What follows is a transcription of the Hindi text of 'Shri Shankaracharya Upadeshamrita' - a collection of 108 quotations of Shankaracharya Swami Brahmananda Saraswati (1871-1953).
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Translation of this text at:- http://www.paulmason.info/gurudev/upadesh.htm
Jaya Gurudeva
Paul Mason
Email:-
premanandpaul@yahoo.co.uk
Website:-
http://www.paulmason.info/
last corrected 28th November 2007

'Shri Shankaracharya Upadeshamrita' cover

॥ ॐ ॥

श्री शंकराचार्य उपदेशामृत

*

ब्रह्मलीन जगद्गुरु भगवान श्री शंकराचार्य

श्रीमद् स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज

ज्योतिर्मठ , बदरिकाश्रम ( हिमालय )

के पावन उपदेश

*

प्रकाशक् :

श्री शंकराचार्य सेवक समिति

" ब्रह्म - निवास् " अलोपीबाग

इलाहाबाद

 

श्री शंकराचार्य उपदेशामृत

ब्रह्मलीन जगद्गुरु भगवान् शंकरचार्य

श्रीमद् स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज

ज्योतिर्मठ , बदरिकाश्रम

के उपदेश

---- 

संकलनकर्ता -

श्री रामेश्वर प्रसाद तिवारी

दारागंज , प्रयाग

 

प्रकाशक

श्री शंकराचार्य सेवक समिति

" ब्रह्म - निवास " अलोपीबाग , इलाहाबाद

मूल्य २ )

 

प्राक्कथन

पूज्यपाद महाराज श्री के उपदेशों का संग्रह पुस्तकाकार में प्राप्तकरने की तीव्र उत्कण्ठा भक्तजनों के मन में बहुत दिनों से बनी रही। आस्तिक जनता भी प्रतीक्षा कर रही थी कि जिस महापुरुष के द्वारा विगत बहुत वर्षों से लुप्तप्राय उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठ का पुनरुद्धार हुआ है , उनके दिव्योपदेश किस दिन स्वाध्याय के लिये सुलभ हो सकेंगे। अतः सब भक्तों एवं आस्तिक जनों की पवित्र भावनाओं का साकार रूप " श्री शंकराचार्य उपदेशामृत " रूप में संग्रहीत किया गया है।

हमें पूर्ण आहा है कि भक्तगण एवं जन - समाज इस उपदेशरूपी दिव्यवाणी का पावन प्रसाद प्राप्त कर अपने मानव - जीवन को सफल बनायेंगे।

शुभेच्छु -

शन्तानन्द सरस्वती

वर्तमान जगद्गुरु शंकराचार्य , ज्योतिर्मठ

बदरिकाश्रम ( हिमालय )

 

प्रस्तावना

भगवद् पूज्यपाद श्रीमद् आध्य शंकराचार्य को ऐसा कौन व्यक्ति है जो न जानता हो। आज से लगभग २००० वर्ष पूर्व दक्षिण भारत के केरल प्रान्त में आपका आविर्भाव ऐसे समय में हुआ , जब वैदिक धर्म परम्परा उछ्छिन्न हो रही थी और धार्मिकता सदा के लिए बिलीन हो रही थी। उस समय आपने भूली हुई जनता को सत्य के मार्ग पर लगाया और वैदिक धर्म की रक्षा की। भविष्य में भी वैदिक धर्म की रक्षा के लिए आपने भारत की चारों दिशाओं में चार धर्मपीठ स्थापित किये - उत्तर में " ज्योतिर्मठ " , दक्षिण में " शृंगेरी मठ " , पूर्व में " गोवर्धन मठ " और पश्चिम में " शारदा मठ " और आदेश दिया कि इन मठों में सदैव एक के बाद दूसरे धर्मांअचार्य शंकराचार्य पद पर सुशोभित होते रहेंगे और भारत में धर्म की रक्षा करते रहेंगे।

किन्तु इधर १६५ वर्ष से उत्तर के ' ज्योतिर्मठ ' में कोई धर्मार्चार्य नहीं हुये। ज्योतिर्मठ का नाम तो बना रहा ; किन्तु उसके स्थान एवं उसके चिह्न आदि सर्वथा नष्ट हो गये। इतने अधिक समय तक पीठ उच्छिन्न रहने के कारण उत्तर भारत की धार्मिक जनता में क्षोभ उत्पन्न हुआ। विद्वानों और धर्मपरायण व्यक्तियों ने विचार किया कि किसी प्रकार इस पीठ का पुनरुद्धार किया जाय। यह काम भारत धर्म - महा - मण्डल ने अपने ऊपर लिया और ज्योतिर्मठ के उपयुक्त सुयोग्य महात्मा की खोज की जाने लगी। प्रयास में सफलता मिली और अनन्त श्री विभूषित स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज को सब प्रकार से सुयोग्य और समर्थ जानकर उन्हें शङ्कराचार्य के पद पर सन् १९४१ में अभिषिक्त किया और उन्हीं पर पीठ के पुनरुद्धार का महान् कार्य सौंपा गया।

श्रीमद् आँध्य शङ्कराचार्य के आविर्भाव के समय के ही समान यह समय भी कठिन समय था। सामान्य जनता धर्म - विमुख हो रही थी और जनता में धार्मित भावना लुप्त सी हो गई थी। महाराज श्री ने स्थान - स्थान पर जाकर वैद्किक धर्म का प्रचार किया और जन साधारण में धर्मिक जाग्रति उन्पन्न की।

 

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ऐसा आदेश और उपदेश दिया कि सभी लोग सामान्य जीवन निर्वाह करते हुए किस प्रकार धर्मपरायण बन सकते हैं। आपके उपदेश सरल , मार्मिक् , आकर्षक , हृदयग्राही और मधुर थे। उनमें विलक्षणता थी , क्योंकि वे महाराज श्री के अनुभूत सिद्धन्त थे। आपकी शिक्षा - दीक्षा सभी को सरल , प्रिय और ग्राह्य मालूम पड़ी , इसलिए लाकों कीं संख्या में लोग आपके अनुयायी बन गये।

आपके उपदेशों में ऐसी सम्मोहिनी शक्ति थी कि जहाँ भी आपका भाषण होता , काखों की संख्या में लोग सुनने के लिए एकत्र हो जाते। क्या स्त्री , क्या पुरुष , क्या बालक , क्या वृद्ध , क्या विद्वान् , क्या गँवार , क्या धनी - मानी , क्या निर्धन - सभी दौड़ पड़ते और उपदेश सुनकर ऐसा अनुभव करने लगते कि महाराज श्री बोलते ही रहै और हम उनकी अमृतवानी का पान करते रहें। प्रायः ऐसा देखा जाता था कि उपदेश के समय भीड़ में जहाँ - तहाँ वैठे हुए कुछ व्यक्ति आपके उपदेशामृत नोट करते रहते थे , क्योंकि वे दिव्य शब्द फिर सुनने को नहीं मिलेंगे। उपदेशों की माँग इतनी आधक बढ़ी कि भक्तों को एक दैनिक समाचार - पत्र प्रकाशित करना पड़ा , जकका नाम था " श्री शंकराचार्य उपदेश "। हजारों कि संख्या में इसकी प्रतियाँ छपतीं और शीघ्र ही बिक जाती थीं। बड़ी श्रद्धा और भक्ति से लोग उन्हें खरीदते और पढ़ते थे। खेद है कि आज वह अमृतवाणी दुर्लभ हो गयी।

इसलिए संकल्प हुआ है कि जहाँ से हो सके महाराज श्री के उपदेशों का संग्रह किया जाय और उन्हें पुर्स्तकाकार करके सुरक्षित कर लिया जाय। अतः यह पुस्तक उन्हीं उपदेशों का संग्रह है। आशा है , धार्मिक जनता तथा भक्तगण इसे अपनायेंगे और अपने पूर्व परिचित महाराज श्री की अमृतवाणी का आनन्द लेत हुए अपना मानव जीवन कृतार्थ करेंगे।

 

रामेश्वर प्रसाद तिवारी

 

 

अनुक्रमणिका

क्र ० सं ० पृष्ठ

१. जो सुखी है वही दूसरे को सुखी बना सकता है। १

२. संसार में आये हो - ऐसी चातुरी से काम लो कि मल - मूत्र के भाँड में न आना पड़े। २

३. मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है परन्तु फल भोगने में परतन्त्र है। ५

४. उदर - पोषण में ही चातुरी समाप्त मत कर दो। ७

५. वासनाओं की पूर्ति के पीछे मत पड़ो। ९

६. जो भाग्य में है वह आयेगा अवश्य। १०

७. मनुष्य का शरीर मिला है , इसे व्यर्थ मत जाने दो। १२

८. कर्म से भी मोक्ष सम्भव है। १४

९. जीना उन्हीं का सार्थक है जो जीकर कुछ आगे के लियै बनायें। १६

१०. मृत्युकाल की पीड़ा। १८

११. अन्त न बिगड़ने पाये। १९

१२. जिसका वियोग निश्चितहै उनको सुख का साधन बनाना भारी भूल। २०

१३. शत्रु - मित्र से सम्भाव रखो। २६

१४. दुष्कर्म हो जाय तो कह दो - सत्कर्म करो तो छिपाओ। २८

१५. ऐसा नहीं कि पाप करते जाओ , भगवान् को भजते जाओ। २९

१६. भगवान् की सेवा करना चाहते हो तो हनुमान जी का आदर्श पालन करो। ३०

१७. शक्ति का अपव्यय और बुद्धि का दुरुपयोग न करो। ३२

१८. जैसा देव वैसी पूजा। ३३

१९. झूठे आदमी को कभी शान्ति नहीं मिल सकती , चाहे वह कुवेर के

 

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समान धनवान हो जाय। ३४

२०. दूसरे में नहीं , अपने में दोष देखो। ३९

२१. संसार प्रेम का पात्र नहीं , उसमें मन को फर्साओगे तो धोखा खोओगे। ३७

२२. पुरस्त्कार के योग्य पुरस्कार और तिरस्कार के योग्य का तिरस्कार करो। ३८

२३. जो आया है सो जायगा। ४०

२४. भगवान् के भजन में लाभ ही लाभ है। ४१

२५. परमात्मा विश्वम्भर है। ४३

२६. जितने दिन जीना है शन्ति से जियो। ४४

२७. शक्ति प्राप्त करो। ४५

२८. साकार - निराकार के झगड़े में न पड़ो। ४७

२९. जैस काछो वैसा नाचो। ४८

३०. प्रेम परमात्मा में और प्रेम की छाया संसार में रखो। ५०

३१. देवत्व से मनुष्यत्व श्रेष्ठ है। ५१

३२. उसकी चिन्ता करो जो सब चिन्ताओं से मुक्त कर सकता है। ५३

३३. जिसे भले - बरे का न्याय करना है वह तुम्हारे सब कार्यों को देख रहा है। ५४

३४. चार वृत्तियों में ही रहो , लोक - परलोक दोनों बनेगा। ५६

३५. सिध्यियों के चक्कर में ठगाये मत जाओ। ५७

३६. जीव - ब्रह्म की एकता। ६१

३७. तृष्णा के त्याग और ईश्वराराधन से ही सुख सम्भव। ६९

३८. योजनायें बना - बनाकर अपने जीवन को उलझन में न डालो। ६५

३९. भगवान का अवतार किस लिए होता है। ६७

४०. मन के थोर्ड़े सहयोग से ही व्यवहार चल सकता है। ६८

४१. लोक - परलोक में सर्वत्र सुख शान्ति चाहते हो तो सर्वशक्तिमान परमात्मा की शरण लो। ७२

 

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४२. मन को संसार में कोई नहीं चाहता। ७५

४३. पतन से बचना चाहते हो तो पाप से बचो और पुण्य को बढ़ाओ। ७८

४४. मन को संसार में लगाओ , पर इतना ही कि परमार्थ न बिगड़े ७९

४५. भगवान का भक्त कभी दुखी नहीं रह सकता। ८०

४६. कुटुम्बयों की अश्रद्धा होने के पहिले ही भगवान् की ओर झुक जाओ। ८१

४७. भगवान की प्रतिज्ञा अपने भक्तों के लिए - " मैं सब कुछ करने को तैयार हूँ। ८२

४८. रात्रि में सोने से पहिले कुछ जप और ध्यान अवश्य करें। ८४

४९. इन्द्रियों के भोग - विलास में जो निमग्न रहता है वह किसी काम का नहीं रह जाता। ८५

५०. मन की प्रवृत्ति जिधर होती है वह स्वयं रास्ता निकाल लेता है। ८६

५१. राग ही सर्वानर्थ का मूल। ८७

५२. विध्नों के भय से मार्ग नहीं छोड़ना चाहिये। ८८

५३. प्रबृत्ति को अशुभ से रोक कर शुभ में लगाना - यही मुख्य पुरुषार्थ है।

५४. परमात्त्मा से विमुख हो रहे हो - इसी से नाना प्रकार की विपत्तियाँ आ रही हैं। ९१

५५ . प्रारब्ध से पुरुषार्थ बलवान है। ९३

५६. त्यागी और उदार तो बहुत हैं - हो सके तो रागी और कृपण बनने का प्रयत्न करो। ९५

५७. एक भगवान् को मजबूती से पकड़ो तो अनेक की खुशामद नहीं करनी पड़ेगी। ९६

५८. संसार जैसा है वैसा ही पड़ा रहेगा - जब तक यहाँ हो अपना काम बना लो। ९८

 

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५९. मनुष्य-जन्म दुर्लभ है , इसे सार्थक बनाओ। ९९

६०. शक्ति चाहते हो तो शक्ति के केन्द्र से सम्बन्ध जोड़ो। १०१

६१. जिनके लिए हाव - हाव करके मारे - मारे फिरते हो वे ही जबाब देते हैं। १०२

६२. हाली में गाली व रंग - गुलाल क्यों। १०४

६३. महाअसुर हिरण्यकश्यपु के पुत्र प्रहलाद क्यों भक्त उत्पन्न हुये। १०६

६४. दीन बन कर दीनदयालु की दयालुता का लाभ उठाओ। १११

६५. स्वधर्म पालन और भगवान का स्मरण सदा करते रहो। ११३

६६. भगवचिन्तन और आहार शुद्धि। ११६

६७. गर्भवास में फिर न आना पड़े तभो मनुष्य जन्म सार्थक। ११८

६८. सर्बत्र भगवान का भाव ही भक्तों का लक्षण। १२२

६९. गुरु बदलने में कोई पाप नहीं होता। १२४

७०. जगत भर का ज्ञान प्राप्त कर लो , पर यदि अपने को न ज्ञान पाए तो अज्ञानी ही रहोगे। १२५

७१. तुम तो सच्चिदाननद स्वरूप परमात्मा के अंश हो - अपने को भूलकार ही दुखसागर में डूब रहे हो। १२६

७२. भगवान का नाम जपो , परन्तु विधि के साथ। १२८

७३. ॐकार की जप - स्त्रियों के लिए उसका निषेध। १२९

७४. क्षत्रिय , वैश्य , शूद्र और स्त्री जाति के लिए गुरुत्व नहीं। १३२

७५. स्त्री - समाज का केवल पति - परायण ही रहकर कल्याण। १३४

७६. भगवान् के आज्ञारूप वेद - शास्त्र के अनुसार चलिए। १३६

७७. सदगुरु किसे कहते हैं। १३७

७८. जगदगुरु किसे कहते हैं। १४२

७९. सत्संग की बातों को मनन करना आवश्यक। १४५

८०. घर में रहते हुये महात्मा बनो। १४७

८१. धन - संग्रह से अधिक प्रयत्न बुद्धि शुद्ध करने के लिए करो। १४९

८२. बिना ज्ञान के न भक्ति ही हो सकती है और न मोक्ष ही। १४९

 

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८३. अच्छे कार्यों को जल्दी करो। १५२

८४. भगवान से लाभ उठाना चाहते हो तो उपासना करके उन्हें एक - देश में प्रकट करो। १५३

८५. सुख चाहते हो तो सुख - सागर की ओर चलो। १५४

८६. भगवान का भजन अवश्य करो - मन लगे या न लगे। १५६

८७. ज्ञान से भगवान के दर्शन का भाव ठीक है - या प्रत्यक्ष दर्शन। १५७

८८. भक्ति और ज्ञान - निराकार और साकार - के झगडे में न पड़ो। १५८

८९. अपने किये का फल तो भोगना ही पड़ेगा। १६६

९०. जैसा मन हो वैसा ही कहो और वैसा ही करो। १६७

९१. मन को संसार में अधिक न फँसाकर भगवान की तरफ लगाओ। १६९

९२. भगवान के पास पहुँचना है तो उनके नाम का सहारा लो। १७३

९३. दुःख की प्रातिभासिक सत्ता है , वास्तविक नहीं। १७५

९४. संसार शोक - सागर ही है , आत्मज्ञानी ही उसे पार कर सकता है। १८१

९५. भवसागर से पार होने का प्रयत्न करो। नौकारूढ़ होकर डूब गये तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा। १८३

९६. सिवाय परमात्मा के कोई सहायक नहीं। १८७

९७. जाति - पांति कल्याण कारक नहीं - भगवान् के भजन और स्वधर्म पालन से कल्याण होगा। १८९

९८. दुर्जन के लिए दुर्जन बनना और निन्दक के लिये स्वयं निन्दक बन जाना उचित नहीं। १९१

९९. त्याग और ग्रहण से मुक्त होकर स्वरूपानन्द में निमग्न हो रही। १९४

१००. अविवेक से मनुष्य बहुत कष्ट उठाते हैं। १९७

१०१. स्वार्थ प्रबल है। १९९

१०२. भौतिकवाद सुख - शान्ति देने में समर्थ नहीं। २००

१०३. उदर - पोषण के लिए अपने भाग्य पर विश्वास रखो। २०२

१०४. जितना हो सके शुभ कार्यों का सम्पादन करो। २०४

१०५. सतर्क रह कर जीवन का सदुपयोग करो। २०८

 

(१०)

१०६. विचार पूर्वक प्रवृत्ति बनाने से ही मन स्मार्ग की ओर जाता। २११

१०७. जो अपना लक्ष्य भूल गया , वह पथ - भ्रष्ट हो ही जायगा। २१४

१०८. जों भगवान की ओर झुका है उसे किसी वस्तु की कभी नहीं। २१६

 

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मुद्रक : देव भारती प्रेस , १० , दरभंगा कालोनी ,
इलाहाबाद - - २११००२।

 

 

श्री शंकराचार्य उपदेशामृत

 

ज्योतिष्पीठोद्धारक

upadesh photo

ब्रह्मलीन जगद्गुरु भगवान् शंकराचार्य
श्रीमद् स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज
ज्योतिर्मठ
, बदरिकाश्रम ( हिमालय )

 

* वन्दना *

वन्देऽहंं यतिराजराजरमणं योगीन्द्रचक्रायुधम्।

चातुर्वर्ग्यंफलप्रदं सुविहितं मोक्षच्छटाच्छादितम्॥

योगानन्दतरंगतानतननं त्रैलोक्यनाथं शिवम्।

ब्रह्मानन्दसरस्वतिं गुरुवरं ज्योतिर्मठाधीश्वरम्॥

*

 

जो सुखी है वही दूसरे को सुखी बना सकता है

*

परमात्मा के सम्पर्क में ही जीव वास्तविक सुखी हो सकता है क्योंकि उसी में सुख की पराकाष्ठा है

जिसके पास जो कुछ होता है , वही वह दूसरों को दे सकता है। किसी कंगाल से कोई धन की याचना करे तो मूर्खता ही तो है। जिस प्रकार धन की राशि से ही धन प्राप्त किया जा सकता है , विध्यानिधि ( विद्वान् ) से ही विध्या की प्राप्ति हो सकती है , उसी प्रकार सुखराशि जो भगवान् हैं , उन्हीं से सुख की प्राप्ति हो सकती है।

संसार में भगवान् के कृपापात्र भक्तों को छोड़ कर कोई भी सुखी नहीं है। आध्यात्मनिष्ठ परमात्मा के भक्त ही यहाँ सुख का अनुभव करते हैं अन्यथा सभी को कुछ न कुछ दुःख धेरे ही रहता है। संसार में कोई सुखी नहीं देखा जाता। जिसके पास जो वस्तु नहीं होती वह दूसरे को उसके द्वारा सुखी मानता है। किन्तु जिसके पास वह है , उसको देखा

 

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जाय तो उससे वह अपने को सुखी नहीं मानता। जिसके पुत्र नहीं है वह पुत्रवालों को सुखी मानता है , पर पुत्र से कितना सुख है , यह किसी पुत्रवान से पूछो। मालूम होता है , वास्तव में किसी भी लौकिक - पदार्थ में सुख नहीं है। सुखस्वरूप तो सच्चिदानन्द - रूप परमात्मा ही है और उसी के सम्पर्क में आने से जीव भी सुखी हो सकता है और सुखी होने का दूसरा मार्ग नहीं है। परमात्मा ही ऐसा 'जनरल मर्चेन्ट' है जिसके यहाँ सुख की किसी भी सामग्री का अभाव नहीं होता। किन्तु उसकी कृपा प्राप्त करने के लिये विधिवत् प्रयत्न करना पड़ेगा , केवल परमात्मा का माहात्म्य पाठ करने से कुछ होगा नहीं। बीजक का पाठ करते रहो तो क्या धनी हो सकते हो ?

संसारियों से सुख प्राप्ति को इच्छा करना भूल है। भला जो स्वयं दुखी है वह दूसरे को सुखी क्या बनायेगा ? संसार में जो सुख दिखता है वह सब सापेक्ष सुख है। किसी से कोई किसी अंश में सुखी है तो कोई अन्य किसी अंश में।

किसी से सुख की याचना करनी ही है तो ऐसी जगह के याचक बनो , जहाँ से सर्व सुख प्राप्त हो सके। स्मरण रखो कि जो परमात्मा की तरफ झुका है वही संसार में सुख - शान्ति प्राप्त कर सकता है , दूसरा नहीं। संसार में सुख दूँढ़ना

 

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ऐसा है जैसा कि प्यास बुझाने के लिए ओस की बूँदों का संग्रह करना।

 

संसार में आये हो - ऐसी चातुरी से काम लो कि फिर लौट कर मल - मूत्र के भांड में न आना पड़े

*

भगवान् की कृपा से ही यह पल्लेदारी छूट सकती है।

जीवन जाने कितने जन्मों से पल्लेदारी करता चला आ रहा है - कभी हाथी का पचास मन का शरीर , कभी चींटी का आधीरत्ती का शरीर , कभी मनुष्य का शरीर , कभी किसी का शरीर - यह जो ढोना पड़ रहा है वह पल्लेदारी भगवान् की कृपा से ही छूट सकती है।

ऐसा करो कि इसी जीवन में भगवान् की कृपा प्राप्त हो जाय और मल - मूत्र के शरीर में फिर न आना पड़े। यह तभी होगा जब कि भगवान् की आज्ञाओं का पालन करोगे। वेद शास्त्र का आदेश ही भगवान् की आज्ञा है।

जिस वर्ण में हो और जिस आश्रम में हो , उसी के

 

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अनुसार स्वधर्म पालन करो और हर समय भगवान् का स्मरण करते रहो।

प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल नियमपूर्वक उपासना करो और अपनी व्यावहारिक व्यवस्था ऐसी रखो कि जहां तक हो सके अपने से दूसरों की भलाई ही हो और यदि किसी की भलाई ही हो और यदि किसी की भलाई न हो सके तो कम बुराई न होने पाये।

भगवान् को सर्वत्र उपस्थित देखना बहुत आवश्यक है। सर्वत्र भगवान् को उपस्थित देखोगे तो कोई पाप नहीं होगा। पहले जो पाप हो गया वह तो नष्ट हो जायगा , पर जब से भगवान् के नाम को अपनाओ तब से पाप से बचो , नहीं तो उन पापों का छुटकारा कठिनाई से होगा। क्योंकि पहले के किये हुये पाप तो गंगास्नान से नष्ट हो जाते हैं ; परन्तु गंगा में , तीर्थ में जो पाप करता है वह ' बज्र लेपो भविष्यति ' अर्थात् वह पत्थर की लकीर के समान हो जाता है जो छुटाया नहीं छूटता। इसलिये भगवान् का स्मरण करते समय पाप करने से डरो।

स्वधर्म - पालन पूर्धक भगवान् का भजन करोगे तो पिछले सब जन्म - जन्मान्तरों के पाप कट जायेंगे और सुख - शान्ति का अनुभव करते हुए अन्त में भी सद्गति होगी।

X X X

 

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मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है

परन्तु फल भोगने में परतंत्र

*

इसलिये ऐसे ही कर्म करो जिसका फल उत्तम हो

चोरी करने में चोर स्वतंत्र है परन्तु फल तो न्यायालय के अधीन है , जितनी सजा दी जायगी उसको भोगना ही पड़ेगा - चाहे इच्छा हो या न हो। मनुष्य जैसा चाहे वेसा कर्म कर सकता है। पुष्य कर्मों को करके स्वर्गादि लोकों में जाकर दिव्य भोगों को भोग सकता है या पाप कर्म करके रौरव आदि महा भयंकर दुःखदायी नरक को प्राप्त हो सकत है।

मनुष्य - योनि कर्म - योनि मानी गई है। यहाँ मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है अर्थात् वह जैसा कर्म करना चाहे कर सकता है। मनुष्य चाहे तो साक्षात् सर्वंशक्तिमान सच्चिदानन्द परमात्मा से मिल सकता है।

मनुष्य जो कर्मं करता है उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है। कोई कर्मं मनुष्य कर ले और चाहे कि उसका फल न भोगना पड़े तो ऐसा नहीं हो सकता। हां , यह अवश्य है कि -

'धर्मेंण पापमपनुदति'

धर्म करने से पाप नष्ट होता है। तो यदि किसी से कभी

 

()

कोई पाप - कर्म हो गया हो तो उसे चाहिये कि उसको नष्ट करने के लिये पुण्य कार्य करे। पुण्य बढ जायगा तो पाप दब जायगा। इसीलिये कहा गया है -

'जपतो नास्तिपातकम् '

भगवन्नाम मंत्र का जप करने से पाप नष्ट होता है। इसलिए यदि किसी के द्वारा अभी तक अविहिताचरण और पाप - कर्म अधिक हुये हैं और वह उन समस्त पापों से छुटकारा पाना चाहता है तो पुण्य - कर्म ( शुभ - कर्मं ) करने लग जाय और श्रद्धा - भक्ति पूर्वक अपने योग्य ( उपयुक्त ) भगवान् के नाम ( मन्त्र ) का जप करने लग जाय। ऐसा करने से धीरे - धीरे पिछले पाप नष्ट हो जायँगे और कुछ समय में वह गढ़ा पूरा होकर आगे के लिये शुभ फल संचित होने लगेगा और उसी के सहारे सद्गति हो जायगी।

अनिच्छा से भी यदि भगवान् का स्मरण किया जाय तो उससे पापों का नाश होता है। जैसे बिना इच्छा के भी यदि अग्नि छू जाय तो वह जला देती है। तात्पर्य यह कि जैसे अग्नि का स्वभाव है कि जो संपर्क में आये उसे जला दे , इसी प्रकार भगवान् का स्वभाव है कि जिसने उनका स्मरण किया उसके पापों को वे नष्ट कर देते हैं।

जन्म - जन्मान्तरों का बिगड़ा हुआ मन है , इसलिये भगवान् के प्रति प्रेम बनाने में तो कठिनाई है पर मलिन व

 

()

दूषित मन से भी यदि भगवान् का चिन्तन किया जायगा तो भी भगवान् की कृपा प्राप्त होगी।

इसमें एक बात यह समझने की है कि मन पहले का चाहे जितना दूषित हो , पहले का चाहे जितना दुराचारी व पापाचारी हो , उसकी परवाह नहीं। परन्तु ऐसा नहीं है कि भगवान् के नाम की पापनाशनी शक्ति के बल पर पाप करते रहो।

X X X

 

उदर पोषण में ही सारी चातुरी समाप्त मत

कर दो

सब से चतुर वही है जो भगवान् की उपासना

करता है

*

भजन करने से कोई बच नहीं सकता। भगवान को नहीं भजोगे तो राजा , रईस , सेठ , साहूकारों को भजना पड़ेगा

आजकल लोग अपने को बड़ा बुद्धिमान समझते हैं। पर उनकी सारी चातुरी पेट के आसपास ही रहती है। उदर में ही उनकी सारी चातुरी समाप्त हो जाती है। पेट के आगे बुद्धि ही नहीं जाती। वे उदर रूपी फोड़े की मलहम - पट्टी करने

 

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में ही सारा समय लगा देते हैं और इसी में सारा जीवन नष्ट कर देते हैं। वास्तव में , इससे अधिक घाटा मनुष्य जीवन में और दूसरा नहीं हो सकता।

भजन तो करना ही पड़ेगा। भजन करने से कोई बच नहीं सकता। ' सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुसमर्थ ' भगवान को नहीं भजोगे तो विषयी - पामर , राजा , रईस , सेठ साहूकारों को भजना पड़ेगा। किसी बड़े का सहारा नहीं लोगे तो छोटों का सहारा लेना पड़ेगा। इसलिए वृद्धिमानी इसी में है कि परमात्मा का सहारा लिया जाय जो लोक - परलोक दोनों जगह काम दे। मनुष्य चाहे जितना भी ऐश्वर्य सम्पन्न हो जाय पर फिर भी उसका ऐश्वर्य सीमित ही रहेगा और कभी भी प्रारब्ध बदलने पर् , वह दीन हो सकता है। इसलिए जिसकी स्वयं की स्थिति निश्चित नहीं उसका सहारा लेकर घोखा ही तो उठाना होगा। सबसे चतुर वही है जो परमात्मा का भजन करता है , वह लोक - परलोक में सर्बत्र सुखी रहता है।

X X X

 

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वासनाओं को पूरा करने के पीछे मत पड़ो

*

शरीर यात्रा के लिये आवश्यक कर्मों को करते हुए

मुख्य ध्यान परमात्मा की प्राप्ति में रखो

भगवान् विष्णु जिनके पुत्र रूप में आये और देवराज इन्द्र जिन्हें अपना अर्द्धासन देता था ऐसे समर्थ शक्तिशाली चक्रवर्ती नरेन्द्र दशारथ भी अपनी सारी वासनायें पूरी न कर सके - राम के राज्याभिषेक की वासना लिये हुए बैल के समान करण पीट - पीट कर उनकी मृत्यु हुई। जब इस प्रकार सामर्थ्यशाली पुरुषों की ही सब आशायें और वासनायें पूरी नहीं हुई , तब आप लोग अपनी सम्पूर्ण इच्छाओं की तृप्ति की आशा स्वप्न में भी मत रखो - जाग्रत अवस्था की तो बात ही क्या।

परमार्थ और व्यवहार दोनों साथ - साथ ही चलते हैं , क्योंकि स्वरूप से कर्मों का त्याग नही किया जा सकता। कर्मों के त्याग करने पर मनुश्य की शरीर - यात्रा भी सम्भव नहीं हो सकती। परन्तु इतना ध्यान अवश्य ही रखना चाहिये कि शरीर - यात्र के लिये आवश्यक कर्मों को छोड़कर शेष वासनाओम् को पूरा करने के पीछे न पड़ जाओ। संसार में

 

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बड़े से बड़े शक्तिशाली मनुष्य हुए परन्तु उनकी भी सम्पूर्ण वासनायें पूर्णं न हो सकीं। इसलिये शरीर यात्रा के लिये आवश्यक कर्मों को करते हुए मुख्य ध्यान परमात्मा की प्रात्ति में लगाओ।