last modified 25th April 2008
What follows is preliminary work on a transcription of the Hindi text of 'Shri Jyotishpeethaddharaka' - a biography of Shankaracharya Swami Brahmananda Saraswati [1870-1953].
Initially I am gradually creating a copy in 'Itrans' which, with the use of 'Itranslator 99' and 'Itranslator 2003' [free programs available on the net], can be reformatted directly into Devanagari script! I am also working to compile a dictionary to use alongside Gurudeva's quotations. As I work on the Guru Dev Hindi-English Dictionary, I can debug the likely typos from the Itrans  version at http://www.paulmason.info/gurudev/sources/text/J.txt
I offer this text file J.txt in the spirit of research. Naturally, I would be interested to hear from anyone who makes any headway at translating this material.
Jaya Gurudeva
जय गुरुदेव

Paul Mason
premanandpaul@yahoo.co.uk
Website of Paul Mason:-
http://www.paulmason.info/

Guru Dev biography cover

* जय प्रभो *

* श्री ज्योतिर्ष्पीठोद्धारक *

ब्रह्मलीन जगद्गुरु शंकराचार्य श्री ज्योतिष्पीठाधीश्वर

स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज

ज्योतिर्मठ - बदरिकाश्रम ( हिमालय ) की

संक्षित्प्त - जीवनी

* हरिः *

श्री ज्योतिष्पीठोद्धारक

ब्रह्मलीन जगद्गुरु भगवान् शंकराचार्य

श्री मद् स्वामी ब्राह्मानन्द सरस्वती जी महाराज

ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम

की

संक्षिप्त जीवनी

संकलन कर्त्ता -

श्री रामेश्वर प्रसाद तिवारी दारागञ्ज प्रयाग

प्रकाशक --

श्री जगदीश प्रसाद मिश्र अध्यक्ष मिश्रबन्धु

कार्यालय जबलपुर ( म। प्र। )

सम्वत् २०२२ आश्विन शु। विजया दशामी मंगलवार

दिनांक ५ अक्ट्वबर सन् १९६५ ई०

मू। रू। २-७५

प्राक्कथन

जिन महान् विभूति के व्यक्तित्व का वर्णन करने का प्रयास किया जा रहा है , वह केवल उनकी अपरिमित शक्तियों को सीमित दृष्टि से देखना है। वास्तव में जो वाणी से परे का विषय है उसे शब्दों में लाने का प्रयत्न अनधिकार चेष्टा ही है। फिर भी आस्तिक जगत् की उत्सुकता - निवृत्ति के लिये महाराज श्री की पवित्र जीवनी का सधारण परिचय कराने के निमित्त इस कार्य को सम्पन्न करने में हमें हर्ष हो रहा है।

आपका व्यक्तित्व विशुद्ध निर्मल और ज्योतिर्मंय था , जिसका दूर से दर्शन ही शान्तिप्रद होता था। तपस्वियों ने उसे तपश्चर्या का साकार रूप कहा , योगियों ने योगतत्व का आगार पाया और शान्त समाहित चित्त महात्माओं ने परम शाँति का स्थिर निवास देखा। विरक्तों ने श्री महाराज जी को अपने निबृति - मार्ग का परम आदर्श माना और गृहस्थों ने उनमें अपने प्रवृत्त - पथ का प्रकाश पाया।

श्रीचरण का व्यक्तित्व मानव विकास की उच्चतम अवस्था का प्रतीक था। रेशमी भगवा वस्त्रों से अलंकृत , स्वर्णसिंहासन पर समासीन आपकी स्वाभाविक मुद्रा की छटा अपूर्व होती थी। दर्शन मात्र से आपकी स्वाभाविक कोमलता , सरलता , क्षमा , दया छलकती दृष्टिगोचर होती थी। व्यावहारिक कार्यो में अधिकतर उदासीनता थी , किन्तु साथ ही साथ दृढ़ता भी थी। आपके एक - एक शब्द में ऐसी विध्युत् शक्ति थी , जो श्रोता के दृदय - पटल पर अधिकार जमा लेती थी और उसमें रस मिलता था। जो भी आपके निकट सम्पर्क मे आया , उसने यही समझा कि महाराज श्री जब से अधिक मुझे ही मानते हैं। यह एक अनोखी विचित्रता थी।

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स्वतः श्रीचरण उपदेश कम करते थे। जब कोई कुछ प्रश्न कर देता , तो उसके प्रश्न का उत्तर देते हुए समीप में बैठे हुए लोगों की मानसिक शंकाओं का समाधान बिना पूछे ही कर देते थे। प्रायः लोग यह कहा करते थे कि मेरे मन में अमुक प्रश्न था मेरे मन में अमुक प्रश्न था , किन्तु महाराजश्री ने अपने उपदेश में उसी प्रश्न की चर्च करते हुए हमारी शंका का समाधान निना पूछे ही कर दिया। अगणित चमत्कारपूर्ण विशेषताओं से आपका व्यक्तित्ब परिपूर्ण था।

महाराजश्री अपने उपदेशो मे अधिकतर स्वतः के अनुभव ही बताया करते थे। इसलिये आपके उपदेशों में सदैव नवीनता रहती थी , जिसके सुनने के लिये श्रोतागण सदा लालायित रहते थे और यही कारण हैं कि आपके एकान्तिक - जीवन की भी घटनाओं का वर्णन मिल गया है। इस पुस्तक में आपकी ही बताई हुई उन्हीं घटनाओं का उल्लेख है , जिन्हें भक्तों ने स्वयं उनके मुखारविंद से सुन कर नोट कर लिया था। इसलिये यह जीवनी आपके ही वचनामृत द्वारा प्राप्त घटनाओं का संकलन मात्र है। आशा है कि आध्यात्मिक प्रमीजन इस अमृतमय झाँकी से लाभ उठावेंगे।

रामेश्वर तिवारी

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" श्रीमद् आध्य शंङ्कराचार्य जी का संक्षिप्त परिचय '

श्रीमद् आध्य शंकराचार्य भारतवर्ष की एक दिव्य विभूति है। उनकी प्रभा आज भी दिग्दिगन्त को आलोकित कर रही है। उनका आविर्भाव हुए दो सहस्र वर्ष से अधिक हुआ , फिर भी उनकी कीर्ति कौमुदी उसी प्रकार अक्षुण्ण रूप में आज भी भारत के नभोमंडल को उद्भासित कर रही है। वैदिक धर्म के इतिहास में आचार्य शंकर का आविर्भाव एक नवीन युग के अवतार का सूचक है। जिस समय यह पवित्र भारत - वर्ष अवैदिकता के पंक में धंसा जा रहा था , जब अनाचार और कदाचार के काले - काले राक्षस इसे चारों ओर् से घेरे हुए थे , जब एक छोर से दूसरे छोर तक यह सारा देश आलस्य और अकर्मण्यता के चंगुल में फँसा हुआ था , तब आचार्य शंकर का मंगलमय उदय इस देश में हुआ। धर्मिकता की जो ज्योति दम्भ की आँधी के सामने बुझने के किनारे आकर अंतिम घड़ियाँ गिन रही थी। उस ज्योति को इन्होंने बुझने से बचाया , जिससे देश भर में धर्म की स्निग्ध आभा फैल गयी।

वैदिक धर्म का शंखनाद ऊँचे स्वर से सर्वत्र होने लगा। उपनिषदों की दिव्यवाणी देश भर में गूंजने लगी। गीता का ज्ञान अपने विशुद्ध रूप में जनता के सामने आया , लोगों को ज्ञान की गरिमा का परिचय मिला , धार्मिक आलस्य का युग बीता , धार्मिक उत्साह से देश का वायुमंडल ब्याप्त हो गया , धर्म के इतिहास में नवीन युग का आरम्भ हुआ। यह युगान्तर उपस्थित करने वाले धर्म प्रैत्ष्ठापक श्री आचार्य शंकर किस भारतीय के वन्दनीय नहीं है ?

आचार्य शंकर ने अपने धर्मोद्धारक कार्य को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये भारतवर्ष के चारों सुप्रसिद्ध धामो में अपने चार प्रधान पीठों की स्थापना की थी। इन्हीं चार पीठों में से उतराम्नाय ज्योति -

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ष्पीठ ( ज्योतिर्मठ ) लगभग १६५ वर्ष से उच्छिन्न हो गया था। स्मरण रहे कि हमारे महाराजश्री ने ही ज्योतिष्पीठ का पुनरुद्धार किया और स्वल्प समय में ही धर्मपीठ की पुनः प्रतिष्ठा कर मठ आदि निर्माण कराकर उसके सुचारु रूप से संचालन के लिये बहुत सी सम्पत्ति भी स्वनिर्मित समर्पित की।

अतः ज्योतिष्पीठ स्थापक एवं ज्योतिष्पीठोद्धारक आचार्य द्वय के पावन चरणों में श्रद्धा - भक्ति सहित हमारा नमस्कार है।

निवेदक -

जगद्गुरु , शंकराचार्य , ज्योतिष्पीठाधीश्वर,

स्वामी शान्तानन्द सरस्वती जी महाराज ,

ज्योतिर्मठ , बदरिकाश्रम्।

( हिमालय )

 

* ॐ हरिः *

धर्म सम्राट् श्री शंकराचार्य

स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज ( ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम ) की

संक्षिप्त जीवनी

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अज्ञानतिमिरान्धस्यज्ञानाञ्जनशलाकया।

चक्षुरुन्मीलितंयेनतस्मैश्रीगुरवेनमः॥

१। पहला अध्याय

बाल्यावस्था और वैराग्य

सर्वाधिष्ठान स्वप्रकाश परब्रह्म परमात्मा के साकार विग्रह कौशलेन्द्र भगवान् श्रीराम की लीलाभूमि अयोध्या के सन्निकट सरवार प्रान्त अपनी पवित्रता के लिये उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। यह पञ्च गौड़ ब्राह्मणान्तर्गत सरयूपारीण ब्राह्मणों का प्रधान क्षेत्र है। यहाँ गाना ग्राम की विशेष प्रतिष्ठा है। महाराज श्री का इसी गाना नामक ग्राम के एक श्रेष्ठ प्रतिष्ठित सम्मानित सरयूपारीण पंक्तिपावन् गाना मिश्र ब्राह्मण

कुल में मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी , विक्रम सम्वत् १९२८ , तदनुसार दिसम्बर २१ , १८७० ई। दिन वृहस्पतिवार को प्रादुर्भाव हु‍आ। एक सम्पन्न ज़मीन्दार र‍ईस परिवार के बालक होने के नाते जीवन के सभी सुख - वैभव प्राप्त थे। परन्तु कौन जानता था कि मखमली गद्दों में पला हु‍आ बालक संसार का परम विरक्त सिद्ध योगी होगा और शंकराचार्य की गद्दी को सुशोभित करेगा ?

 

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महाराज श्री का प्रारम्भिक जीवन बहुत ही चमत्कारिक और आदर्शमय रहा। बाल्यावस्था से ही आपकेमन में संसार की क्षण - भंगुरता भासने लगी। जन्म से ही तेजस्वी शरीर में वैराग्य का भाव प्रबल था। व्यावहारिक जीवन में आप प्रायः उदासीन ही रहते थे। एकान्तप्रिय थे। सदैव गम्भीर मुद्रा में निवास करते थे। चञ्चलता का नाम तक न था। आपका अलौकिक तेजपूर्ण मुखमण्डल सभी को प्रभावित कर लेता था। नाना प्रकार के स्वादिष्ट खाध्य पदार्थ और अच्छे - अच्छे सुन्दर वस्त्रों पर , जो बालकों को स्वाभाविक ही प्रिय होते हैं , आपकी दृष्टि ही नहीं ग‍ई। जीवन के आमोद - प्रमोद की सामग्री और बच्चों के नाना प्रकार के खेल - खिलौने कभी भी आपको आकर्षित नहीं कर सके। मित भाषण और हस्तपादादि इंद्रियों को भी यथासाध्य निरोध करना आपकी स्वाभाविक विशेषता थी। जहाँ बैठते बैठे ही रह जाते , न जाने किस् विचारधारा में निमग्न रहते। आपकी प्रत्येक क्रिया में गम्भीरता और बोलचाल में अलौकिकता देख कर कुटुम्बीजन विस्मित हो जाते थे और आपकी भावी महानता का आभास पाया करते थे। आपमें बुद्धि प्रखर , विचारशक्ति प्रबल और निर्णय करने की क्षमता अद्वितीय थी।

आप अपने पितामह के बहुत प्यारे थे। उन्हीं के प्रेम पूऱ्ण अङ्क में आपकी दिनचर्या का अधिकांश समय व्यतीत होता था। जो कुछ आपके हृदय में प्रेमभाव या मान्यता थी , वह मानों सारी पितामह के लिये ही थी। पितामह वृद्ध थे ही लगभग सौ वर्ष की अवस्था में उन्होने अपने प्रिय पौत्र से सदा

 

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के लिये विदा होकर अपनी लौकिक जीवन यात्रा समाप्त कर दी। सात वर्ष तक जिनकी गोद में खेले थे , उस परम प्रिय पितामह का शरीर छूट गया। घरवालों की सतर्कता के कारण बालक अपने पितामह के शव को नहीं देख सका , पर जब वे घर से बाहर निकाल कर ले जाये गये तब कुछ दूर चले जाने के बाद एक नौकर ने दिखाया कि देखो वे सब लोग पितामह को लिये जा रहे हैं। बालक ने भीड़ को बार बार कहते सुना " राम नाम सत्य है "। बालक के नेत्रों ने पितामह को ओढ़े हुये , सोये हुये , जाते हुये देखा और कानों ने सुना " राम नाम सत्य है "। सोचा , पितामह का यह अंतिम उपदेश है। बालक के मन में दो बातें जाग्रत हु‍ईं -

() पितामह अब कभी नहीं मिलेंगे ;

() ' राम नाम् सत्य है।'

अवस्था ७ वर्ष की थी। बालक अपने पितामह की स्मृति में जब भावमग्न होता तो अपने आस - पास पिता , माता , काका , ता‍उ आदि सम्बन्धियों को देख कर यही सोचता कि ये भी किसी न किसी दिन इसी प्रकार छूट जा‍एँगे। किसको अपना समझें ? एक को अपना माना था , वे चले गये , यह को‍ई रहनेवाला नहीं दिखता। हमारा शरीर भी इसी प्रकार एक दिन छूट जायगा। जब यहाँ को‍ई रहने वाला नहों है तो फिर यह सब क्या है , कौन सी चीज है जो यहाँ रहेगी ? बालक के मन में यह भाव आते ही , कानों में गूंज उठता " राम नाम सत्य है।"

 

()

 

जैसे - जैसे समय व्यतीत होता गया " राम " के सम्बन्ध में अधिकाधिक विचार बढ़ता गया। यही " राम नाम सत्य " बालक के हदय पटल पर अंकित हु‍आ , उसी का मनन हु‍आ। वही उसके भावी जीवन - प्रासाद की सुदृढ़ नींव बना। उसी " राम नाम सत्य " के साँचे में उसने अपना जीवन ढाला। बालक के मन में संसार का मिथ्यात्व दृढ़ हो गया। घरवालों ने देखा कि बालक के मन में पितामह की छाप अमिट पड़ी है। सबको चिन्ता होने लगी कि कैसे इस बालक के अन्तःकरण से पितामह की दुःखद स्मृति हटा‍ई जाय। लगभग एक वर्ष व्यतीत हु‍आ। अवस्था ८ वर्ष की हु‍ई और उपनयन संस्कार का समय आ गया। सब ने विचार किया कि उपनयन कराकर कुछ समय के लिये काशी पढ़ने को भेज दें।

आठ वर्ष की आयु में यज्ञोपवीत संस्कार के पश्चात् आप वेदाध्यायनार्थ काशी भेज दिये गये। काशी पहुँचते ही वहाँ की सांस्कृतिक विशेषता की छाप आप पर पड़ी। आपने अपना जीवन आध्यात्मिक उन्नति की ओर लगाने का संकल्प किया। इधर तत्कालीन प्रचलित सुकुलीन ब्राह्मण कुलों की प्रथो के अनुसार अयोध्या प्रांत के सरयूपारीण प्रतिष्ठित पंक्तिपावन गाना मिश्र कुल में पुत्र विवाहोत्सव का समय आ गया। कुटुम्बीजन प्रयत्नशील हो उठे। कुछ लोग काशी आये कि बालक को बुला ले चलें। आपको मालूम हु‍आ कि गृह से विवाह के लिये बुलावा आया है। अभी दूध के दांत पूरे गिरे भी नहीं थे और जिस अवस्था में सहस्रों बालक धूलि - धूसरित , अबुद्धावस्था में आपस में लड़ते - भिड़ते , हँसते - खेलते इतस्ततः

 

()

 

बालक्रीड़ा में निमग्न रहते हैं , उस ८-९ वर्ष की सुकोमल अवस्था में आपके कानों में ' विवाह ' का शब्द पड़ा। हृदय चौंक उठा। रोमांच हो आया - विवाह ? विवाह और उससे सम्बन्धित संसार ?

 

निर्मल नवीन बालन्हृदय के मानस - पलड़े पर तुल गया संसार रत्ती भर। उधर प्रवृत्तिमार्ग ने बालक के मानस पटल पर अपनी निराली छवि दिखला‍ई। अगणित सामग्रियाँ उपस्थित कीं कि समस्त इन्द्रियों के विषय को यथेच्छा भोग कर आनन्द प्राप्त किया जाय , इधर निवृत्ति मार्ग ने अपना निराला अनिर्वचनीय आकर्षण उपस्थित किया। किन्तु इसमें क्षण - भंगुरता नहीं , स्थिरता थी ; कोलाहल नहीं , शान्ति थी , आवागमन नहीं , प्रत्यक्ष मोक्ष था। निस्संदेह इसका पलड़ा भारी था। आपने निश्चय किया कि निवृत्तिमार्ग ही श्रेयस्कर है और यही अपनाने योग्य है। सहसा इस पथ का द्वार खुला।

 

नन्हा - सा बालक त्याग वैराग्य की मूर्ति बनकर भगवती भागीरथी के पुनीत तट को पकड़े हुये चल पड़ा। आपने गंगाजी के किनारे - किनारे ही चलते रहने की ठान ली। एकाग्रमन से अपनी अलौकिक विचारधारा सम्भाले हुये आप भागीरथी के तट पर निरन्तर बढ़ने लगे। प्रातःकाल का समय बीत गया। धूप कड़ी हो ग‍ई। ऊपर से सूर्य भगवान् की तेज किरणें , निचे गंगाजी की तप्त बालुका। परन्तु क्या बालक इन विषमता‍ओं से किंचित् मात्र विचलित हो सका ? उसने तो

 

()

 

जीवन की ऐसी विषम परिस्थितियों के साथ हँस - हँस कर खेलने का व्रत ही ले लिया था। उसे ये क्षुद्र बाधा‍एँ कहाँ तक रोक पातीं ?

 

भगवती भागीरथी का हृदय द्रवीभूत हो उठा। दो चुल्लू जल पिलाकर वृक्ष की शीतल छाया में कुछ समय रोकना चाहा ; किन्तु उत्तर मिला " माँ , तेरे सहारे ही जीवन का यह वृहत पथ व्यतीत होना है। अभी से रुकने का स्वभाव मत बनने दे। एक बार हिमालय की किसी एकाकी गुफा तक पहुँच जाने दे , जहाँ बैठकर जीवन की साध पूरी कर सकूँ।" यह कहते हु‍ए तपसी हृदय ने जाह्नवी को प्रणाम कर आगे का पथ सम्भाला।

 

थकावट नहीं , नींद नहीं , निर्जन और अर्द्धरात्रि में अकेले पन का भय भी नहीं। बढ़ते चले गये। जब भूख लगती तब चुल्लू से गंगाजल पी लेते और जब प्यास लगती तब चुल्लू से गंगाजल पी लेते। पहिला दिन गया , दूसरा बीता और तीसरा भी ढल गया , गंगा का चुल्लू चुल्लू जल पी - पी कर। वह सुकोमल अवस्था और विधि की इतनी उपेक्षा क्यों ? क्या यह परीक्षा का समय है ? परीक्षा भी हो तो भी विधना , क्या यह अति नहीं है ? किन्तु हमें सन्तोष है उस ओर से यदि अति है तो इस ओर से भी तो उसका यथार्थ प्रत्युत्तर हो रहा है। बस आगे बढ़ना ही उसका एक कार्य है। परन्तु तीसरे दिन भावी चौक उठी ; सूर्य भगवान् के विदा होते - होते परीक्षा समाप्त हु‍ई। एक ज़मीन्दार ने गंगा के उस पार से

 

()

 

देखा कि कौन यह नन्हा सा बालक गोधूलि में झाड़ी - झंखाड़ बेधता , लाँघता बीहड़ पथ पर बढ़ा चला जा रहा है। उसने अपने नौकर को भेजा कि उसे बुला ले आये। किन्तु क्या यह सम्भव था ? किसकी सामर्थ्य थी कि उस परम स्वतंत्र एकनिष्ठ बाल तपस्वी को अपने पास नौकर द्वारा बुलावा सके ? ज़मीन्दार को स्वयं समीप जाना पडा।

 

पूछा - " आप कौन हैं ?"

 

उत्तर - " हमें जानकर क्या करोगे ? अपना अर्थ कहो।"

 

उसने फिर प्रार्थना की - " महाराज , मेरा अर्थ यही जानना है कि आप कौन हैं और इस असमय में इस बीहड़ पथ पर कैसे बढ़े चले जा रहे हैं ?"

 

बाल तपस्वी ने कहा - " यह समय है या असमय , और यह कुमार्ग है या सुमार्ग , इसका ज्ञान तुम्हें नहीं हो सकता। इतना ही जान लो कि हम काशी से चलकर हिमालय में तपस्या करने जा रहे हैं। जा‍ओ अपना काम करो , हमें व्यर्थ छेड़ने से कुछ लाभ नहीं।"

 

()

 

ज़मीन्दार ने कुछ साहस बटोर कर धीमें स्वर में कहा - " महाराज , क्या मैं जान सकता हूँ कि आपने मार्ग में कहाँ और कब भिक्षा की है ?"

 

उत्तर मिला - " अभी तक गंगोदक ही अन्न - जल का काम कर रहा है।"

" तो चलिये , ग्राम में कुछ जलपान करके आगे बढ़िये तो हमें भी संतोष होगा। रात्रि भी हो रहो है।"

" भिक्षा के लिये तो हम किसी के दरवाजे जायेंगे नहीं। रही बात तुम्हारे संतोष की , तो हमें कुछ खिलाने - पिलाने से तुम्हें संतोष हो जायगा , यह भी नहीं माना जा सकता। संतोष तो तब माना जाय जब उसके बाद फिर को‍ई इच्छा न उठे। यह हमें भिक्षा कराने से तो होगा नहीं। यह तो तभी हो सकता है जब उस परम तत्व को जान लो जिसके जानने से सब जाना जाता है और जिसकी प्राप्ति होने पर फिर को‍ई वस्तु अप्राप्य नहीं रह जाती। इसलिये कुछ ऐसा प्रयत्न करो जिससे वास्तव में संतोष हो जाय।"

नन्हें से दुधमुहें बालक के मुख से परमार्थ का ऐसा उपदेश ! आश्चर्य ! सोचा , जिस केन्द्र से यह ज्ञानधारा बह रही है क्या उसकी चरम स्थिति और विकास की सीमा का अनुमान लगाया जा सकता है ? मानव शरीर तो है किन्तु यह निश्चय नहीं होता कि मानवी लालवाणी है।

वहीं गंगातट पर ही दूध की व्यवस्था की ग‍ई। आपने

 

()

 

दो तिहा‍ई दूध से गंगा जी का भोग लगा दिया। दुग्धधारा जल में समाहित हो ग‍ई , भगवती भागीरथी से जितना जल तीन दिन में पिया था वह एक ही बार में दूध से चुका दिया। माता का दृदय गद्‌गद् हो उठा। वरदान मिला - अब जीवन में जल से जठाराग्नि शान्त करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। माता अन्नपूर्णा ने गोद में उठा लिया। फिर क्या था , वर्षों सघन वन - पर्वतों की एकाकी गुफा‍ओं में रहे , वर्षों आकाश के नीचे मैदानी स्वामी के नाम से मैदानों में स्वच्छन्द व्यतीत किये न कभी किसी से याचना की और न किसी से संकेत किया। किन्तु खाध्य सामग्री की कभी कमी नहीं हु‍ई। कितनी ही बार जंगलों में घनघोर अँधेरी रातों में न जाने कौन सेरों मला‍ई और टोकनियों में फल लाकर रख जाता।

दायें - बायें न देखकर सीधे हिमालय के लिये गंगा के किनारे - किनारे ही यात्रा चली। सन्ध्या - वंदन का नित्यकृत्य नहीं छूटा और जब जैसा प्राप्त हु‍आ भगवदर्पण बुद्धि - पूर्वक क्षुधा निवृत्ति की। पीने को अंजलि में गंगाजल , विश्राम के लिये वृक्षों की शीतल छाया में पवित्र भूमि - शैय्या सर्वत्र उपलब्ध हु‍ई।

शरीर पर विशिष्ट ओज तेज होने से जिसने देखा समीप अवश्य आया। विचित्र आकर्षण था। दर्शकों की आँखों में ध्रुव , प्रह्लाद की छवि साकार होकर झूल पड़ती थी। इस प्रकार दिन बीत रहे थे , रातें बीत रही थीं जब तक पैरों ने मन का साथ दिया तब तक चले और जब पैर थके तो किनारे गंगा की बालू में किसी वृक्ष की छाया में विश्राम किया और

 

(१०)

 

नींद खुलते ही आगे चल पड़े तीन दिन के बाद मालुम पड़ा कि गंगा बहुत चौड़ी हो ग‍ई हैं बालक को यह ज्ञान न था कि यह गंगा यमुना का संगम है। कुछ और आगे बढ़े तो लोगों से मालूम हु‍आ कि प्रयाग आ गये।

त्रिवेणी का माहात्म्य तो पितामह से सुना ही था। श्रद्धापूर्वक गोते लगाये। आगे आकर थकान मालूम हु‍ई तो दशाश्वमेध घाट पर किनारे एक चौकी पर बैठ गये। कुछ समय व्यतीत हु‍आ - ध्यान में बैठे थे कि एक महाशय बगल में आकर बैठ गये और बाल तपस्वी की मुद्रा को चुपचाप देखने लगे। काफी समय व्यतीत हो गया। देखा कि यह बालक तो है परन्तु बालकपन की चेष्टा‍ओं से सर्वथा रहित है। चेहरा थका हु‍आ सा है पर तेजयुक्त है। उसने अपनी जेब से एक कागज निकाला , पढ़ा और ध्यान पूर्वक एक बार पुनः बालक की मुखाकृति को देखा। तब बिलकुल पास ही सामने जाकर उसी चौकी पर बैठ गया। बाल तपस्वी अपनी अंतर्निष्ठा से चौक पड़ा और समीपस्थ पुरुष की ओर निहारा। अपनी ओर देखते जानकर उस पुरुष ने आपके सामने अपनी जेब का कागज निकालकर रख दिया।

बाल तपस्वी - " यह क्या है ?"

उत्तर - " आपकी हुलिया।"

बाल तपस्वी - " आप कौन हैं ?"

उत्तर - " मैं पुलिस का दारोगा हूँ।"

बाल तपस्वी - " क्या चाहते हैं ?"

 

(११)

 

दारोगा - " आपके नाम की यह हुलिया है। आप घर से भाग आये हैं।"

बाल तपस्वी - " अधिक बात की क्या आवश्यकता है , हुलिया ही है न ?"

दारोगा - " हाँ "

बाल तपस्वी - " तो जिसने हुलिया कटा‍ई है , उसे सूचना दे दो कि हम यहाँ हैं। किसी का पशु खो जाता है तो वह उसकी हुलिया कटा देता है। हम तो किसी के लड़के ही हैं। सुचना दे दो कि हम यहाँ पर आ गये हैं। वह चाहेगा तो आकर ले जायगा।"

 

दारोगा - " हाँ , सुचना तो मैं कर ही दूँगा ? पर आप घर से क्यों चले आये कुछ मालूम भी तो हो।"

 

बाल तपस्वी - " यह तो अच्छा प्रश्न है , घर से क्यों चले आये ? हम पूछते हैं कि आप घर ही में क्यों रहते हैं ?"

 

दारोगा अपनी पुलिसगीरी भूल गया - छोटे से बच्चे के मुँह से दर्शनशास्त्र का इतना ऊंचा तर्क सुनकर उसकी बुद्धि चकरा ग‍ई उसका दारोगापन जाता रहा। आवाज में नरमी आ ग‍ई उसने कहा - " घर में तो सभी रहते हैं , क्योंकि

 

(१२)

 

घर में आराम रहता है। घर के आराम को छोड़कर आप इस तरह दरिया के किनारे दोपहर में मारे - मारे फिर रहे हैं इसका क्या कारण है ?"

बाल तपस्वो - " जा‍ईये दारोगा जी , अपना काम कीजिये और घर का आनन्द लीजिये। गंगातट पर माता की गोद में , रेती में , एकान्त दोपहरी में और निर्जन , नीरव स्थली में हम मारे - मारे फिरते हैं या आनन्द करते है यह आपकी समझ में नहीं आ सकता।"

नन्हें से बालक के मुख से ऐसे मार्मिक शब्द सुनकर दारोगा जी की आँखें खुल ग‍ई। पुलिसपन का नशा उतर गया और श्रद्धापूर्वक बोले - " आपकी छोटी उमर है। किसी बड़े घर का जन्म मालूम पड़ता है। क्या इस प्रकार अनाथ से फिरने में आपको संकोच नहीं होता ?"

बाल तपस्वी - " हम छोटे हैं , आप तो अपने को बड़ा ही मानते हैं न ? बड़े होकर भी आप यह नहीं समझते हैं कि अनाथ और सनाथ कौन है ? थोड़ा विचार तो कीजिये तो स्वयं ही पता

 

(१३)

 

लग जायगा कि सर्वत्र सर्व शक्तिमान् परमात्मा ही सब का एक " नाथ " है। उसकी शरण में जिसने अपने को डाल दिया वह अनाथ रहा कि सनाथ हो गया। हम आपसे पूछते हैं कि जिसने उस परम पिता से अपना सम्बन्ध नहीं बनाया क्या उसे आप " सनाथ " कहेंगे ?"

 

एक बालक के मुख से परमार्थ का सारगर्भित उत्तर सुनकर दारोगा जी निरुत्तर हो गये और उनके मन में आया कि यह को‍ई साधारण बालक नहीं , को‍ई होनहार महान् आत्मा है।

 

दारोगा जी विनम्रतापूर्वक बोले , - " आप एक काम करें कि अब हमारे साथ चलें , क्योंकि आपके नाम की हुलिया है। वैसे तो आपको हम यहाँ छोड़ कर जा नहीं सकते। पर हम आपको पुलिस थाने में नहीं ले चलेंगे। आप हमारे साथ हमारे घर पर चलें। वहाँ रात्रि में रहें फिर सबेरे जो विचार होगा वह कीजि‍एगा।"

बाल तपस्वी को समझा बुझा कर दारोगा उन्हें अपने घर पर ले गया। रात्रि में अनेक प्रकार की सत्संग - वार्ता में उसने

 

(१४)

 

यह भलीभाँति समझ लिया कि बालक तीव्र वैराग्यवान् है और वास्तव में हिमालय पहुँचकर भगवान् की प्रत्यक्षानुभूति के लिये तपश्चर्या में ही अपना जीवन लगाना चाहता है। दारोगा ने यही निश्चय किया कि उन्हें जल्दी ही हिमालय के निकट भेज दिया जाय। प्रातःकाल दारोगा ने कहा हम आपके इस पवित्र मार्ग में बाधक नहीं होना चाहते। परन्तु आपकी हुलिया देश भर के लिये है। यदि इसी प्रकार गंगा के किनारे - किनारे पैदल चला करेंगे तो कहीं न कहीं अवश्य ही पकड़ जायेंगे इसलिये हम सोचते हैं कि आपको चुपचाप रेल पर बैठा कर हरिद्वार तक भेज दें।

 

जो बाल तपस्वी चाहते थे हु‍आ। इनके मन में था कि जल्दी से जल्दी हरिद्वार पहुँच जाय। उसकी भूमिका स्वतः बन ग‍ई। जो बाधक बनकर आया था वही साधक बन गया। भगवान् के भक्तों की बातें ऐसी ही हु‍आ करती हैं। भगवान् की शक्ति से ही भक्तों के संकल्प पूरे होते हैं। सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञ भगवान् की सर्वशक्तिमयी प्रकृति का यह कार्य है कि प्रिय भक्त की इच्छा के अनूकूल परिस्थितियाँ बना दे और भक्त के संकल्प की पूर्ति कर दे। दारोगा ने उन्हें टिकट लेकर गाड़ी पर बैठा दिया। बाल तपस्वी दूसरे दिन हरिद्वार पहुंच गये।

जब आप गंगा - स्नान को जा रहे थे , एक पुलिस इन्सपेक्टर से भेंट हु‍ई। इन्सपेक्टर ने देखा कि यह तो वही बालक है जिसको ढूँढ़ हो रही है। क्यों न इसे उनके घर भेजवा दिया जाय और पारितोषिक लिया जाय ? इतना सोचते सोचते वह बालक के साथ हो गया। इन्सपेक्टर ने पूछा - " बच्चा , तुम घर से क्यों

 

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चले आये और कहा जा रहे हो ?"। उनका उत्तर था " परम पिता का साक्षात्कार करने के लिये सीधे हिमालय की ओर यात्रा हो रही है।" पुलिस इन्सपेक्टर ने कहा " मैं आपको आपके घर भेजना चाहता हूँ , क्योंकि इससे हमें पारितोषित्क मिलेगा। उत्तर दिया " मैने निश्चय कर लिया है और उसी पर अटल हूं। यदि आप मुझे भेज भी देंगे तो मैं वहाँ रह नहीं सकता , दूसरे ही दिन मेरी फिर यहीं के लिये यात्रा होगी। इसलिये आप मेरे लिये विघ्न न बनें और मुझे जाने दें। किन्तु यदि पारितोषिक का लोभ विशेष है तो मुझे हमारे घर भेजवा कर अपना पारितोषिक ले लें। जैसा उचित समझें वैसा करें।" पुलिस इन्सपेक्टर धार्मिक प्रकृति का साधुसेवी सज्जन था उसने बालक की बातें मान ली और चला गया। परन्तु दूसरे ही दिन जब आप ऋषीकेश की ओर यात्रा कर रहे थे द