर चमड़िया कोठी लेकरोड ( कलकत्ता ) में आये।महाराज श्री ऊपर के छत में विराजे हुए थे
, कोई प्रकाश नहीं था ; छत से लगे हुए बड़े कमरे ' हाल ' की बिजली भी बुझी हुई थी। छत के बाहर चांदनी छिटकी थी। ओस से बचाव के लिये ऊपर कपड़ा तना था , उसी के नीचे महाराज श्री तख्त पर अँधेरे में बैठे थे। भीतर का हाल भली प्रकार सजा हुआ दिन में भव्य लगता था , उसी में नित्य महाराज श्री का उपदेश हुआ करता था ; किन्तु उस समय अँधेरे
(घ)
में ऐसा लगता था कि वह हाल एक बड़ी गुफा हो और उसके द्वार पर महाराज का आसन लगा हो। बाहर बड़े
- बड़े पेड़ों से घिरी हुई ' लेक ' ( झीलों ) का सुहावना दृश्य उस चाँदनी में रमणीय तपस्थली का अनुभव करा रहा था। ऐसा लग रहा था , मानो विन्ध्यगिरि की निर्जन रमणीय तपोभूमि - वेधक - की निस्तब्धता रमणीयता और निर्जनता में ही महाराज श्री विराजे हुए हैं। वेधक का तो जो वर्णन हमने सुना है , उस् समय वहाँ उसी का अनुभव हो रहा था। प्रकृति स्तब्ध थी , वाता - वरण शान्त था ; बाहर निज ज्योत्स्ना में खिला राकेश का शीतल शुभ्र प्रकाश था ; या कहें कि निर्मल नीरव निशि की स्तब्धता पर निशीथ का एकाधिपत्य था ; किन्तु उसका प्रभाव हमारी छत पर एक झिन्ने से कपड़े ने रोक रखा था।हमारे छत पर प्रकाश था
, किन्तु चन्द्रमा का प्रकाश नहीं था ; यह उसका प्रकाश था जिससे चन्द्रमा प्रकाशित होता है - अध्यात्मसूर्य जो सूर्य , चन्द्र , अग्नि को प्रकाश देता है , उसका विशुद्ध प्रकाश हमारी छत पर था। हमारे आसपास वह क्षेत्र था जिसके लिये श्रुति कहती है -न तत्र सूर्योभाति
न चन्द्रतारकम्।
नेमा विध्युतोभाति
कुतोऽयं मग्निः॥
['It is not lit by the light of the sun, nor by the light of the Moon, nor stars, nor by lightning nor by fire. Only through its Light do all the others shine.' (katha-upanishad, 2 - 2 - 15):
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्र तारकं
नैमा विद्युतो भान्ति कुतो
वास्तव में सूर्य
, चन्द्र , विध्युत आदि में जो प्रकाश है वह सूर्य , चन्द्र और विध्युत की सत्ता में नहीं है - इन सबका प्रकाशक सर्वाधिष्ठान शुद्ध - चैतन्य ब्रह्म ही है। इस सम्बन्ध में कठोपनिषत् में एक सुन्दर आख्यायिका आती है। कहा गया है कि -एक समय देवासुर संग्राम में देवताओं की विजय हुई तो उन्हें अहं
- भव हो गया। विजय का श्रेय लेने के लिये अग्नि , वायु आदि सभी देवता अपने - अपने पराक्रम का यशोगान करने लगे। देवताओं का इस
(ङ)
प्रकार अहंकर बढ़ा हुआ देखकर सर्वनियन्ता परमात्मा ने सोचा कि अहंकार तो पतन का हेतु होता है
; इसलिए देवताओं को पतन से बचाने के लिए इनका अहंकार चूर्ण कर देना आवश्यक है।जहाँ देवगण मिलकर अपनी
- अपनी विभूतिगाथा गा रहे थे वहीं आकाश में एक विचित्र आकृति वाला यक्ष उत्पन्न हो गया - देवताओं की दृष्टि उस पर गई वे निश्चय न कर सके कि यह क्या है। सोचा कि कहीं कोई दैत्य तो नहीं है। उसका पता लगाने के लिए सबने अग्निदेव से कहा कि आप बड़े ही पराक्रमशाली हैं , आप ही जाकर पता लगाईये कि यह कौन है और यहाँ इसके आने का क्या कारण है। अग्निदेव यक्ष के निकट गये। यक्ष ने पूछा कि तुम कौन हो ? अग्नि ने बड़े गर्व से कहा -- मैं अग्नि हूँ और ' जातवेदा ' नाम से जगत् में विख्यात हूँ। इस प्रकार गर्वीला उत्तर सुनकर यक्ष ने एक तिनका अग्नि के समाने रख दिया और कहा कि इसे जला दो। अग्नि ने बार - बार प्रयत्न किया , अपनी पूरी शक्ति लगा दी , पर वह तृण जला नहीं। अग्नि लज्जित होकर वापिस लौट आये तब देवताओं को बड़ा आश्चर्य हुआ।सब ने मिलकर वायु को प्रेरित किया
; कहा कि आप भी बड़े प्रभाव - शाली हैं , आप इसका पता अवश्य ही लगा लेंगे। वायुदेव यक्ष के निकट पहुँचे। यक्ष ने पूछा - तुम कौन है ? वायु ने कहा है - हम वायुदेव हैं। यक्ष ने पूछा - तुम्हारी क्या सामर्थ्य है ? वायु ने उत्तर दिया - मैं क्षण भर में समस्त भूमण्डल को यहाँ का वहाँ कर सकता हूँ ; चाहे जिसे चाहे जहाँ उड़ाकर फेक सकता हूँ। यक्ष ने वही तिनका वायु के सामने रख दिया और कहा - इसे उड़ा ले जाओ। वायु ने सरलता से उड़ाना चाहा , तिनका हिला तक नहीं , वायु ने अपना पूरा बल लगाया , पर तिनका उस स्थान से टसमस भी नहीं हुआ। वायु शिथिल होकर लौट आये।सब देवता बड़े विस्मय और भय में पड़ गये। सब ने मिलकर इन्द्र से कहा
- आप देवराज हैं , आप हम सब में बुद्धिमान् , यह कोई भयंकर
(च)
आपत्ति हम लोगों पर आ रही है
; कृपा करके युक्तिपूर्वक ढंग से पता लगवाइए कि यह क्या है। इन्द्र अपना पराक्रम बटोरकर यक्ष के समीप पहुँचे। यक्ष ने इनकी इतनी अवहेलना की कि वह इनसे बोला तक नहीं। और वहीं अन्तर्ध्यान हो गया। तब इन्द्र का अभिमान जाता रहा। उसने विनम्र होकर भगवती का ध्यान किया और प्रार्थना की। तब विध्यादेवी ने उमा के रूप में प्रकट होकर इन्द्र को समझाते हुए कहा -' यह यक्ष जो तुम लोगों के सामने प्रकट हुआ था वह सर्वनियन्ता परब्रह्म परमात्मा ही था ; उसी की सत्ता से समस्त जगत सत्तावान् है ; उसी की शक्ति से अग्नि , वायु आदि देवगण शक्तिमान होते हैं ; उसी के प्रकाश से सूर्य चन्द्र में प्रकाश है , उसी की शक्ति से ही आप लोग शक्तिमान् है ; यह जो आप लोगों की विजय हुई है वह उसी की विजय है। आप लोगों को अनावश्यक अहंकार हो गया था इसी हेतु से आपका दर्प - दलन करने के हेतु वह यक्ष के रूप में प्रकट हुआ था। आप लोगों को चाहिए कि जिसकी इच्छा के विरुद्ध एक तृण भी नहीं हिल सकता , जो सूर्य चन्द्र आदि सबको अपने प्रकाश से प्रकाशित कराता है उसी सर्वाधिष्ठान स्वप्रकाश परब्रह्म परमात्मा की ही प्रधानता मानें , व्यर्थ का अहंभाव अपने मन में न अन्ने दें।'
तात्पर्य यह कि सूर्य चन्द्र आदि का प्रकाश उसी स्वप्रकाश चिन्मय परब्रह्म परमात्मा का प्रकाश है
; स्वतः सूर्य चन्द्र में कोई प्रकाश नहीं। यही कारण है कि हमारी छत पर जहाँ उस सर्वप्रकाशक सर्वाधिष्ठान परब्रह्म सत्ता का प्रत्यक्ष प्रकाश था वहाँ चन्द्र - किरणों एक पतले से कपड़े के पार ही रुक गई थीं। लौकिक व्यवहार की दृष्ट से हमारे आस पास छत पर अँधेरा सा ही था किन्तु पारमार्थिक दृष्टि से छत प्रकाशित थी वहाँ गुरुदेव की उस चिरप्रदीप्त अध्यात्म ज्योति का पूर्णप्रकाश था जिसका माधुर्य समास्वादन करने के हेतु बड़े बड़े महामुनीन्द्र जन एकान्त का समाश्रयण करते हैं।(छ)
साधकगण अपनी एकान्त ध्यानस्थली में जिस अध्यात्म चन्द्रिका का माधुर्य रसास्वादन करते हुए उसमें विभोर होकर अपने को भूल जाते हैं वही
, ठीक वही , अनुभूति गुरुदेव के चरणसान्निध्य में , स्तब्ध निशा में , आंखें खोले हुए जाग्रत की पूर्णता में जब होती हैं तो वह अतुलित आनन्दमय अध्यात्म प्रवाह सर्वत्र भीतर बाहर ओतप्रोत होकर मानस मराल को विभोर कर देता है। निश्चय ही गुरु चरण सान्निध्न में वह अवस्था अपने को भूल जाने वाली समाधि की अवस्था से बहुगुणित विशिष्ट होती है। उस समय समाधि - सुख कोटिगुणित होकर जागृत में प्राप्त होता है , और वह होता है गुरुचरण कृपा से जीवन्मुक्ति का अनुभव जाग्रत में अविच्छित्रतया समाधि जनित सुखानुभूति ही तो जीवन्मुक्ति है जिसमें विभोर रह कर महात्मा जन ब्रह्म स्वरूप हो जाते हैं।उस समय छत पर एकान्त में गुरुसान्निध्य में बस यही अनुभूति थी
, अलौकिक आनन्द था , आल्हाद था , हृदय गद्गद था उछल रहा था प्रेम प्रेम समुद्र आनन्द समुद्र उमड़ रहा था , आत्मा की आनन्दमयिता मानो भीतर से उमड़ रही थी , और बाहर से गुरुदेव का मौनावलम्बन मय मधुमय प्यार समुद्र अथाह था , लहरें उसकी बाहर से छलक कर भीतर जा रही थीं , भीतर से टकराकर उमड़ कर फिर बाहर चरणों में पड़कर वहीं किलोल सी करने लग जाती थीं। लग रहा था कि हस्त पाद कर्णादि सभी इन्द्रियों के साथ मन बुद्धि सब उस आनन्द से भर उठे हैं , रोम रोम उस महानन्द आत्मानन्द ब्रह्मानन्द की अनुभूति से गद्गद हो उठा है। मानो उस अलक्ष्य अगोचर अव्यपदेश्य अतीन्द्रिय ब्रह्म सत्ता की सच्चिदानन्दमयिता ही गुरु कृपा कटाक्ष से इन्द्रियगम्य , मनोगम्य , बुद्धिगम्य होकर इन्द्रिय मन बुद्धि सबको एक साथ ही अनुभूत हो रही थी ; सम्पूर्ण सूक्ष्म स्थूल शरीर आनन्द विभोर था ; बस आनन्द था , आनन्दातिरेक था और थे सम्मुख समासीन सद्गुरुदेव।सामने बाहर झील की जल तरङ्गें किनारे से छपछपाती हुई सुप्त निद्रित दूब को मानो थपकियाँ देकर निर्मल चांदनी के शुभप्रकाश का
(ज)
आनन्द लेने के लिये जगा रहीं थीं
, और इधर गुरुदेव के श्री पद रख मणि गण ज्योति से देदीप्यमान उदीयमान प्रत्यक्ष अनुभूयमान परमार्थ - सूर्य की अध्यात्म तरंगें शिष्य के चिरसुप्त हृदय को धक्के लगा कर जगा रही थी ; नीद से वह जाग रहा था , उठ रहा था , भ्रम उसका मिट रहा था , सामने का कुहरा हट रहा था , लम्बा मार्ग शीघ्रता से पार हो रहा था , लक्ष्य दिखने लगा था , दिख रहा था सामने ही था किन्तु अभी उस तक पहुँचना बाकी था , किनारा आया नहीं था कि मांझी ने लंगर डाल दिया।गुरुदेव की उस महान कृपा का अनुभव करते रहने के लिये
, उस महदानन्द का कुछ समय तक समास्वादन करते रहने के लिये बड़ा भाग्य चाहिये। कुछ ही समय बीता होगा कि प्रारब्ध ने एक झटका दिया ; और उस अभिनव गुण्ठित अध्यात्म बीणा की मधुर झंकार सहसा बन्द हो गयी। द्वारपाल ने आकर कहा - डा। राधाकृष्णन जी के साथ इंग्लैंड और अमेरिका के दो दार्शनिक भगवान के दर्शनार्थ आये हैं।कहाँ उस अलभ्य अध्यात्म राज्य की अनन्तानन्दानुभूति और कहाँ द्वारपाल के ये शब्द
! मानो ऊपर पहाड़ गिर पड़ा हो ; असह्य वेदना हुई ; किन्तु अन्तःकरण जिस परम शान्ति स्वरूप अध्यात्म लहरी में निमग्न था उसने इस झटके को संभाल लिया - मन में भाव आया - अच्छा है , ये लोग दुनिया के माने हुये दार्शनिक हैं इनके आने पर महाराज का कुछ बौद्धिक चमत्कार होगा और अभी तक जो यहाँ 'यतो वाचो निवर्तन्ते' का वातावरण था वही अब शब्द बनकर व्यक्त होगा मन ने कहा - चलो अब इसका दूसरा रूप अनुभव करेंगे।पाठक ध्यान दें कि सद्गुरु सान्निध्य कितना आनन्ददायक होता है। किस प्रकार अपने आश्रित साधकों को गुरुजन भिन्न भिन्न रूप में अनुभव से कितने रूपान्तर भेद से उसका अनुभव कराकर साधक को निस्संदिग्ध बनाते हैं। सद्गुरु सानिध्य की यही महिमा है।
(झ)
आगन्तुकों की सूचना देकर द्वारपाल खड़ा था। लगभग एक मिनट बाद भगवान ने कहा यह कौन मिलने का समय है
! कोई समय तो दिया नहीं गया था !!इतना सुनते ही मै सतर्क गया
; ऐसा लगा कि महाराज कहते ही हैं कि ' कह दो नहीं मिलेंगे '। क्योंकि ऐसा प्रायः होता है कि ' यह कौन समय है मिलने का ' ' समय तो दिया नहीं गया था ' इन शब्दों के बाद यही शब्द निकलते हैं कि ' कह दो नहीं मिलेंगे '। न मिलने के शब्द श्री मुख से निकलने के पहले ही मैंने धीरे से प्रार्थना रूप में कहा -भगवान उचित समझें तो दो चार मिनट दे दें
; दिन में इन लोगों को और लोग घेरे रहते होंगे , रात्रि में भगवान से एकान्त में मिल सकेंगे इसी लक्ष्य से आये होंगे। महाराज श्री ने कहा - अच्छा तो लिवा लाओ। इन लोगों के ऊपर आने पर हाल की एक बत्ती जला दी गई जिससे छत पर भी कुछ प्रकाश हो गया।दार्शनिकों ने देखा कि भारत का अध्यात्मनिष्ठ महात्म जिसने बाल्यकाल से अपना जीवन घन्घोर बन पर्वंतों की कन्दराओं और गुफाओं में बिताया था। आज अस्सी वर्ष की अवस्था में धर्म सिंहासन पर समासीन रहने पर भी अपने निजी समय में गुफाओं के जैसे अन्धकार में ही रहना पसन्द करते हैं।
आगे डा। राधाकृष्णन थे उनके पीछे डा। कांगर और उनके बगल में डा। शिल्प थे
; उनके पीछे एक दो बच्चे लोग भी थे ( जिनके यहाँ डा। राधाकृष्णन ठहरे हुए थे उन्हीं के लड़के लड़कियाँ )। महाराज श्री के तखत के सामने थोड़ी ही जगह थी ; सामने पादुका की चौकी रक्खी थी और उसके सामने एक कालीन पड़ा था। सब लोग एक के बाद एक प्रणाम करके सामने बैठे गये।महाराज श्री ने पूछा
- ' आप लोगों का परिचय 'डा। राधाकृष्णन ने
- डा। कांगर और डा। शिल्प का परिचय दिया और कहा भारत् में आप लोग पहली बार ही आये हैं। परिचय समाप्त
( ञ )
हुआ ही था डा। कांगर ने महाराज श्री की ओर देखते हुए कहा
We would like to hear something on Vedant. Would your Holiness help as in realisition?
डा। राधाकृष्णन ने महाराजा से कहा कि डा। कांगर वेदान्त के सम्बन्ध में कुछ सुनना चाहते हैं। तत्व दर्शन के लिए ये महाराज की सहायता चाहते हैं।
महाराज श्री ने कहा
- वेदान्त प्रतिपाध्य तत्व तो स्वतः सिद्ध पदार्थ है ; वह स्वयं प्रकाश है उसको प्रकाशित करने के लिये अन्य किसी के महयोग की आवश्यकता नहीं।डा। राधाकृष्णन ने इसका भाव अँग्रेजी में डा। कांगर को समझाया। इस पर डा। कांगर ने कहा
- वेद शास्त्र में जो तत्व प्राप्ति के साधन वर्णन किये गये हैं वे व्यर्थ तो नहीं कहें जा सकते ?महाराज श्री ने कहा
- साधन जो हैं वे ब्रह्म को प्रकाशित् करने के लिये नहीं हैं। उनका तात्पर्य केवल अविध्या की निवृत्त में हैं। साधन अविध्या का नाश करते हैं ब्रह्म का प्रकाश नहीं। जो स्वतः प्रकाश है उसको देखने के लिये किसी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं जैसे सूर्य स्वतः प्रकाशमान् है उसको देखने के लिए किसी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं। सूर्योदय के पहले अरुण का उदय होता है ; किन्तु अरुणोदय केवल रात्रि के अन्धकार को हटाता है , वह सूर्य को प्रकाशित नहीं करता ; सूर्य तो स्वयं प्रकाश है। जितने साधन हैं सब अविध्या को ही निवृत्ति करते हैं आत्मा का प्रकाश नहीं करते। आत्मा तो स्वतः प्रकाश है।अधनिशा के उस स्तब्ध प्रशान्त वातावरण में अरुणोदय के एक छोटे से उदाहरण से ब्रह्मविध्या का यह सैद्धान्तिक सारगर्भित उपदेश सुनकर डा। राधाकृष्णन गद्गद हो उठे। सहसा बोल पड़े
- ' कितनी सरलता से कितने गूढ़ प्रश्न को महाराज ने हल कर दिया। हम लोग महीनों मनन(ट)
करके इस पर दो घंटे बोलते फिर भी यह विषय इतना स्पष्ट न हों सकता। जितना महाराज ने दो मिनट में कर दिया।
महाराज श्री के उत्तर पर डा। राधाकृष्णन को गद्गद देखकर डा। कांगर की उत्सुकता बहुत बढ़ गई। उन्होंने डा। राधाकृष्णन से कहा
-आप तो उत्तर का आनन्द लेने लगे मालूम होता है
; महाराज ने क्या कहा है ? डा। राधाकृष्णन ने कहा - डा। कांगर ! जो महाराज ने कह है वह अनुभव करने की चीज है , इसी के किये गुरुओं के निकट रहा जाता है। यह कहकर महाराज श्री का उत्तर डा। राधाकृष्णन ने उनको अँग्रेजी में समझाया और अन्त में महाराज से कहा कि -' हम तो आजकल इधर राजनीतिक प्रपंच में फँस गये हैं , नहीं तो कुछ समय महाराज के समीप रहने योग्य है ; फिर भी हमारी ऐसी इच्छा है कि जब महाराज श्री ज्योतिमठ में हों तब हम दो मास तक महाराज के सान्निध्य में रहें।'