Link to Guru Dev pages menu

What follows is a transcription of the Hindi text of 'Shri Shankaracharya Upadeshamrita' - a collection of 108 quotations of Shankaracharya Swami Brahmananda Saraswati (1871-1953), at http://www.paulmason.info/gurudev/UA_Hindi.htm - Premanand Paul Mason

A translation by Paul Mason of 'Shri Shankaracharya Upadeshamrita' is available - click this link.

'Shri Shankaracharya Upadeshamrita' cover

॥ ॐ ॥

श्री शंकराचार्य उपदेशामृत

*

ब्रह्मलीन जगद्गुरु भगवान श्री शंकराचार्य

श्रीमद् स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज

ज्योतिर्मठ, बदरिकाश्रम (हिमालय)

के पावन उपदेश

*

प्रकाशक् :

श्री शंकराचार्य सेवक समिति

"ब्रह्म - निवास् " अलोपीबाग

इलाहाबाद

 

श्री शंकराचार्य उपदेशामृत

ब्रह्मलीन जगद्गुरु भगवान् शंकरचार्य

श्रीमद् स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज

ज्योतिर्मठ, बदरिकाश्रम

के उपदेश

---- 

संकलनकर्ता -

श्री रामेश्वर प्रसाद तिवारी

दारागंज, प्रयाग

 

प्रकाशक

श्री शंकराचार्य सेवक समिति

"ब्रह्म - निवास " अलोपीबाग, इलाहाबाद

मूल्य २)

 

प्राक्कथन

पूज्यपाद महाराज श्री के उपदेशों का संग्रह पुस्तकाकार में प्राप्तकरने की तीव्र उत्कण्ठा भक्तजनों के मन में बहुत दिनों से बनी रही। आस्तिक जनता भी प्रतीक्षा कर रही थी कि जिस महापुरुष के द्वारा विगत बहुत वर्षों से लुप्तप्राय उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठ का पुनरुद्धार हुआ है, उनके दिव्योपदेश किस दिन स्वाध्याय के लिये सुलभ हो सकेंगे। अतः सब भक्तों एवं आस्तिक जनों की पवित्र भावनाओं का साकार रूप "श्री शंकराचार्य उपदेशामृत" रूप में संग्रहीत किया गया है।

हमें पूर्ण आहा है कि भक्तगण एवं जन - समाज इस उपदेशरूपी दिव्यवाणी का पावन प्रसाद प्राप्त कर अपने मानव - जीवन को सफल बनायेंगे।

शुभेच्छु -

शन्तानन्द सरस्वती

वर्तमान जगद्गुरु शंकराचार्य, ज्योतिर्मठ

बदरिकाश्रम (हिमालय)

 

प्रस्तावना

भगवद् पूज्यपाद श्रीमद् आद्य शंकराचार्य को ऐसा कौन व्यक्ति है जो न जानता हो। आज से लगभग २००० वर्ष पूर्व दक्षिण भारत के केरल प्रान्त में आपका आविर्भाव ऐसे समय में हुआ, जब वैदिक धर्म परम्परा उछ्छिन्न हो रही थी और धार्मिकता सदा के लिए बिलीन हो रही थी। उस समय आपने भूली हुई जनता को सत्य के मार्ग पर लगाया और वैदिक धर्म की रक्षा की। भविष्य में भी वैदिक धर्म की रक्षा के लिए आपने भारत की चारों दिशाओं में चार धर्मपीठ स्थापित किये - उत्तर में "ज्योतिर्मठ ", दक्षिण में "शृंगेरी मठ ", पूर्व में "गोवर्धन मठ " और पश्चिम में "शारदा मठ " और आदेश दिया कि इन मठों में सदैव एक के बाद दूसरे धर्मांअचार्य शंकराचार्य पद पर सुशोभित होते रहेंगे और भारत में धर्म की रक्षा करते रहेंगे।

किन्तु इधर १६५ वर्ष से उत्तर के 'ज्योतिर्मठ' में कोई धर्मार्चार्य नहीं हुये। ज्योतिर्मठ का नाम तो बना रहा ; किन्तु उसके स्थान एवं उसके चिह्न आदि सर्वथा नष्ट हो गये। इतने अधिक समय तक पीठ उच्छिन्न रहने के कारण उत्तर भारत की धार्मिक जनता में क्षोभ उत्पन्न हुआ। विद्वानों और धर्मपरायण व्यक्तियों ने विचार किया कि किसी प्रकार इस पीठ का पुनरुद्धार किया जाय। यह काम भारत धर्म - महा - मण्डल ने अपने ऊपर लिया और ज्योतिर्मठ के उपयुक्त सुयोग्य महात्मा की खोज की जाने लगी। प्रयास में सफलता मिली और अनन्त श्री विभूषित स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज को सब प्रकार से सुयोग्य और समर्थ जानकर उन्हें शङ्कराचार्य के पद पर सन् १९४१ में अभिषिक्त किया और उन्हीं पर पीठ के पुनरुद्धार का महान् कार्य सौंपा गया।

श्रीमद् आद्य शङ्कराचार्य के आविर्भाव के समय के ही समान यह समय भी कठिन समय था। सामान्य जनता धर्म - विमुख हो रही थी और जनता में धार्मित भावना लुप्त सी हो गई थी। महाराज श्री ने स्थान - स्थान पर जाकर वैद्किक धर्म का प्रचार किया और जन साधारण में धर्मिक जाग्रति उन्पन्न की।

 

()

ऐसा आदेश और उपदेश दिया कि सभी लोग सामान्य जीवन निर्वाह करते हुए किस प्रकार धर्मपरायण बन सकते हैं। आपके उपदेश सरल, मार्मिक्, आकर्षक, हृदयग्राही और मधुर थे। उनमें विलक्षणता थी, क्योंकि वे महाराज श्री के अनुभूत सिद्धन्त थे। आपकी शिक्षा - दीक्षा सभी को सरल, प्रिय और ग्राह्य मालूम पड़ी, इसलिए लाकों कीं संख्या में लोग आपके अनुयायी बन गये।

आपके उपदेशों में ऐसी सम्मोहिनी शक्ति थी कि जहाँ भी आपका भाषण होता, काखों की संख्या में लोग सुनने के लिए एकत्र हो जाते। क्या स्त्री, क्या पुरुष, क्या बालक, क्या वृद्ध, क्या विद्वान्, क्या गँवार, क्या धनी - मानी, क्या निर्धन - सभी दौड़ पड़ते और उपदेश सुनकर ऐसा अनुभव करने लगते कि महाराज श्री बोलते ही रहै और हम उनकी अमृतवानी का पान करते रहें। प्रायः ऐसा देखा जाता था कि उपदेश के समय भीड़ में जहाँ - तहाँ वैठे हुए कुछ व्यक्ति आपके उपदेशामृत नोट करते रहते थे, क्योंकि वे दिव्य शब्द फिर सुनने को नहीं मिलेंगे। उपदेशों की माँग इतनी आधक बढ़ी कि भक्तों को एक दैनिक समाचार - पत्र प्रकाशित करना पड़ा, जकका नाम था "श्री शंकराचार्य उपदेश "। हजारों कि संख्या में इसकी प्रतियाँ छपतीं और शीघ्र ही बिक जाती थीं। बड़ी श्रद्धा और भक्ति से लोग उन्हें खरीदते और पढ़ते थे। खेद है कि आज वह अमृतवाणी दुर्लभ हो गयी।

इसलिए संकल्प हुआ है कि जहाँ से हो सके महाराज श्री के उपदेशों का संग्रह किया जाय और उन्हें पुर्स्तकाकार करके सुरक्षित कर लिया जाय। अतः यह पुस्तक उन्हीं उपदेशों का संग्रह है। आशा है, धार्मिक जनता तथा भक्तगण इसे अपनायेंगे और अपने पूर्व परिचित महाराज श्री की अमृतवाणी का आनन्द लेत हुए अपना मानव जीवन कृतार्थ करेंगे।

 

रामेश्वर प्रसाद तिवारी

 

 

अनुक्रमणिका

क्र ० सं ० पृष्ठ

१. जो सुखी है वही दूसरे को सुखी बना सकता है। १

२. संसार में आये हो - ऐसी चातुरी से काम लो कि मल - मूत्र के भाँड में न आना पड़े। २

३. मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है परन्तु फल भोगने में परतन्त्र है। ५

४. उदर - पोषण में ही चातुरी समाप्त मत कर दो। ७

५. वासनाओं की पूर्ति के पीछे मत पड़ो। ९

६. जो भाग्य में है वह आयेगा अवश्य। १०

७. मनुष्य का शरीर मिला है, इसे व्यर्थ मत जाने दो। १२

८. कर्म से भी मोक्ष सम्भव है। १४

९. जीना उन्हीं का सार्थक है जो जीकर कुछ आगे के लियै बनायें। १६

१०. मृत्युकाल की पीड़ा। १८

११. अन्त न बिगड़ने पाये। १९

१२. जिसका वियोग निश्चितहै उनको सुख का साधन बनाना भारी भूल। २०

१३. शत्रु - मित्र से सम्भाव रखो। २६

१४. दुष्कर्म हो जाय तो कह दो - सत्कर्म करो तो छिपाओ। २८

१५. ऐसा नहीं कि पाप करते जाओ, भगवान् को भजते जाओ। २९

१६. भगवान् की सेवा करना चाहते हो तो हनुमान जी का आदर्श पालन करो। ३०

१७. शक्ति का अपव्यय और बुद्धि का दुरुपयोग न करो। ३२

१८. जैसा देव वैसी पूजा। ३३

१९. झूठे आदमी को कभी शान्ति नहीं मिल सकती, चाहे वह कुवेर के

 

()

समान धनवान हो जाय। ३४

२०. दूसरे में नहीं, अपने में दोष देखो। ३९

२१. संसार प्रेम का पात्र नहीं, उसमें मन को फर्साओगे तो धोखा खोओगे। ३७

२२. पुरस्त्कार के योग्य पुरस्कार और तिरस्कार के योग्य का तिरस्कार करो। ३८

२३. जो आया है सो जायगा। ४०

२४. भगवान् के भजन में लाभ ही लाभ है। ४१

२५. परमात्मा विश्वम्भर है। ४३

२६. जितने दिन जीना है शन्ति से जियो। ४४

२७. शक्ति प्राप्त करो। ४५

२८. साकार - निराकार के झगड़े में न पड़ो। ४७

२९. जैस काछो वैसा नाचो। ४८

३०. प्रेम परमात्मा में और प्रेम की छाया संसार में रखो। ५०

३१. देवत्व से मनुष्यत्व श्रेष्ठ है। ५१

३२. उसकी चिन्ता करो जो सब चिन्ताओं से मुक्त कर सकता है। ५३

३३. जिसे भले - बरे का न्याय करना है वह तुम्हारे सब कार्यों को देख रहा है। ५४

३४. चार वृत्तियों में ही रहो, लोक - परलोक दोनों बनेगा। ५६

३५. सिध्यियों के चक्कर में ठगाये मत जाओ। ५७

३६. जीव - ब्रह्म की एकता। ६१

३७. तृष्णा के त्याग और ईश्वराराधन से ही सुख सम्भव। ६९

३८. योजनायें बना - बनाकर अपने जीवन को उलझन में न डालो। ६५

३९. भगवान का अवतार किस लिए होता है। ६७

४०. मन के थोर्ड़े सहयोग से ही व्यवहार चल सकता है। ६८

४१. लोक - परलोक में सर्वत्र सुख शान्ति चाहते हो तो सर्वशक्तिमान परमात्मा की शरण लो। ७२

 

()

४२. मन को संसार में कोई नहीं चाहता। ७५

४३. पतन से बचना चाहते हो तो पाप से बचो और पुण्य को बढ़ाओ। ७८

४४. मन को संसार में लगाओ, पर इतना ही कि परमार्थ न बिगड़े ७९

४५. भगवान का भक्त कभी दुखी नहीं रह सकता। ८०

४६. कुटुम्बयों की अश्रद्धा होने के पहिले ही भगवान् की ओर झुक जाओ। ८१

४७. भगवान की प्रतिज्ञा अपने भक्तों के लिए - " मैं सब कुछ करने को तैयार हूँ। ८२

४८. रात्रि में सोने से पहिले कुछ जप और ध्यान अवश्य करें। ८४

४९. इन्द्रियों के भोग - विलास में जो निमग्न रहता है वह किसी काम का नहीं रह जाता। ८५

५०. मन की प्रवृत्ति जिधर होती है वह स्वयं रास्ता निकाल लेता है। ८६

५१. राग ही सर्वानर्थ का मूल। ८७

५२. विध्नों के भय से मार्ग नहीं छोड़ना चाहिये। ८८

५३. प्रबृत्ति को अशुभ से रोक कर शुभ में लगाना - यही मुख्य पुरुषार्थ है।

५४. परमात्त्मा से विमुख हो रहे हो - इसी से नाना प्रकार की विपत्तियाँ आ रही हैं। ९१

५५ . प्रारब्ध से पुरुषार्थ बलवान है। ९३

५६. त्यागी और उदार तो बहुत हैं - हो सके तो रागी और कृपण बनने का प्रयत्न करो। ९५

५७. एक भगवान् को मजबूती से पकड़ो तो अनेक की खुशामद नहीं करनी पड़ेगी। ९६

५८. संसार जैसा है वैसा ही पड़ा रहेगा - जब तक यहाँ हो अपना काम बना लो। ९८

 

()

५९. मनुष्य-जन्म दुर्लभ है, इसे सार्थक बनाओ। ९९

६०. शक्ति चाहते हो तो शक्ति के केन्द्र से सम्बन्ध जोड़ो। १०१

६१. जिनके लिए हाव - हाव करके मारे - मारे फिरते हो वे ही जबाब देते हैं। १०२

६२. हाली में गाली व रंग - गुलाल क्यों। १०४

६३. महाअसुर हिरण्यकश्यपु के पुत्र प्रहलाद क्यों भक्त उत्पन्न हुये। १०६

६४. दीन बन कर दीनदयालु की दयालुता का लाभ उठाओ। १११

६५. स्वधर्म पालन और भगवान का स्मरण सदा करते रहो। ११३

६६. भगवचिन्तन और आहार शुद्धि। ११६

६७. गर्भवास में फिर न आना पड़े तभो मनुष्य जन्म सार्थक। ११८

६८. सर्बत्र भगवान का भाव ही भक्तों का लक्षण। १२२

६९. गुरु बदलने में कोई पाप नहीं होता। १२४

७०. जगत भर का ज्ञान प्राप्त कर लो, पर यदि अपने को न ज्ञान पाए तो अज्ञानी ही रहोगे। १२५

७१. तुम तो सच्चिदाननद स्वरूप परमात्मा के अंश हो - अपने को भूलकार ही दुखसागर में डूब रहे हो। १२६

७२. भगवान का नाम जपो, परन्तु विधि के साथ। १२८

७३. ॐकार की जप - स्त्रियों के लिए उसका निषेध। १२९

७४. क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और स्त्री जाति के लिए गुरुत्व नहीं। १३२

७५. स्त्री - समाज का केवल पति - परायण ही रहकर कल्याण। १३४

७६. भगवान् के आज्ञारूप वेद - शास्त्र के अनुसार चलिए। १३६

७७. सदगुरु किसे कहते हैं। १३७

७८. जगदगुरु किसे कहते हैं। १४२

७९. सत्संग की बातों को मनन करना आवश्यक। १४५

८०. घर में रहते हुये महात्मा बनो। १४७

८१. धन - संग्रह से अधिक प्रयत्न बुद्धि शुद्ध करने के लिए करो। १४९

८२. बिना ज्ञान के न भक्ति ही हो सकती है और न मोक्ष ही। १४९

 

()

८३. अच्छे कार्यों को जल्दी करो। १५२

८४. भगवान से लाभ उठाना चाहते हो तो उपासना करके उन्हें एक - देश में प्रकट करो। १५३

८५. सुख चाहते हो तो सुख - सागर की ओर चलो। १५४

८६. भगवान का भजन अवश्य करो - मन लगे या न लगे। १५६

८७. ज्ञान से भगवान के दर्शन का भाव ठीक है - या प्रत्यक्ष दर्शन। १५७

८८. भक्ति और ज्ञान - निराकार और साकार - के झगडे में न पड़ो। १५८

८९. अपने किये का फल तो भोगना ही पड़ेगा। १६६

९०. जैसा मन हो वैसा ही कहो और वैसा ही करो। १६७

९१. मन को संसार में अधिक न फँसाकर भगवान की तरफ लगाओ। १६९

९२. भगवान के पास पहुँचना है तो उनके नाम का सहारा लो। १७३

९३. दुःख की प्रातिभासिक सत्ता है, वास्तविक नहीं। १७५

९४. संसार शोक - सागर ही है, आत्मज्ञानी ही उसे पार कर सकता है। १८१

९५. भवसागर से पार होने का प्रयत्न करो। नौकारूढ़ होकर डूब गये तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा। १८३

९६. सिवाय परमात्मा के कोई सहायक नहीं। १८७

९७. जाति - पांति कल्याण कारक नहीं - भगवान् के भजन और स्वधर्म पालन से कल्याण होगा। १८९

९८. दुर्जन के लिए दुर्जन बनना और निन्दक के लिये स्वयं निन्दक बन जाना उचित नहीं। १९१

९९. त्याग और ग्रहण से मुक्त होकर स्वरूपानन्द में निमग्न हो रही। १९४

१००. अविवेक से मनुष्य बहुत कष्ट उठाते हैं। १९७

१०१. स्वार्थ प्रबल है। १९९

१०२. भौतिकवाद सुख - शान्ति देने में समर्थ नहीं। २००

१०३. उदर - पोषण के लिए अपने भाग्य पर विश्वास रखो। २०२

१०४. जितना हो सके शुभ कार्यों का सम्पादन करो। २०४

१०५. सतर्क रह कर जीवन का सदुपयोग करो। २०८

 

(१०)

१०६. विचार पूर्वक प्रवृत्ति बनाने से ही मन स्मार्ग की ओर जाता। २११

१०७. जो अपना लक्ष्य भूल गया, वह पथ - भ्रष्ट हो ही जायगा। २१४

१०८. जों भगवान की ओर झुका है उसे किसी वस्तु की कभी नहीं। २१६

 

- :: -

 

मुद्रक : देव भारती प्रेस, १०, दरभंगा कालोनी,
इलाहाबाद - - २११००२।

 

 

श्री शंकराचार्य उपदेशामृत

 

ज्योतिष्पीठोद्धारक

upadesh photo

ब्रह्मलीन जगद्गुरु भगवान् शंकराचार्य
श्रीमद् स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज
ज्योतिर्मठ, बदरिकाश्रम
(हिमालय)

 

* वन्दना *

वन्देऽहंं यतिराजराजरमणं योगीन्द्रचक्रायुधम्।

चातुर्वर्ग्यंफलप्रदं सुविहितं मोक्षच्छटाच्छादितम्॥

योगानन्दतरंगतानतननं त्रैलोक्यनाथं शिवम्।

ब्रह्मानन्दसरस्वतिं गुरुवरं ज्योतिर्मठाधीश्वरम्॥

*

 

जो सुखी है वही दूसरे को सुखी बना सकता है

*

परमात्मा के सम्पर्क में ही जीव वास्तविक सुखी हो सकता है क्योंकि उसी में सुख की पराकाष्ठा है

जिसके पास जो कुछ होता है, वही वह दूसरों को दे सकता है। किसी कंगाल से कोई धन की याचना करे तो मूर्खता ही तो है। जिस प्रकार धन की राशि से ही धन प्राप्त किया जा सकता है, विद्यानिधि (विद्वान्) से ही विद्या की प्राप्ति हो सकती है, उसी प्रकार सुखराशि जो भगवान् हैं, उन्हीं से सुख की प्राप्ति हो सकती है।

संसार में भगवान् के कृपापात्र भक्तों को छोड़ कर कोई भी सुखी नहीं है। आध्यात्मनिष्ठ परमात्मा के भक्त ही यहाँ सुख का अनुभव करते हैं अन्यथा सभी को कुछ न कुछ दुःख धेरे ही रहता है। संसार में कोई सुखी नहीं देखा जाता। जिसके पास जो वस्तु नहीं होती वह दूसरे को उसके द्वारा सुखी मानता है। किन्तु जिसके पास वह है, उसको देखा

 

()

जाय तो उससे वह अपने को सुखी नहीं मानता। जिसके पुत्र नहीं है वह पुत्रवालों को सुखी मानता है, पर पुत्र से कितना सुख है, यह किसी पुत्रवान से पूछो। मालूम होता है, वास्तव में किसी भी लौकिक - पदार्थ में सुख नहीं है। सुखस्वरूप तो सच्चिदानन्द - रूप परमात्मा ही है और उसी के सम्पर्क में आने से जीव भी सुखी हो सकता है और सुखी होने का दूसरा मार्ग नहीं है। परमात्मा ही ऐसा 'जनरल मर्चेन्ट' है जिसके यहाँ सुख की किसी भी सामग्री का अभाव नहीं होता। किन्तु उसकी कृपा प्राप्त करने के लिये विधिवत् प्रयत्न करना पड़ेगा, केवल परमात्मा का माहात्म्य पाठ करने से कुछ होगा नहीं। बीजक का पाठ करते रहो तो क्या धनी हो सकते हो?

संसारियों से सुख प्राप्ति को इच्छा करना भूल है। भला जो स्वयं दुखी है वह दूसरे को सुखी क्या बनायेगा? संसार में जो सुख दिखता है वह सब सापेक्ष सुख है। किसी से कोई किसी अंश में सुखी है तो कोई अन्य किसी अंश में।

किसी से सुख की याचना करनी ही है तो ऐसी जगह के याचक बनो, जहाँ से सर्व सुख प्राप्त हो सके। स्मरण रखो कि जो परमात्मा की तरफ झुका है वही संसार में सुख - शान्ति प्राप्त कर सकता है, दूसरा नहीं। संसार में सुख दूँढ़ना

 

()

ऐसा है जैसा कि प्यास बुझाने के लिए ओस की बूँदों का संग्रह करना।

 

संसार में आये हो - ऐसी चातुरी से काम लो कि फिर लौट कर मल - मूत्र के भांड में न आना पड़े

*

भगवान् की कृपा से ही यह पल्लेदारी छूट सकती है।

जीवन जाने कितने जन्मों से पल्लेदारी करता चला आ रहा है - कभी हाथी का पचास मन का शरीर, कभी चींटी का आधीरत्ती का शरीर, कभी मनुष्य का शरीर, कभी किसी का शरीर - यह जो ढोना पड़ रहा है वह पल्लेदारी भगवान् की कृपा से ही छूट सकती है।

ऐसा करो कि इसी जीवन में भगवान् की कृपा प्राप्त हो जाय और मल - मूत्र के शरीर में फिर न आना पड़े। यह तभी होगा जब कि भगवान् की आज्ञाओं का पालन करोगे। वेद शास्त्र का आदेश ही भगवान् की आज्ञा है।

जिस वर्ण में हो और जिस आश्रम में हो, उसी के

 

()

अनुसार स्वधर्म पालन करो और हर समय भगवान् का स्मरण करते रहो।

प्रतिदिन सायंकाल और प्रातःकाल नियमपूर्वक उपासना करो और अपनी व्यावहारिक व्यवस्था ऐसी रखो कि जहां तक हो सके अपने से दूसरों की भलाई ही हो और यदि किसी की भलाई ही हो और यदि किसी की भलाई न हो सके तो कम बुराई न होने पाये।

भगवान् को सर्वत्र उपस्थित देखना बहुत आवश्यक है। सर्वत्र भगवान् को उपस्थित देखोगे तो कोई पाप नहीं होगा। पहले जो पाप हो गया वह तो नष्ट हो जायगा, पर जब से भगवान् के नाम को अपनाओ तब से पाप से बचो, नहीं तो उन पापों का छुटकारा कठिनाई से होगा। क्योंकि पहले के किये हुये पाप तो गंगास्नान से नष्ट हो जाते हैं ; परन्तु गंगा में, तीर्थ में जो पाप करता है वह 'बज्र लेपो भविष्यति' अर्थात् वह पत्थर की लकीर के समान हो जाता है जो छुटाया नहीं छूटता। इसलिये भगवान् का स्मरण करते समय पाप करने से डरो।

स्वधर्म - पालन पूर्धक भगवान् का भजन करोगे तो पिछले सब जन्म - जन्मान्तरों के पाप कट जायेंगे और सुख - शान्ति का अनुभव करते हुए अन्त में भी सद्गति होगी।

X X X

 

()

मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है

परन्तु फल भोगने में परतंत्र

*

इसलिये ऐसे ही कर्म करो जिसका फल उत्तम हो

चोरी करने में चोर स्वतंत्र है परन्तु फल तो न्यायालय के अधीन है, जितनी सजा दी जायगी उसको भोगना ही पड़ेगा - चाहे इच्छा हो या न हो। मनुष्य जैसा चाहे वेसा कर्म कर सकता है। पुष्य कर्मों को करके स्वर्गादि लोकों में जाकर दिव्य भोगों को भोग सकता है या पाप कर्म करके रौरव आदि महा भयंकर दुःखदायी नरक को प्राप्त हो सकत है।

मनुष्य - योनि कर्म - योनि मानी गई है। यहाँ मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है अर्थात् वह जैसा कर्म करना चाहे कर सकता है। मनुष्य चाहे तो साक्षात् सर्वंशक्तिमान सच्चिदानन्द परमात्मा से मिल सकता है।

मनुष्य जो कर्मं करता है उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है। कोई कर्मं मनुष्य कर ले और चाहे कि उसका फल न भोगना पड़े तो ऐसा नहीं हो सकता। हां, यह अवश्य है कि -

'धर्मेंण पापमपनुदति'

धर्म करने से पाप नष्ट होता है। तो यदि किसी से कभी

 

()

कोई पाप - कर्म हो गया हो तो उसे चाहिये कि उसको नष्ट करने के लिये पुण्य कार्य करे। पुण्य बढ जायगा तो पाप दब जायगा। इसीलिये कहा गया है -

'जपतो नास्तिपातकम्'

भगवन्नाम मंत्र का जप करने से पाप नष्ट होता है। इसलिए यदि किसी के द्वारा अभी तक अविहिताचरण और पाप - कर्म अधिक हुये हैं और वह उन समस्त पापों से छुटकारा पाना चाहता है तो पुण्य - कर्म (शुभ - कर्मं) करने लग जाय और श्रद्धा - भक्ति पूर्वक अपने योग्य (उपयुक्त) भगवान् के नाम (मन्त्र) का जप करने लग जाय। ऐसा करने से धीरे - धीरे पिछले पाप नष्ट हो जायँगे और कुछ समय में वह गढ़ा पूरा होकर आगे के लिये शुभ फल संचित होने लगेगा और उसी के सहारे सद्गति हो जायगी।

अनिच्छा से भी यदि भगवान् का स्मरण किया जाय तो उससे पापों का नाश होता है। जैसे बिना इच्छा के भी यदि अग्नि छू जाय तो वह जला देती है। तात्पर्य यह कि जैसे अग्नि का स्वभाव है कि जो संपर्क में आये उसे जला दे, इसी प्रकार भगवान् का स्वभाव है कि जिसने उनका स्मरण किया उसके पापों को वे नष्ट कर देते हैं।

जन्म - जन्मान्तरों का बिगड़ा हुआ मन है, इसलिये भगवान् के प्रति प्रेम बनाने में तो कठिनाई है पर मलिन व

 

()

दूषित मन से भी यदि भगवान् का चिन्तन किया जायगा तो भी भगवान् की कृपा प्राप्त होगी।

इसमें एक बात यह समझने की है कि मन पहले का चाहे जितना दूषित हो, पहले का चाहे जितना दुराचारी व पापाचारी हो, उसकी परवाह नहीं। परन्तु ऐसा नहीं है कि भगवान् के नाम की पापनाशनी शक्ति के बल पर पाप करते रहो।

X X X

 

उदर पोषण में ही सारी चातुरी समाप्त मत

कर दो

सब से चतुर वही है जो भगवान् की उपासना

करता है

*

भजन करने से कोई बच नहीं सकता। भगवान को नहीं भजोगे तो राजा, रईस, सेठ, साहूकारों को भजना पड़ेगा

आजकल लोग अपने को बड़ा बुद्धिमान समझते हैं। पर उनकी सारी चातुरी पेट के आसपास ही रहती है। उदर में ही उनकी सारी चातुरी समाप्त हो जाती है। पेट के आगे बुद्धि ही नहीं जाती। वे उदर रूपी फोड़े की मलहम - पट्टी करने

 

()

में ही सारा समय लगा देते हैं और इसी में सारा जीवन नष्ट कर देते हैं। वास्तव में, इससे अधिक घाटा मनुष्य जीवन में और दूसरा नहीं हो सकता।

भजन तो करना ही पड़ेगा। भजन करने से कोई बच नहीं सकता। 'सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुसमर्थ' भगवान को नहीं भजोगे तो विषयी - पामर, राजा, रईस, सेठ साहूकारों को भजना पड़ेगा। किसी बड़े का सहारा नहीं लोगे तो छोटों का सहारा लेना पड़ेगा। इसलिए वृद्धिमानी इसी में है कि परमात्मा का सहारा लिया जाय जो लोक - परलोक दोनों जगह काम दे। मनुष्य चाहे जितना भी ऐश्वर्य सम्पन्न हो जाय पर फिर भी उसका ऐश्वर्य सीमित ही रहेगा और कभी भी प्रारब्ध बदलने पर्, वह दीन हो सकता है। इसलिए जिसकी स्वयं की स्थिति निश्चित नहीं उसका सहारा लेकर घोखा ही तो उठाना होगा। सबसे चतुर वही है जो परमात्मा का भजन करता है, वह लोक - परलोक में सर्बत्र सुखी रहता है।

X X X

 

()

वासनाओं को पूरा करने के पीछे मत पड़ो

*

शरीर यात्रा के लिये आवश्यक कर्मों को करते हुए

मुख्य ध्यान परमात्मा की प्राप्ति में रखो

भगवान् विष्णु जिनके पुत्र रूप में आये और देवराज इन्द्र जिन्हें अपना अर्द्धासन देता था ऐसे समर्थ शक्तिशाली चक्रवर्ती नरेन्द्र दशारथ भी अपनी सारी वासनायें पूरी न कर सके - राम के राज्याभिषेक की वासना लिये हुए बैल के समान करण पीट - पीट कर उनकी मृत्यु हुई। जब इस प्रकार सामर्थ्यशाली पुरुषों की ही सब आशायें और वासनायें पूरी नहीं हुई, तब आप लोग अपनी सम्पूर्ण इच्छाओं की तृप्ति की आशा स्वप्न में भी मत रखो - जाग्रत अवस्था की तो बात ही क्या।

परमार्थ और व्यवहार दोनों साथ - साथ ही चलते हैं, क्योंकि स्वरूप से कर्मों का त्याग नही किया जा सकता। कर्मों के त्याग करने पर मनुश्य की शरीर - यात्रा भी सम्भव नहीं हो सकती। परन्तु इतना ध्यान अवश्य ही रखना चाहिये कि शरीर - यात्र के लिये आवश्यक कर्मों को छोड़कर शेष वासनाओम् को पूरा करने के पीछे न पड़ जाओ। संसार में

 

(१०)

बड़े से बड़े शक्तिशाली मनुष्य हुए परन्तु उनकी भी सम्पूर्ण वासनायें पूर्णं न हो सकीं। इसलिये शरीर यात्रा के लिये आवश्यक कर्मों को करते हुए मुख्य ध्यान परमात्मा की प्रात्ति में लगाओ।

विषयों को भोगकर इन्द्रियों को तृप्त करने की बात सोचना ऐसा ही है जैसे खुजलाकर खाज को अच्छा करने की आशा करना। संसार के व्यवहार उलझे हुए कच्चे सूत के समान हैं, जितना सुलझाने की चेष्टा करोगे उतने ही ये उलझेगें। इसलिये बुद्धिमानी पूर्वक संसार का व्यवहार चलाते हुए मुख्य बुद्धि पर्मार्थं में ही रखना चाहिये।

X X X

 

जो भाग्य में है वह आयेगा अवश्य

और उसे भोगना ही पड़ेगा

*

इसलिये सम्पत्ति - विपत्ति जो जब आये धैर्यं पूर्वंक भोगते चलो

मनुष्य निष्क्रिय होकर कभी बैठ नहीं सकता। मन, बुद्धि, प्राण तथा इन्द्रियों के द्वारा कुछ न कुछ चेष्टा करते रहना मनुष्य का स्वभाव है। अपने अपने संस्कारानुसार

 

(११)

प्रत्येक मनुष्य स्वभावतः ही कार्य में प्रवृत्त होता है। अतः क्रिया में प्रवृत्ति होना स्वभाविक है। यह सिद्धांत है कि जैसा कर्म होगा वैसा फल कर्म करने वाले को अवश्यमेव भुगतना पड़ेगा। अल्प समय में किये हुये कर्म का फल चिरकाल तक भोगना पड़ताँ है। अतः एक जन्म में किये हुये सम्पूर्ण कर्मों का फल दूसरे जन्म में भोगकर समाप्त नहीं किया जा सकता। बिना भोगे कर्मों की राशि सञ्चित् होती जाती है। जब तक यह कर्मों की राशि समाप्त नही हो जाती तब तक जीव को पुनः पुनः गर्भ में आना ही पड़ेगा। अतः मनुष्य जीवन पाकर इस कर्म राशि को समाप्त करना चाहिये।

शास्त्रों ने कर्मों को तीन विभाग कर तीनों को समाप्त करने के उपाय बतलाये हैं। सञ्चित, प्रारब्ध और क्रियमाण - यह कर्मं के तीन विभाग हैं। सञ्चित कर्म अनन्त हैं। वे भोग कर समाप्त नही किये जा सकते। उनको समाप्त करने का उपाय या तो ज्ञान की प्राप्ति है अथवा भगवान् के चरणों में अनन्य भक्ति। प्रारब्ध कर्म भोगने से ही नष्ट होंगे, अन्य कोई उपाय नहीं। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्मं शुभाशुभम्। क्रियमाण कर्म भगवान को अर्पण कर देने से बन्धन के हेतु नहीं होते। इस प्रकार सञ्चित कर्म ज्ञानाग्नि से दग्ध करके, प्रारब्ध कर्म भोग कर और क्रियमाण कर्म भगवान को समर्पण करके कर्म - बन्धन से मुक्त हो जाने को ही मोक्ष कहते हैं।

 

(१२)

यदि साधन हीन होने के कारण ज्ञान की प्राप्ति में देर है तो कम से कम क्रियमाण कर्म तो भगवान को अर्पण करते जाओ। ऐसा करने से इस जन्म के कर्म बन्धन के हेतु नहीं बनेंगे। साथ ही यह बिचार भीं पुष्ट करलो कि प्रारध्ध भोग तो भोगना हो पड़ेगा, ज्ञानी भी इससे बच नहीं सकता। अतः प्रारब्ध वश आये हुये दुःखों को वीरता पूर्वक सहन करो। आपत्तिकाल में भी धैय को न छोड़ो। इसी प्रकार सुख की प्राप्ति होने पर प्रमादी मत बनो। ऐसा करने से पुण्य का संचय होगा और लोक - परलोक दोनों बनेंगे।

X X X

 

मनुष्य का शरीर मिला है, इसे व्यर्थ न जाने दो

*

अपने कल्याण का मार्ग समझो और उस पर चलो

पेट की चिंता में और शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध आदि विषयों को भोगने की वासनाओं में ही पड़े रहकर जीवन का अमूल्य समय नष्ट न कर दो। यह तो पशु - पक्षी, कीट - पतंग आदि योनियों में भी करते आये हो। मनुष्य होकर भी यदि यही किया तो फिर उसी चौरासी लक्ष योनियों के चक्कर में पड़े रहोगे ; छुटकारा मिलना कठिन है। मनुष्य शरीर की

 

(१३)

की कीमत करो। विचार से काम लो। अपने वास्तविक कल्याण का मार्ग समझो और ऐसा करो कि चार - चार फिर गर्भं की काल - कोठरी में न आना पड़े।

अपने जीवन को धार्मिक बनाओ। धर्म का बन्धन स्वीकार करना कल्याणकारी है। स्वतंत्र हो गये हो तो ऐसा मत सोचो कि हम धर्म के तंत्र में भी नहीं रहेगे। धर्म के तंत्र में रहैओगे तो लोक में भी उन्नति करोगे और परलोक भी उज्ज्वल रहेगा।

धर्म - तन्त्र से अपने को मुक्त मानोगे तो उछृंखल अधर्म - तंत्र में फँस जाओगे और अपना सर्वनाश कर बैठोगे। स्वधर्म को अपनाओ। स्वथर्म - पालन ही एक ऐसा उपाय है जिससे मनुष्य - जीवन कृतार्थ हो सकता है।

अपने जीवन के व्यक्तिगत, सामाजिक, राजनैतिक, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय सभी क्षेत्रों में स्वधर्म पालन की आवश्यकता है। सभी क्षेत्रों में देह, इन्द्रिय, मन और बुद्धि की हलचलों को धर्मानुकूल रखने से ही अधर्मं से बचोगे।

धर्मं की उपेक्षा करने का अर्थ है, अधर्म को अपनाना। जीवन के जिस क्षेत्र में धर्म की उपेक्षा करोगे उसी क्षेत्र में अधर्म का प्राधान्य हो जायगा और वह क्षेत्र तो कलुषित

 

(१४)

होगा ही, साथ ही उसके सारे अधर्म का फल व्यक्तिगत रूप से अकेले भोगना पड़ेगा। कर्त्ता ही कर्मं का जिम्मेदार होता है। इसलिये जीवन दे व्यक्तिगत अथवा सामाजिक अथवा राजनैतिक किसी भी क्षेत्र में कोई भी काम करो तो विचार कर लो कि धर्म के विरुद्ध तो नहीं हो रहा है। जितना अंश धर्म के विरुद्ध हो उतना कार्यान्वित मत करो। धर्म - विरुद्ध कार्य किसी की रजोगुणी, तमोगुणी बुद्धि में भले ही लाभदायक जँचे, परन्तु परिणाम में वे बलहीन और अनर्थकारी ही होते हैं। तात्पर्य यह है कि धर्मावलम्बन सदा कल्याणकारी और अधर्मावलम्बन या परधर्मावलम्बन सदा अनर्थकारी होता है।

X X X

 

कर्म से भी मोक्ष सम्भव

*

निष्काम कर्मयोग का सहारा लेकर

प्रत्येक मनुष्य भवसागर पार हो सकता है।

निष्काम कर्म का अर्थ यह नहीं है कि बिना कामना के कर्म करो, क्योंकि बिना कामना के तो कोई भी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। प्रवृत्ति होने में दो हेतु हुआ करते हैं - एक इप्ट [ इष्ट ] साधन का ज्ञान अर्थात् इस बात का ज्ञान कि यह कार्य करने

 

(१५)

से हमें इष्टकी (सुख की) प्राप्ति होगी ; और दूसरा कृत - साध्यता का ज्ञान अर्थात् यह ज्ञान कि इस कार्य को हम कर सकेंगे। यह दो बातें निश्चय हो जाने पर ही किसी कार्य में मनुष्य की प्रवृत्ति होती है। दो में एक भी बात में सन्देह हो जाय तो प्रवृत्ति नहीं होती। इसलिये कामना पूर्वक ही कर्म में प्रधृत्ति [ प्रवृत्ति ] होती है। अतः निष्काम कर्म का अर्थ यही निकलता है कि जो कर्म किया जाय भगवान को अर्पण करने के लिये ही किया जाय। भगवान के निमित्त किये हुए कर्म ही निष्काम कर्म कहलाते हैं। भगवान को जो कर्म अर्पण किये जाते हैं वह बन्धन के हेतु नहीं होते। तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में ही है ; फल की कामना कभी मत करो। क्योंकि जीव जन्म - जन्मान्तरों से गरीबी भोगता चला आ रहा है ; इसको माँगने का भी सहूर [? सहार ] नहीं है, न जाने क्या माँग ले। जब कोई माँगता है तो अपनी हैसियत से माँगता है। जीव यदि कर्मों के फल को इच्छा करेगा तो अपनी हैसियत से छोटे फल की ही इच्छा करेगा और यदि भगवान पर ही सौंप दे तो भगवान जो सर्वज्ञ शक्तिमान हैं अपनी हैसियत से उसे ऊँचा से ऊँचा प्रदान करेंगे।

भगवदर्पण बुद्धिपूर्वक कर्म करने वाला मनुष्य भगवान के लोक को प्राप्त होकर निष्ठानुसार सालोक्य सामीप्यादि मुक्ति प्राप्त कर लेता है और जन्म - मरण के बन्धन से सदा के

 

(१६)

लिए छुट जाता है। कर्म करते हुए कर्मबन्धन से छुटकारा पाकर मोक्ष प्राप्त करने का यही उपाय है।

X X X

 

जीना उन्ही का सार्थक है

जो जीकर कुछ आगे के लियै बनायें

*

संसारी लोग जितनी चेष्टा धनवान, पुत्रवान, प्रतिष्ठवान बनने के लिये करते हैं उतना प्रयत्न भगवत् भक्त और ज्ञानवान बनने का नहीं करते। जो परम सुख का साधन है, उसकी उपेक्षा करके दुःख के साधनों का संग्रह करते हैं। किसी भी संसारी वस्तु से कोई कभी सुखी नहीं हो सकता है। संसारी वस्तुओं से सुख प्राप्ति की इच्छा उसी प्रकार है जैसे बन्ध्या के पुत्र के विवाह की तैयारी - वन्ध्या का पुत्र ही नहीं है तो उसका विवाह क्या होगा! धन, स्त्री, पुत्रादि संसारी वस्तुओं में सुख जब है ही नहीं, तो इनसे सुख मिलेगा कैसे! परन्तु अविवेक से अनिष्ट में इष्ट बुद्धि कर ली गई है।

जीना ऊन्हीं का सार्थक है जो जीकर कुछ आगे के लिये बनाना चाहते हैं। 'यदि झोली भरना और खाली करना इतना ही है', तो मनुष्य जीवन निरर्थक ही जा रहा है, ऐसा

 

(१७)

मानो।'उदर (पेट) की झोली सबेरे भरो और शाम को खाली करो' यदि इतना ही करते हुए जीना है तो जीना व्यर्थ ही है। जींने की इच्छा इसलिये रखो कि अभी भगवान् का दर्शन नहीं हुआ है उसी के लिये साधन करने के लिये जीना है।

बीज जब सेंक दिया जाता है तो फिर उसमें अंकुर नहीं निकलता। इसीं प्रकार मनुष्य का मन जब ज्ञान और भक्ति की गरमी से सेंक दिया जाता है तो फिर उसमें जन्म - मरण का अंकुर नहीं होता। इसलिये भक्तिमान् और ज्ञानवान् बनने का प्रयत्न करो। परन्तु ऐसे ज्ञानी न बनो कि धन, स्त्री, पुत्रादि से संसार में प्रेम तो बना रहे और 'शिवोहं शिवोहं, ॐ ॐ और अहं ब्रह्मास्मि' कहने लगे ; लोग जब अपने को ब्रह्म कहने लगते हैं तो फिर धर्म - कर्म से भी दूर हट जाते हैं और उधर निष्ठा पुष्ट होती नहीं। इसलिये जब तक संसारी वस्तुओं से प्रेम नहीं हटा है तब तक ब्रह्म के फेर में न पड़कर भगवान की भक्ति करनी चाहिये। भक्ति करते - करते जब भगवान में अतिशय राग हो जायगा तो फिर जन्म - मरण के चक्कर से छूट जाओगे।

X X X

 

(१८)

१०

मृत्यु - काल की पीड़ा

*

जन्म लेने में जो कष्ट होता है उससे कई गुना अधिक कष्ट मरण काल में होता है। शास्त्रों मे कहा है कि सहस्रों बिच्छुओं के एक साथ दंश करने से जो पीड़ा हो सकती है उससे भी अधिक पीड़ा मरने में होती है। एक बिच्छू के दंश करने पर पीड़ा सहन करना कठिन होता है। यदि सहस्रों बिच्छू एक साथ दंश करें तो क्या दशा होगी! इसी से मृत्यु - काल की पीड़ा का अनुमान किया जा सकता है।

जन्म - मरण की पीड़ा के अतिरिक्त जीवन - काल की पीड़ाओं का अंअन्त नहीं। बिना ईश्वर को प्राप्त किये इससे छुटकारा होना असम्भव है। संसार में जब तक मोह बना हुआ है तब तक पुनः संसार में ही आना पड़ेगा। अशुद्ध भावनाओं से अशुभ वासनाओं का वाध करना चाहिये और फिर केवल ईश्वर - प्राप्ति की ही एक वासना प्रबल करनी चाहिये। यह वासना इतनी पुष्ट हो जाय कि अन्य कोई वासना इसके सम्मुख उदय न हो सके।

X X X

 

(१९)

११

अन्त - काल न बिगड़ने पाये

*

प्रायः यह देखा जाता है कि जिस बात का जो अधिक चिन्तन करता है अथवा जिसका उसे अधिक अभ्यास होता है, अन्त समय में उसी का स्मरण आता है। यदि कोई वेद - पाठी पागल हो जाय तो अपने पागलपन में भी वह वेद की ऋचाओं को दोहरायेगा। मृत्यु - काल की पीड़ा में होश ठिकाने नहीं रहता है। उस समय उसी का स्मरण होने की सम्भावना अधिक है जिसका जीवन भर अभ्यास किया है। आदि की बिगड़ी बन जाती है परन्तु अन्त की बिगड़ी नहीं बनती। इसीलिये कहा है कि 'अन्त भला सो भला।' अपना अन्त - काल न बिगड़ने पाये, इसकी तैयारी अभी से करने लगो। यही बुद्धिमानी है।

X X X

 

(२०)

१२

जिसका वियोग निश्चित है, उसे सुख का साधन

बनाना भारी भूल

*

संसार में प्रेम बड़ाओगे तो जन्म - जन्मान्तर तक रोना पड़ेगा

सब का यहाँ नदी - नाव की तरह संयोग है। जहाँ हो, जिस परिस्थिति में हो, वहीं चातुरी से काम लो। सब का प्रोग्राम अपना अलग - अलग बना है। छान - बीन करोगे तो कोई किसी का साथी नहीं मिलेगा, केवल 'मैं और मेरा' ही दिख पड़ेगा। वास्तव में यहाँ संसार में किसी की अपनी स्थिति पुष्ट नहीं है तो दूसरे का कोई क्या होगा। सबका जीवन पत्ते के पानी की तरह है, चाहे जब ढल जाय। कर्माधीन जिसका जहां जन्म हों गया है, उसे वहीं अपना धर्म पालन करते हुए भगवान को स्मरण करते हुये समय को बिताना चाहिये। आवश्यक व्यावहारिक कार्यों को करो, परन्तु ऐसी बुद्धिमानी से करो कि वह कर्म आगे के परलोक - मार्ग में बाधक न हो। चातुरी वही है जो लोक - परलोक दोनों उज्वल बनाये। किसी को धोखा देकर उससे कुछ ठग लेना चातुरी नहीं, वह तो मूर्खता है। जिसको अपना भविष्य नहीं सूझ रहा है, क्या उसको चतुर कहा जा सकता है।

 

(२१)

हमारा तो यही कहना है कि ठगो मत, चाहे ठगा जा। अपने धर्म - कर्म का भरोसा रखो। चालाकी और बेईमानी का भरोसा मत रखो। संसार में ऐसे रहो जैसे कि यहाँ का काम भी चलता जाय और परलोक का मार्ग भी उज्वल बनता जाय। यह तभी होगा जब अपने - अपने धर्म का पालन करते हुए भगवान का स्मरण करते चलोगे। ऐसा करोगे तभी जन्म - मरण के बंधन् से मुक्त होकर इस मलमूत्र के शरीर से छुटकारा मिलेगा। नहीं तो बार - बार इसी में लौट - लौट कर आना पड़ेगा।

संसार के सब पदार्थों का वियोग होता है। वियोगान्त वस्तु प्रेमास्पद (प्रेम करने योग्य) नहीं। जिसका वियोग निश्चित है उससे प्रेम करने की आवश्यकता नहीं। प्रेम करोगे तो रोना पड़ेगा और एक ही जन्म में नहीं रोना पड़ता, कई जन्म तक रोना पड़ता है। इस पर एक दृष्टांत है। एक बार महर्षि नारद किसी नगर से होकर जा रहे थे। एक वैश्य ने उनका आतिथ्य सत्कार किया। उसकी श्रद्धा - भक्ति देख कर उन्होंने उसका एक गिलास दुग्ध पी लिया। वेश्य ने पूछा -

महाराज, कहाँ से आ रहे हो?

नारद जी ने कहा - स्वर्ग से।

वैश्य ने पूछा - महाराज, अब यहाँ पधारोगे?

 

(२२)

नारद जी ने कहा - थोड़ा मृत्युलोक में घूम कर फिर स्वर्ग लौट जायेंगे।

वैश्य ने प्रार्थना की - महाराज, लौटते समय हमें भी स्वर्ग लेते चलें तो बड़ी कृपा होगी।

नारद ने कहा - अच्छा ले, चलेंगे।

कुछ् दिनों के पश्चात् नारद जी घूम - फिर कर लौटे तो पूछा - सेठजी, स्वर्ग चलोगे?

सेठजी ने कहा - महाराज, चलना तो अवश्य है पर अभी ये लड़के बहुत छोटे नासमझ हैं। ये लोग गृहस्थी का काम संभाल नहीं सकेंगे। थोड़े दिन में ये काम - काज सँभालने योग्य हो जायँ तब चलेंगे।

नारद जी चले गये। थोड़े दिन में वे फिर लौटे। पूछा - सेठजी अब चलोगे?

सेठजी ने कहा - हाँ महाराज, अब तो लड़का बड़ा हो गया है, काम - काज भी कुछ देखने - सुनने लगा है, परन्तु यह अभी अपनी पूरी जिम्मेदारी नहीं समझता। अगले वर्ष इसका विवाह कर दें फिर निश्चिन्त हो जायँ तब चलेंगे। चार वर्ष बाद नारद जी। फिर लौटे तो दुकान पर लड़के से पूछा कि सेठ जी कहाँ हैं? लड़के ने कहा - महाराज, क्या बतायें।

 

(२३)

एक ही तो हमारे घर में पिता जी सब सँभाले हुए थे, उनका शरीर छूट गया, तब से हम तो बड़ी परेशानी में हैं।

नारद जी ने ध्यान लगा कर देखा तो मालूम हुआ कि सेठजी मर कर बैल हुए हैं। नारद जी बैल के पास गये और कहा कि सेठ जी अब तो मनुष्य शरीर भी छूट गया, अब स्वर्ग चलोगे न?

बैल ने कहा - महाराज! आपकी बड़ी कृपा है। मैं भी चलने को तैयार हूँ, पर सोचता हूँ कि घर के और बैल इतने सुस्त हैं कि आगे मैं न चलूँ तो कुछ काम ही न हो। कुछ नये बैल आने वाले हैं तब तक मैं इनका काम स।ंभाल दूं, फिर आप कृपा करना मैं अवश्य चलूँगा।

नारद जी फिर दो - चार वर्ष बाद लौटे। उन्हें तो अपना वचन पूरा करना था और वैश्य का एक गिलास् दूध चुकाना था ; इसीलिये बार - बार उसके पास आते थे। इस बार आये तो बैल नहीं दिखा। लड़कों से पूछा कि तुम्हारे यहाँ जो बूढ़ा बैल था वह कहाँ गया? लड़कों ने दुःखी होकर कहा कि महाराज! बड़ा मेहनती बैल था। सब से आगे चलता था। जब से मर गया है तब से वैसा दूसरा बैल नहीं मिला।

नारद जी ने ध्यान करके देखा तों मालूम हुआ कि इस बार सेठ जी कुत्ता होकर घर के आगे पहरा दे रहे हैं। कुत्तों

 

(२४)

से पास जाकर नारद जी ने कहा - कहो सेठ जी! क्या समाचार है? तीन जन्म तों हो गया, अब स्वर्ग चलने के सम्बन्ध में क्या विचार है?

कुत्तों ने कहा - महाराज! आप बड़े दयालु हैं। एक ओर मैं आपकी दयालुता देखता हूँ और दूसरी ओर लड़कों का आलस्य और बदइन्तजामी। महाराज! ये इतने आलसी हो गये हैं हि मैं दरवाजे पर न रहूँ तो दिन में ही लोग इन्हें लूट ले जाँय। इसलिये सोचता हुँ कि जब तक हूँ, तब तक इनकी रक्षा रहे तो अच्छा। थोड़े दिन में जरूर चलूँगा।

नारद जी फिर लौट गये। चार - छै वर्ष में फिर आये तो कुत्ता दर्वाजे पर नहीं दिखा। लड़कों से पूछा तो पता चला कि वह मर गया है। ध्यान लगाकर देखा तो मालूम हुआ कि इस बार सर्प होकर उसी घर के तलघर में कोष की रक्षा करते हुए बैठे हैं।

नारद जी वहाँ पहुँचे। कहा - कहिये सेठ जी! यहाँ आप कैसे बैठे हैं? स्वर्ग चलने का समय अभी आया कि नहीं?

सर्प ने कहा - महाराज! ये लड़के इतने फिजूलखर्ची हों गये हैं कि मैं न होता तो अब तक खजाना खाली कर देते। सोचता हूँ कि मेरी गाढ़ी कमाई का पैसा है, जितने दिन रक्षित रह जाय उतना ही अच्छा है। इसीलिये यहाँ मेरी

 

(२५)

आवश्यकता है, नहीं तो मैं तो चलने को तैयार ही हूँ।

नारद जी फिर निराश होकर लौटे। बाहर आकर उन्होंने बड़े लड़के को बुलाकर कहा कि तुम्हारे खजाने में एक भयंकर कालरूप सर्प बैठा हुआ है ; ऐसा न हो कि कभी किसी को हानि पहुँचा दे। इसलिये उसे मारकर भगा दो। ऐसा मारना कि उसके सर में लाठी न लगे। सर में लाठी पड़ने से वह मर जायगा। मरने न पावे और कूट - पीट कर उसको खजाने से बाहर कर दो।

महात्मा का आदेश पाकर लड़कों ने वैसा ही किया। सारे शरीर में लाठियों की मार लगाकर उसको लस्त कर दिया और घर के बाहर फेंक आये।

वहाँ जाकर नारद जी उससे मिले और कहा - कहिये सेठ जी! लड़कों ने तो खूब पुटपुटी लगाई ; अभी आपका मन भरा या नहीं? फिर वापिस जाकर घर की रक्षा करोगे या अब चलोगे स्वर्ग? सर्प ने कहा - हाँ महाराज! अब चलेंगे।

तात्पर्य यह है कि गृह में, पुत्र में, धन में, स्त्री आदि में प्रेम हो जाने पर कई जन्म तक वह प्रेम - बन्धन शिथिल नहीं होता और कई जन्मों तक उसी के कारण अनेक यातनायें सहनी पड़ती हैं। इसीलिये कहा जाता है कि संसार में

 

(२६)

प्रेम मत फँसाओ। यहाँ प्रेम करोगे तो कई जन्म तक रोना पड़ेगा।

X X X

१३

शत्रु और मित्र में समभाव रखो

दोनों अपने ही दुष्कृत और सुकृत के फल हैं

*

न कोई किसी का शत्रु है, न मित्र। यदि कोई किसी का मित्र हो तो सदा उसे मित्र ही रहना चाहिये। पर ऐसा नहीं देखा जाता। जो मित्र रहता है वही कभी शत्रु हो जाता है। इसलिए स्वभावतः कोई किसी का शत्रु व मित्र नहीं है। अपने सुकृत का फल जिसके द्वारा आता है वह मित्रता का व्यवहार करता है और अपने दुष्कृत का फल जिसके द्वारा आता है वही शत्रुता का व्यवहार करता है। सुख और दुःख अपने ही कर्मों का फल है। न कोई किसी को सुख दे सकता है, न दुःख। शत्रु व मित्र केवल अपने सुकृत और दुष्कृत फल के वाहन हैं।

जिस समय हमारे सुकृत का फल उदय होता है उस समय सब लोग मित्र बनकर सुख पहुंचाते हैं और जब दुष्कृत

 

(२७)

का फल उदय होता है तो वही लोग शत्रु बनकर दुःख देते हैं। सुख - दुःख सर्वथा अपनी ही वस्तु है, उसका निमित्त चाहे जो बन जावे। यदि हमने किसी को मार डाला है तो हमें फांसी होगी। फांसी का दोष न जल्लाद को है और न उस जज को है जो फांसी का हुक्म सुनाता है। हमारी फांसी हमारे ही किये हुए कर्म का फल है। इसलिए जज से और जल्लाद से व्यक्तिगत शत्रुता मानने की क्या आवश्यफता है - जैसा कर्म जड़ है, वैसा कर्म का फल जड़ होता है जो किसी चेतन के सहारे कर्त्ता के पास आता है। जिसके द्वारा हमें सुख मिलता है वह हमारे शुभ - कर्मों के फल का वाहन है और जिसके द्वारा हमें कष्ट होता है वह हमारे पाप - कर्मों के फल का वाहन है।

सुख - दुःख तो सर्वथा अपनी ही वस्तु है। जिस पर आरूढ़ होकर वह आता है वही हमारे सुख - दुःख का निमित्त बन जाता है। यह निश्चय करके राग - द्वेष से अलग रहना चाहिये। जब हमारी वस्तु हमारे निकट आ रही है तो उसमें दूसरे का क्या है? जिसको हमारे सुकृत के फल का निमित्त बनना है वह बने। हमें न किसी से प्रेम करना है, न द्वेष। निमित्त से क्या राग - द्वेष करना! जो मुख्य वस्तु सुख - दुःख है वह तो अपनी ही है ; वह चाहे जिस वाहन पर चढ़कर आये। वाहन का क्या महत्व है?

 

(२८)

इसलिये किसी से राग - द्वेष न करते हुए शान्ति पूर्वक धैर्य से अपने कर्मों का फल भोगना चाहिये, चाहे वह सुख रूप में आये या दुःख रूप में, दोनों अपनी ही वस्तु है। अपना संबधी चाहे अच्छा हो या बुरा, अपना ही है ; समीप आने पर उसका स्वागत करना ही उचित है।

X X X

 

१४

दुष्कर्म हो जाय तो कह दो

और

सत्कर्म करो तो छिपाओ

*

यज्ञ का फल असत्य भाषण करने से नष्ट हो जाता है, तप का फल गर्व से नष्ट हो जाता है ; ब्राह्मण की निन्दा करने से आयु क्षीण होती है, दान किया जाय और उसकी चारों तरफ कह दिया जाय तो उसका फल नष्ट हो जाता है। इसलिए जिसको नष्ट करना है उसको कह दो और जिसको संचय करना हो उसको छिपाओ। यदि कोई पाप हो जाय तो कह देने से पाप का फल बंट जाता है। इसी प्रकार यदि कोई पुण्य कर्म हो जाय और उसको लोगों से कह दिया जाय तो उसका फल भी बंट जाता है।

X X X

 

(२९)

१५

ऐसा नहीं कि -

पाप करते जाओ, भगवान् को भजते जाओ

*

भगवान् की कृपा के बल पर पाप करने का विधान नहीं है। वास्तव में जो अनन्य भाव से भगवान् का भजन करेगा उससे कोई अविहिताचरण हो ही नहीं सकता।

अनन्यता का तो अर्थ है कि फिर भगवान् के सिवाय और कोई उसके लिये रह ही न जाय। जब इस प्रकार भक्त की निष्ठा हो जायगी तो फिर जो वह करेगा वह ऐसा ही होगा जिससे भगवान प्रसन्न हों। भगवान के नाम में पाप नाश करने की जितनी शक्ति है उतना पाप पापी कर ही नहीं सकता। बल्मीकि आदि महर्षियों के ऐसे ही उदाहरण हैं जो पहले बड़े पापी - दुराचारी थे, परन्तु अपनी बुराई छोड़कर जब से वे भगवान के भजन में दत्तचित्त हुए तब से बहुत अच्छे बन गये। पहले का चाहे जितना पापी हो, पर यदि वह भगवान के भजन में लग जाता है तो यह निश्चित् है कि उसकी सदगति होगी।

X X X

 

(३०)

१६

भगवान् की सेवा करना चाहते हो तो

हनुमान जी का आदर्श पालन करो

*

हनुमान जी ने भगवान् की हर प्रकार से सेवा की, पर उसके बदले में कुछ नहीं चाहा। दास्य भाव को अपनाते हो तो हनुमान जी को उदाहरण में लो। निष्काम भक्ति का यही स्वरूप है। इष्ट के निमित्त कार्य करो और उसके फल रूप में अपने लिये किसी वस्तु की याचना न करो।

इष्ट प्रीत्यर्थ काम करना चाहिये। इष्ट की प्रसन्नता रहे, यही एक वासना हो। ऐसा नहीं कि शकरजी को एक लोटा जल चढ़ाया और प्रार्थना में कहने लगे कि लड़के की नौकरी लग जाय, स्त्री की तबियत् ठीक हो जाय या धन की कभी है अतः। रोजगार में वृद्धि हो जाय। इस प्रकार की संसारी वासनाओं को लेकर इष्टाराधन करते हो तो इष्ट भी घबराता है ; क्योंकि याचक से सभी दूर भागते हैं। इसलिये इष्ट से कुछ याचना नहीं करनी चाहिये। बस, उसकी सेवा करते चलो। जब उसका ध्यान तुम्हारे प्रति आकृत्ष्ट हो और पूछे कि क्या चाहते हो, तब भी यही कहो कि 'आप की कृपा चाहते हैं, आपकी दृष्टि हम पर रहे, और कुछ नहीं चाहते।'

 

(३१)

इष्ट की निष्काम सेवा का फल है अन्तःकरण की शुद्धि और अन्तःकरण की शुद्धि का फल है यथार्थ बोध। इसलिये दास्य भाव का बड़ा माहात्म्य है। जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि सर्वत्र उपस्थित है और रगड़ने से उत्पन्न होता है, उसी प्रकार परमात्मा चराचर में रमा हुआ है और उपासना से प्रकट होता है।

उपासना करो, परन्तु उपासना काल में याचना मत करो। भगवान् को ऋणी बनाकर छोड़ दो। जैसे हनुमानजी ने किया था। अन्त में भगवान् राम को कहना पड़ा कि हनुमान, तुमने जो मेरी सेवा की है, उसका बदला मैं कैसे चुकाऊँ? यह है भगवान् को ऋणी बनाना।

वास्तव में परमात्मा जितना दे सकता है उतना जीव मांग नहीं सकता। तुम याचना करोगे तो अपनी हैसियत से कोई छोटी चीज मांगोगे और परमात्मा देगा तो वह अपनी हैसियत से देगा। वह सर्वज्ञ है और सर्वशक्तिमान है ; उसके लिये सब कुछ साध्य है। तुम अपना कार्य करो और पर्मात्मा को अपना कर्त्तव्य करने के लिये छोड़ दो, कभी टोटे में नहीं रहोगे।

X X X

 

(३२)

१७

शक्ति का अपव्यय और बुद्धि का दुरुपयोग न करो

*

जो कुछ करो उसे पहले भली प्रकार सोच - विचार लो ; क्योंकि अच्छा या बुरा जो कुछ कर्म होगा उसका फल भुगतना पड़ेगा। पूर्व कर्मानुसार ही शक्ति और बुद्धि प्राप्त होती है। हमारा कर्त्तव्य है कि शक्ति का अपव्यय और बुद्धि का दुरुपयोग न करें।

सदाचार पूर्वक धर्माचरण करते हुए हम अपने लौकिक जीवन को भी सुखी बना सकते हैं और परलोक तो बनता ही है। कोई ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानता तो न माने, परन्तु यदि वह संसार में सुख - शांति का साम्राज्य देखना चाहता है तो अन्य जीवों को भी अपने समान समझना पड़ेगा। इस प्रकार भी धर्मिक सिद्धान्तों का पालन उसे करना ही चाहिये।

मनुष्य अधिकांश संगीत से ही सीखता है। अच्छि या बुरी जैसी संगति होगी वैसी ही बातें वह सीखेगा। विशेष बात तो यह है कि मनुष्य अपने साथ वालों को जैसा आचरण करते देखता है वैसा ही यत्किंचित् अंशों में जाने या अनजाने स्वयं भी करने लगता है। सिद्धान्त है कि संगति के

 

(३३)

अनुसार ही मनुष्य के आचार - विचार होते हैं। अतः यदि कोई कुसंग में पड़ गया तो वह आचार - विचारों से भ्रष्ट होकर न केवल अपने ही पतन का कारण होगा अपितु अपने संपर्क में आने वालों को भी ले डूबेगा। इसीलिये प्रयत्न करके सत्संग करना चाहिये।

X X X

 

१८

जैसा देव वैसी पूजा

*

जैसा रोग हो वैसी ही औषधि हो, तब लाभ होता है। क्षुद्र रोगों के लिये क्षुद्र औषधियाँ ही काम कर जाती हैं, परन्तु राजरोग के लिये विशेष औषधियों का प्रयोग करना पड़ता है। मनुष्य वासनाओं के चक्कर में पड़ा हुआ जन्म - जन्मान्तरों से भवरोग से पीड़ित है। इस महाव्याधि से मुक्त होने के लिए उतनी ही प्रभावशाली महौशधि चाहिए।

राजरोग और भवरोग में यह अन्तर है कि राजरोग मनुष्य के एक ही जन्म को बिगाड़ता है, परन्तु भवरोग जीव को अनेक योनियों में घुमाता हुआ जन्म - जन्मान्तरों तक जन्म - मरण के घोरातिघोर महा दुःखों में डाले रखता है। जन्म - मरण के महा दुःखों का एक मात्र कारण और भवरोग रूपी

 

(३४)

महा भयंकर वृक्ष का मूल (जड़) है वासना। वासना रूपी जड़ की अनेकानेक शाखायें फैलकर इस महा भयंकर भवरोग वृक्ष की पुष्टि करती रहती है।

जन्म - जन्मान्तर से इसकी जड़ पुष्टि होति चली आ रही है। इसे निर्मूल करने के लिए बहुत समय तक इसका छेदन करना पड़ेगा, तब यह कट सकेगी। इसलिए अनन्त जन्मों की वासनायें शान्त करने के लिए दीर्घकाल का अभ्यास आवश्यक है।

X X X

 

१९

झूठे आदमी को कभी शान्ति नहीं मिल सकती

चाहे वह कुवेर के समान धनवान क्यों न हो

*

धर्महीन शिक्षा होने के कारण लोगों को कर्त्तव्याकर्त्तव्य का विवेक कम हो गया है। जैसा करने लगते हैं उसी को ठीक समझते हैं।'पाप करैगें तो नरक की यातनाएं भोगनी पड़ेंगी' - यह भावना प्रायः लोप सी हो गई है। यही कारण है कि आजकल समाज में असत्य का व्यवहार बढ़ गया है। प्रत्यक्ष में इन्द्रिय भोग - सामग्री का साधन अर्थं को ही लोग

 

(३५)

सब कुछ समझने लगे हैं। यही कारण है कि अर्थं संग्रह में विहताविहित का ध्यान नहीं रखते। किन्तु यह निश्चित है कि असत् व्यवहार से कभी भी शान्ति का अनुभव नहीं हो सकता।

सत्संग की कमी के कारण चरित्र - हीनता फैली है। आजकल् लोग यह विश्वास नहीं करते कि बिना बेइमानी किए उनका काम चल सकता है, न भाग्य पर भरोसा है और न विश्वम्भर पर ही विश्वास है। परमात्मा पर विश्वास रखो और कुछ समय सत्यता का व्यवहार करके देखो। इससे जीवन में सन्तोष का अनुभव होगा और संतोष ही सुख का स्वरूप माना गया है। यथा - 'सन्तोष परमं सुखम्'। झूठे आदमी को कभी भी शांति नहीं मिल सकती, चाहे वह कुबेर के समान धनवान क्यों न हो जाय। यह सदैव शंकित रहता है और उसका हृदय जलता रहता है। इस प्रकार वह इस लोक में भी सुखी नहीं रह पाता और परलोक तो उसका बिगड़ता ही है।

X X X

 

(३६)

२०

दूसरे में नहीं -

अपने में दोष देखो

*

चरित्रवान मनुष्य की लोक - परलोक दोनों में शान्ति का अनुभव कर सकता है। जो चरित्र भ्रष्ट है उसे न इस लोक में शान्ति रहती है, और परलोक में उसके लिए शांति की बात ही क्या! दूसरों की बुराइयाँ मत देखो, अपने में ढुढ़ो कि कौन सी बुराई अभी तक है, उसे हटाने का प्रयत्न करो। अपने में दोष खोज - खोज कर निकाला तो कल्याण होगा।

कभी भी किसी के दोषों का चिन्तन मत करो। दूसरों में दोष ढूंढ़ने से अपना भी अन्तःकरण मलिन होता है। पाप कोई करे और उसका चिन्तन हम करें - यह तो कोई हमारे लाभ की बात नहीं। जब हम स्वयं पाप करने से डरते हैं तो दूसरे के पापों का चिन्तन करके अपने मन को पापी क्यों बनायें?

दूसरे के दोषों का चिन्तन करोगे तो उसको तो कोई लाभ होगा नहीं, उल्टे दूसरे के दोष तुम्हारे मन में घुसेंगे। इसलिये ऐसा काम करो कि कम से कम अपनी रक्षा तो रहे।

 

(३७)

अपनी रक्षा का ध्यान न किया तो जैसे आंधी आयेगी उसी में उड़ जाओगे। अपने को ही देखने का अभ्यास करो। नित्य सायंकाल विचार करो कि आज हममें कितने गुण - दोष आये और कितने छूटे। अपने दोषों को देखने लगोगे तो फिर धीरे - धीरे दोष अपने आप छूटने लगेंगे। दोषों के सम्बन्ध में पहले अपनी चिन्ता रखो ; दूसरे की बात सोचना अपने लिये घातक है। पहले अपनी रक्षा करो, बाद में दूसरे की चिन्ता।

X X X

 

२१

संसार प्रेम का पात्र नहीं -

इसमें मन को फँसाओगे तो धोखा खाओगे

*

यह लोक धर्मशाले का निवास है। यहाँ अपने मन को बहुत फँसाने लायक नहीं। साधारण रूप से काम करो और दृष्टि आगे की यात्रा पर रखो। इस धर्मशाले के प्रबन्ध में अपने को फँसा लेना मूर्खता ही है। जो जैसी चीज है उसके साथ वैसा ही बरतो। चार दिन के जीवन में बहुत हाव - हाव अच्छा नहीं। जब तक साँस चल रही हैं भगवान् का भजन् करते हुए समय को काटो। व्यवहार में शिष्टाचार करते चलो। मन को अधिक मत फँसाओ। मन में यदि व्यवहार घुस गया

 

(३८)

तो चार - चार लौटकर चौरासी लक्ष योनियों के चक्कर में घूमना पड़ेगा। इसलिये बड़ी सतर्कता से काम करो ; तन और धन से तो व्यवहार चलाओ और मन से परमात्मा का चिंतन। ऐसा विभाग कर लोगे तभी ठीक से सुख - शान्ति का अनुभव कर सकोगे।

X X X

 

२२

पुरस्कार के योग्य का पुरस्कार

और

तिरस्कार के योग्य का तिरस्कार करो

*

चरित्र - हीन लोगों से कथा - वार्ता सुनना व सत्संग करना वैसा ही है जैसा वेश्या के मुख से गीत - गोविन्द सूरसागर सुनना। गंगाजल पान करना है तो शुद्ध धारा से लो, नाबदान से गंगाजल बह कर आये तो उसको पीने का विधान नहीं है। यदि उपदेशक चरित्रवान है तब तो उसकी बात सुनो। चरित्र - हीन के शब्दों में केवल राग - रागिनी में मुग्ध हो जाना उसकी चरित्रहीनता को बढ़ाने में सहयोग देता है।

जो भगवान् का भजन करता है उसका चरित्र उत्तम होना चाहिये। यदि चरित्र - हीन है तो उसे समझ लो कि

 

(३९)

भगवान् का भक्त नहीं है, लोगों को धोखा देने के लिये वह ऊपर से भक्ति का हाव - भाव दिखाता है। ऐसे धोखेबाज लोगों से स्वयं बचो और अपने सम्पर्कं की भोली - भोली धार्मिक जनता को भी बचाओ।

मान - सम्मान उन्हीं का होना उचित है जो चरित्रवान् हैं। ऐसा ठीक नहीं कि घी का लड्डू टेढ़ा - मेढ़ा ; जब घी का लड्डू है तो उसका स्वरूप भी ठीक रहना चाहिये, टेढ़ा क्यों हो। जब कोई भगवान् की भक्ति का उपदेश देता है, सत्संग करने का दावा करता है तो फिर उसको चरित्रवान् होना चाहिये। तभी तो जनता को विदित होगा कि भगवान् का भजन - पूजन करने से पुराने पाप कटते हैं और वर्तमान के दुर्गुण छूटते हैं।

यह सिद्धान्त बना लेना चाहिये कि तिरस्कार के योग्य जो हो उसका अवश्य ही तिरस्कार करो और पुरस्कार के योग्य का पुरस्कार करो। तिरस्कार के योग्य लोगों का पुरस्कार करने से उनकी संख्या बढ़ती है और समाज में गंदगी फैलती है।

X X X

 

(४०)

२३

जो आया है वह अवश्य जायगा रहना यहाँ किसी को नहीं

*

हर समय बिस्तर बाँधे तैयार रहो। न जाने किस समय वारण्ट आ जाय। मृत्यु का वारन्ट गिरफ्तारी वारन्ट होता है, उसमें फिर अपील का गुंजाइश नहीं होती, तुरन्त सब छोड़ कर चलना पड़ेगा। जो जहां है वहीं पड़ा रह जायगा। पहले से तैयार रहोगे तो चलते समय कष्ट नहीं होगा।

जो हर समय चलने के लिये तैयार रहेगा उससे कभी भी पाप नहीं होगा। परलोक को भूल जाने से ही दुराचार पापाचार होता है। यहि हर समय स्मरण रहे कि यह सब तो एक दिन छोड़कर ही चलना है तो फिर मनुष्य असत्य और अविहिताचरण को कभी न अपनाये।

विचार करो कि जब पिता, पितमह, परपितमह नहीं रहे तो ऐसा तो नहीं हो सकता कि हम रहें। जब चलना निश्चित है तो पहले से ही तैयारी कर लोगे तब यात्रा में आराम रहेगा ; और पहले से तैयारी नहीं की तो फिर कष्ट ही होगा। सतर्क रहो कि - 'कोई काम ऐसा न हो जाय जिसके लिये चलते समय पछताना पड़े।'

 

(४१)

 यदि सतर्क नहीं रहोगे तो नीचे गिरने से बच नहीं सकते। संसार का प्रवाह ऐसा है कि नीचे की ओर ही ले जाता है। इन्द्रियों की प्रवृत्तियाँ मनुष्य को बहिर्मुंखी बनाती हैं और बहिर्मुंखता में वासनाओं के चक्कर में पड़कर फिर अधिक विचार करने की क्षमता नहीं रह जाती। इसलिये सदैव सतर्क रहने की आवश्यकता है।

मनुश्य अपने जीवन - काल में जो अच्छा - बुरा करता है वह मरणकाल में सब स्मरण आ जाता है। जो - जो पाप हुए रहते हैं उनके भयंकर फल का स्मरण करके जीव अन्तकाल में बहुत पछताता और बहुत दुखी होता है। इसलिये सतर्क रहना चाहिये कि ऐसा कोई पाप न हो जाय जिसके लिये अन्त समय में पछताना पड़े।

X X X

 

२४

भगवान् के भजन में लाभ ही लाभ है

जितना समय लगा अगे उसका मूल्य कई गुना

ब्याज सहित मिलेगा

*

यह एक ऐसा रोजगार है जिसमें घाटे की शंका नहीं। भगवान् के भजन में लाभ ही लाभ है। पर बात यह है कि

 

(४२)

लाभ का रोजगार करने का भी भाग्य होना चाहिये। भाग्य - हीन मनुष्य तो उसी अव्यवसाय में लगेगा जहाँ घाटा हो। बड़े आश्चर्य की बात है कि धन और संसारी वस्तुओं की प्राप्ति के लिये लोग कितना अथक प्रयत्न करते हैं - दिन - रात एक कर देते हैं। परन्तु जिस भगवान् की प्राप्ति से सब कुछ सहज सुलभ हो जाता है उसके लिये उचित प्रयत्न नहीं करते। कितना बड़ा अविवेक है! इससे बड़ा आश्चर्य और हो ही क्या सकता है कि सुख - शान्ति के मूल कारण सर्वंशक्तिमान् भगवान् की ओर ध्यान न देकर तुच्छ संसारी चीजों की प्राप्ति के लिये दिन - रात परेशान रहें। कहावत है -

'एकहि साधे सब सधे, सब साधे सब जाय॥'

एक भगवान् की प्राप्ति हो जाने से सब कुछ सहज प्राप्त हो जाता है। भगवान को छोड़कर और सब वस्तुओं की प्राप्ति के लिये चेष्टा करते रहो तो कुछ भी प्राप्त नहीं होगा - जो प्राप्त भी होगा वह इतना न होगा कि सन्तोष हो जाय।

छाया को पकड़ना चाहते हो तो भी असली रूप को पकड़ो तो छाया तुरन्त पकड़ में आ जायगी। रूप को छोड़कर छाया के पीछे जितना भागोगे उतनी वह भी आगे भागती जायगी। इसलिये छायारूप संसारी ऐश्वर्य - यश आदि के पीछे भागना मूर्खंता ही है। असली रूप पर्मात्मा को

 

(४३)

पकड़ो तो यह स्वयं तुम्हारे अधिकार में आ जायगा। स्मरण रखो कि भगवान् के भजन में लाभ ही लाभ है। जितना समय इसमें लगाओगे उसका कई गुना ब्याज सहित अदा हो जायगा।

X X X

 

२५

परमात्मा विश्वम्भर है

*

वह तुम्हारा भरण - पोषण करेगा, उसको भूलकर

तुम कृतघ्न मत बनो

जिसने तुमको उत्पन्न किया है वह सर्वशक्तिमान् है और उसका नाम विश्वम्भर है। विश्व का भरण - पोषण करने का भार उसने ऊपर लिया है। उस पर विश्वास करो - उसने पैदा किया है तो पालन भी करेगा। परन्तु यदि तुमने उसको भुला दिया तो कृतघ्नता का दोष तुमको लगेगा और तब उसकी उपेक्षा हो जाय तो कोई आश्चर्य नहीं।

"का चिंता मम जीवने यदि हरिर्विश्वम्भरो गीयते।
नोचेदर्भक जीवनाय जननी स्तन्यं कथं निस्सरेत्?
"

यदि भगवान् का नाम विश्वम्भर (विश्व का भारण - पोषण करने वाला) है तो मुझे अपने जीवन में पेट के लिये चिन्ता करना व्यर्थ है। यदि परमात्मा की विश्वम्भरता पर

 

(४४)

किसी को विश्वास न हो तो हम पूछते हैं कि बालक के गर्भ में अन्दर रहते हुए ही उसके लिये दुग्ध भाता के स्तन में पहले से ही कैसे आ जाता है!

परमात्मा की विश्वम्भरता का इससे अधिक ज्वलन्त प्रमाण क्या हो सकता है कि भोक्ता के बाहर आने के पहले ही भोग्य तैयार है। इसलिए विश्वम्भर का विश्वास करो। जिसने गर्भ के अन्दर रक्षा की है वह अभी भी रक्षा करेगा। उसको भूलो मत।

X X X

 

२६

जितने दिन जीना है शान्ति से जियो

अधिक हाव - हाव करना व्यर्थ है

*

महाराजा दशारथ जैसे समर्थ चक्रवर्त्ती नरेन्द्र के भी सारे मनोरथ पूरे नहीं हुए। इसलिये अपने - अपने मनोराज्यों को पूरा करने में अहर्निश परेशान रहना भारी भूल है।

यह नहीं भूलना चाहिये कि एक दिन अवश्य ही यहाँ से चलना है। यहाँ का प्रोग्राम सब यहीं ऐसा ही रह जायगा। जो जहाँ है वह वहीं पड़ा रह जायगा। सब कुछ छोड़कर अकेले यात्रा करनी पड़ेगी। इसलिये जो छोड़कर जाना है

 

(४५)

उसके लिये व्यस्त मत रहो। जितने दिन रहना है शान्ति से रहो। जब यह निश्चय है कि कार्य कभा समाप्त नहीं होंगे, तो कार्यों के पीछे अधिक हाव - हाव करना व्यर्थ है। शान्ति पूर्वक स्वधर्मानुष्ठान करते हुए परमात्मा का स्मरण करते चलो।

जिसने पैदा किया है वह विश्वम्भर है। सबके भरण - पोषण का भार उस पर है, वह स्वयं प्रबन्ध करेगा। किन्तु यदि उस पर विश्वास न करके अपनी चातुरी - चालाकी, दगाबाजी - बेइमानी पर विश्वास करोगे तो जीवन भर अशान्ति रहेगी और आगे भी मार्ग में अँधेरा रहेगा। इसलिये ऐसा करो कि जीवन - काल में भी शान्ति रहे और आगे का मार्ग भी उज्ज्वल रहे।

X X X

 

२७

शक्ति प्राप्त करो

*

शक्तिहीन जीवन व्यर्थ है

शक्तिशाली होकर जीवन व्यतीत करो। मनुष्य का शरीर मिला है, पुरुषार्थ करके बलवान बनो। स्मरण रखो कि तुम उन्हीं महर्षियों की संतान हो जो संसार में सब कुछ कर सकने में समर्थ थे। अपने संकल्प से दूसरी सृष्टि रच देने का

 

(४६)

सामर्थ्य जिनमें था उन्हीं की तुम संतान होकर आज चारों तरफ से दुःख और अशान्ति से घिर रहे हो। अपने घर की निधि को भूल जाओगे तो फिर दरवाजे - दरवाजे ठोकर तो खानी ही पड़ेगी।

शेर यदि भेड़ियों के झुंड में जाकर भें - भें करने लगे और उसी में सुख मानने लग जाय तो यह उसके लिये कितने लज्जा की बात होगी। इसी प्रकार भारतीय यदि अपने पुराने आध्यात्मिक और आधिदैविक सम्पत्तियों को भूल जाय और ऊपरी शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध आदि की भौतिक सामग्री को प्राप्त करके ही सुख - संतोष मान लें तो यह उनका कितना पड़ा पतन है।

शक्तिशाली बनने के लिये अपने पूर्वजों के अनुभूत नुसखों से काम लो। सर्वशक्तिमान् जगन्नियन्ता की शरण में आओ। अपनी आध्यात्मिक शक्तियों का विकास करो। जगन्नियामिका चेतन सत्ता पर अधिकार प्राप्त करो। तब वास्तव में शक्तिशाली बन सकते हो और वही स्थिर शक्ति सत्ता होगी। निश्चय रखो कि आज भी तुम त्रिकालदर्शी और तत्र - विजयी होकर समस्त ब्रह्माण्ड की शक्तियों को अपने अनुकूल कर सकते हो। भारत में तुम्हारा जन्म हुआ है। तुममें अनन्त शक्तियां निहित हैं। प्रयत्न करके उनका

 

(४७)

उद्घाटन करो और शक्तिशाली होकर उन्नत मस्तक होकर रहो।

X X X

 

२८

साकार - निराकार के झगड़े में न पड़ो

*

जो निराकार है वही साकार होता है। स्थिर प्रशान्त महासमुद्र ही तरंग के रूप में ऊपर उठकर दिखलाई पड़ता है। जैसे तरंग समुद्र की सीमा से बाहर चली गई मालूम पड़ती है और फिर लौटकर समुद्र में विलीन हुई प्रतीत होती है, उसी प्रकार निर्गुण निराकार व्यापक परमात्मा हो सगुण साकार रूप लेकर एक देश में आते हैं।

हम तो यह कहेंगे कि भगवान् के साकार रूप में प्रकट होने से ही निराकार परमात्म - सत्ता की प्रत्यक्ष सिद्धि होती है। काष्ठ में अग्नि सर्वत्र है, यह तभी प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध होता है जब किसी स्थल को रगड़ने से वहाँ अग्नि प्रकट हो जाता है।

सिद्धान्त यही है कि निर्गुण निराकार ही सगुण साकार होता है और सगुण साकार से ही निर्गुण निराकार की प्रत्यक्ष सिद्ध होती है। अतः निराकार - साकार के झगड़ों में न

 

(४८)

पड़कर कहीं भी अपने मन को जमाओ। निष्ठा जमाने से ही कल्याण होगा। निराकार और साकार के सम्बन्ध में झगड़ा मचाने से कोई लाभ नहीं।

तुम चाहे निराकार पर सील लगाओ या साकार पर, उससे निराकार या साकार का कुछ बने - बिगड़ेगा नहीं। अपने कल्याण के लिए कहीं भी निष्ठा जमाने का प्रयत्न करो। किसी सद्गुरू से अपने अधिकारानुसार उपयुक्त उपासना का प्रकार समझ कर उपासना कर चलो और विधान पूर्वक आत्मा या पर्मात्मा में निष्ठा जमाने का अभ्यास करो। साकार में भी निष्ठा पुष्ट हो जायगी तो भी जन्म - मरण का बंधन कट जायगा और लोक में भी सुख - शान्ति से जीवन बीतेगा।

X X X

 

२९

जैसा काछो वैसा नाचो

*

जिस आसन पर बैठो उसे गन्दा न बनाओ जिस पद को स्वीकार करो उसको कलंकित मत करो

या तो किसी चीज को अपनाओ मत, और यदि अपनाते हो तो उसको ठीक से निबाहो। जो पद अपनाओ उसकी रक्षा

 

(४९)

करो। जिस कार्य को हाथ में लेते हो, उसकों विधानपूर्वक पूरा करने के लिये प्रयत्नशील रहो।

जिस कार्य के करने की योग्यता हो और चाव हो उसी कार्य में हाथ लगाना चाहिये। केवल माहात्म्य देख कर कार्य आरम्भ कर देने से फिर आगे चलकर जब उसमें कठिनाइयाँ आती हैं तो अशान्ति होती है। इसलिये जगत् में ऐसे ही कार्य करो, जिसमें अशान्ति की शङ्का अधिक न हो। इस बात का सदा ध्यान रखो कि जिस पद को अपनाया है वह कलंकित न होने पाये। माता के साथ व पिता के साथ उत्तम व्यवहार रखो, जिसमें पुत्र का पद कलंकित न हो। बहिन - भाइयों से उत्तम प्रेमपुर्ण - व्यवहार रखो, जिससे भाई का पद कलंकित न हो। पत्नी से मर्यादापूर्ण उत्तम व्यवहार रखो, जिससे पति का पद कलंकित न हो। गुरु के साथ सदा विनम्र और पूज्यभाव रखो, जिससे तुम्हारा शिष्य का पद कलंकित न हो। यदि कहीं किसी सरकारी नौकरी में हो तो अपने पदानुकूल न्यायोचित व्यवहार करो और पद का दुरुपयोग करके उसे लोगों की दृष्टि में कलंकित मत करो। तात्पर्य यह है कि जहाँ जिस आसन पर बैठो उसे अपने द्वारा गन्दा मत बनाओ। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जिस भी कुल में जन्म हो गया है, उस कुल की मर्यादा को अपने द्वारा भ्रष्ट मत होने दो। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ या सन्यास जिस आश्रम को अपनाओ उसके

 

(५०)

नियमों का पालन करते हुए उसे गौरवपूर्ण ढङ्ग से निबाहो। कहीं ऐसा काम न कर बैठो कि तुम्हारा पद कलंकित हो जाय।

X X X

 

३०

प्रेम परमात्मा में और प्रेम की छाया संसार में

*

प्रेम का आन्तरिक मनोभाव सांसारिक वस्तुओं में न भी लगाया जाय, तब भी व्यवहार बन्द नहीं होगा, कार्य सब चलते रहेंगे। व्यवहार का संचालन तो प्रारब्ध - अदृष्ट करता है। जब तक शरीर है तब तक तो प्रारब्ध है ही। इसलिये इस बात की तनिक भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये कि व्यवहार से प्रेम हट जायगा तो सारे कार्य ही समाप्त हो जायेंगे। पर यह भी बात है कि सर्वत्र एक सा प्रेम नहीं रहता। सांसारिक पदार्थों में और सम्बन्धियों आदि के साथ प्रेम् का तारतम्य (न्यूनाधिक्य) रहता ही है। इसलिये प्रेम का तारतम्य ऐसा जमाओ कि मुख्य प्रेम की 'सीट' में परमात्मा को बैठाओ और सामान्य प्रेम का स्थान सांसारिक व्यवहार को दो। व्यवहार संचालन के लिये अर्थात् प्रारब्ध को भोगने के लिये प्रेम की छाया से ही काम चल जाता है। जहां छाया

 

(५१)

से काम चल जाय वहाँ मुख्य वस्तु को लगाना उसका दुरुपयोग ही तो है।

व्यवहार संचालन के लिये सांसारिक पदार्थों को मुख्य राग का विषय बना लेना बड़े घाटे का व्यापार है। धन में या स्त्री - पुत्र में भीतर से ममत्व रखना ही खतरे की चीज है। इनमें यदि भीतर से प्रेम बड़ाया तो संसार में ही लटक कर रह जाओगे और आगे की यात्रा में अंधेरा ही रहेगा। इसलिये मुख्य प्रेम परमात्मा में और प्रेम की छाया व्यवहार में रखो, तो यहाँ का काम भी नहीं रुकेगा और आगे भी प्रकाश रहेगा।

X X X

 

३१

देवत्व से मनुष्यत्व श्रेष्ठ है

उत्तम पुरुषार्थ करके मनुष्य जीवन सफल बनाओ

देवयोनि भी अन्य योनियों की तरह भोग - योनि मानी गई है। देवयोनि की प्राप्ति दिव्य भागों की लालसा रखने वाले, यज्ञानुष्ठान आदि दैवी कर्मों को करने वाले मनुष्यों को प्राप्त होती है। देवलोक में विषय - भोगों की प्रचुरता के कारण देवताओं की बुद्धि घूम - घूम कर उसी में रहती है, आगे

 

(५२)

उनसे पुरुषार्थ नहीं बन पड़ता। इसीलिये मनुष्य - योनि को श्रेष्ठ कहा गया है ; क्योंकि यहाँ पर मनुष्य पुरुषार्थवान् होकर इतना पुरुषार्थ कर सकता है कि साक्षात् परब्रह्म हो सकता है।

मनुष्य स्वर्ण का पासा है और देवता तो बने हुए आभूषण के समान हैं। आभूषण तो जो बन गया सो बन गया ; अब उसकी तरक्की समाप्त हो गई, आगे कुछ वह और अच्छा बन नहीं सकता। परन्तु जब तक स्वर्ण पासा के रूप में है, तब तक उसकी तरक्की की कोई सीमा नहीं, अच्छा से अच्छा काम उस पर किया जा सकता है, अच्छा से अच्छा उसका आभूषण बनाया जा सकता है। इसीलिये मनुष्य - योनि को सर्वश्रेष्ठ कर्मयोनि कहा गया है। इसमें आकर प्रमाद नहीं करना चाहिये। सावधानी के साथ उत्तम पुरूषार्थ करना चाहिये। स्वधर्मानुष्ठान करते हुए पर्मात्मा में निष्ठा बढ़ाना ही उत्तम पुरुषार्थ है। प्रयत्न करो कि इसी जीवनकाल में परमात्मा का अभेद सम्बन्ध हो जाय। वेदशास्त्र पर विश्वास करते हुए वेदशास्त्रीय सिद्धान्तों को मानने वाले संत - महात्माओं और विद्वानों से सत्संग करो तो मनुष्य - जीवन सफल रहेगा।

X X X

 

(५३)

३२

उसकी चिन्ता करो -

जो सब चिन्ताओं से मुक्त कर सकता है

*

सुख - शान्ति का अनुभव तभी होगा जब मन से चिन्तायें निकल जायेंगी। यदि चिन्ताओं को समाप्त करना चाहते हो तो संसार के स्वरूप को समझ लो। संसार को जब जान लोगे तब संसार की वासनायें समाप्त हो जायेंगी। इसका स्वरूप ही ऐसा है कि एक बार ठीक से समझ लेने पर फिर इसमें भीतर से प्रेम नहीं रह सकता।

अनेक पदार्थोण् में प्रेम रहने के कारण ही अनेक प्रकार की चिंतायें उठा करती हैं। चिन्ता ऐसी भयानक होती है कि सारी सम्पदा और मान - सम्मान रहने पर भी मनुष्य को व्याकुल बनाये रखती है। जैसे -

"चिता चिन्ता द्वयोमंध्ये चिन्त चैव गरीयसी।
चिता दहति निर्जीवं चिन्ता दहति सजीवकम्॥
"

चिता से चिन्ता अधिक बलवती और भयानक मानी गई है ; क्योंकि चिता तो मरे हुए को जलाती है परन्तु चिन्ता जीवित को हो जलाती रहती है। इसलिये चिंता - मुक्त होने

 

(५४)

का प्रयत्न करो। वही परमात्मा जो परम स्वतंत्र और परम निश्चिंत है तुम्हें सब चिन्ताओं से मुक्त कर सकता है। इसलिये उसके पाने की चिन्ता बढ़ाओ तो फिर सारी संसारी चिन्तायें सदा के लिये समाप्त हो जायेंगी।

संसार में व्यवहार तो करो। पर यह समझते रहो कि यह केवल व्यवहार ही की चीज है, प्रेम करने की चीज नहीं। मन यहाँ की किसी वस्तु में फँस जायगा तो फिर चिन्ताओं का पहाड़ लद जायगा और जीवन भी व्यर्थ हो जायगा। इसलिये मन को परमात्मा में लगाओ और संसार मे शिष्टाचार करते चलो।

X X X

 

३३

जिसे भले - बुरे का न्याय करना है

बह तुम्हारे सब कार्यों की देख रहा हैं

*

परमात्मा अन्तर्यामी है। वह सबके हृदय में सदा विराजमान है। वह सबके सब कार्यों को देख रहा है। उसकी दृष्टि बचकर कोई कार्य नहीं किया जा सकता। किसी कार्य के लिये यह सोचना कि इसको कोई नहीं जानता,

 

(५५)

परमात्मा को अन्धा बनाना है। यह दूसरों को नहीं, अपने को धोखा देना है।

दुष्कर्म में संसारी मनुष्यों की दृष्टि बचा लेने से ऐसा मत सोचो कि कोई नहीं जानता। जिसे भले - बुरे का न्याय करना है वह तुम्हारे सब कार्यों को देख रहा है, उसकी दृष्टि नहीं बचाई जा सकती। जो कर्मों का फल देने वाला है उसकी दृष्टि नहीं बचाई जा सकती। जो कर्मों का फल देने वाला है उसकी दृष्टि तो बचा नहीं सकते और जो स्वयं बिगड़े हु हैं वे कुछ कर नहीं सकते। उनकी दृष्टि बचाने का प्रयत्न करते हो, यह कितना बड़ा अविवेक है। यदि किसी से डरना है तो सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान से डरो। उसकी रुचि के विरुद्ध कोई कार्य मत करो। उसकी रुचि ही वेद - शास्त्र है। ऐसा कोई कार्य मत करो जिसके लिए वेद - शास्त्र आज्ञा न देता हो।

परमात्मा को सर्वत्र उपस्थित मानोगे तो फिर तुमसे कोई पाप - कर्म नहीं होगा। इसलिये परमात्मा को व्यापक मानते हुये चरित्रवान् बनो, अपने आचरणों में पवित्रता लाओ, अपनी भावनाओं को शुद्ध बनाओ और स्वधर्मानुकूल व्यवहार करो। तभी तुमारा अन्तःकरण पवित्र होगा। अन्तःकरण की पवित्रता बढ़ने से तुम्हारे संकल्प में बल आयेगा, कार्य अधिक सुदृढ़ होंगे और परमात्मा में भी निष्ठा बढ़ेगी। परमात्मा में निष्ठा बढ़ने से हर प्रकार का मंगल होगा। इसलिए ऐसा

 

(५६)

ही मार्ग अपनाओ जिससे सब प्रकार का मंगल हो और लोक - परलोक दोनों बने।

X X X

 

३४

चार वृत्तियों में ही रहो

तभी लोक - परलोक दोनों बनेंगे

*

मनुष्य के जीवन में स्थूल शरीर की प्रधानता नहीं होती, सूक्ष्म शरीर की ही प्रधानता होती है। स्थूल शरीर तो ढाँचा मात्र है - उसका संचालक है सूक्ष्म शरीर, मन और बुद्धि। मनुष्य का जैसा मन होता है उसी के अनुसार ही उसकी इन्द्रियाँ और शरीर काम करता है। इसलिये मन को सम्भालने की आवश्यकता है।

मन को पवित्र बनाने के लिये योग - शास्त्र के प्रणेता महर्षि पातंजलि ने यह उपाय बताया है कि - "मन को मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा इन्हीं चार वृत्तियों में रखा जाय।"

अपने बराबरी वालों में मित्रता की भावना, अपने से छोटों पर या अपने से दुखी लोगों पर करुणा (दया) का भाव, अपने से जो अधिक सुखी, अधिक विद्वान या किसी भी अंश

 

(५७)

में बड़े हो उनको देखकर प्रसन्नता का भाव बनाना और जो अपने से द्वेष - शत्रुता आदि का भाव रखें उनके प्रति उपेक्षा की भावना रखना, यह नहीं कि उनके प्रति अपने मन में शत्रुता और द्वेष की भावना बनायें। इस प्रकार चार ही वृत्तियों में मन को रखने से ईर्ष्या, द्वेष, मत्सर आदि भाव कभी मन में उठने नहीं पाते और स्वाभाविक रूप से मन की पवित्रता बढ़ती जाती है। ऐसा करने से व्यवहार में कोई रुकावट नहीं पड़ती और मानसिक 'मल' की निवृत्ति होने से विषय - भोग की लालसा स्वाभाविक रूप से कम होती जाती है और तभी मन अन्तर्मुख होकर भगवान् के भजन में लगता है।

X X X

 

३५

सिद्धियों के चक्कर में ठगाये मत जाओ

*

आजकल अधिकाण्श लोग सिद्धि ढूँढ़ते हैं, चाहते हैं कि किसी प्रकार से सिद्धि मिले। सिद्धि तो कम लोगों को होती है, परन्तु सिद्धि के लालच में ठगाये अधिक लोग जाते हैं। हमारा काम तो सचेत करने का है। जैसे ग्राम का पहरेदार आवाज देता रहता है कि जागते रहो, उसी प्रकार हम लोग

 

(५८)

भी जनता को सावधान करते रहते हैं कि धूर्तों से बचते रहो। चौकीदार आवाज लगाता है कि जागते रहो, वह अपनी 'डिपटी' करता है। फिर उस पर भी कोई बेसुध होकर सोता रहे तो उसका क्या दोष! जो सोता है वह लूटा जाता है। धर्माचार्य तो चौकीदार होते हैं। चौकीदारी करना हमारा काम है। स्वयं जागते हैं और दूसरों को जगातें हैं।

सिद्धियाँ पाँच प्रकार से आती हैं -

"जन्मौषधिमन्त्रतपः समाधिजाः सिद्धयः। - योगदर्शन् ४।१ "

१ - - जन्म से ही कोई सिद्ध उत्पन्न होते हैं। पूर्व जन्म में उपासना की होगी, पर इतनी न कर सके होंगे कि भगवान् में मिल जायें तो ऐसे पूर्वोंपास्ती लोगों में जन्म से ही सिद्धियों का चमत्कार रहता है - - जैसे, जड़भरत जन्म से ही सिद्ध थे, उन्हें कहीं श्रवण मनन निदिध्यासन करने नहीं जाना पड़ा।

२ - - औषधियों के द्वारा अनेक प्रकार को सिद्धियां देखी जाती हैं। मैं जब जंगलों में रहता था तो ऐसे अनेक अवसर आये कि कोल - भिल्ल आ - आकर औषधियों के गुण बता जाते थे। एक बार एक भील एक ऐसी जड़ी लाकर दे गया कि जिसको दिखा देने से शेर दूर से ही भाग जाता है। औषधियों के द्वारा कल्प करते हुए मनुष्य सैकड़ों वर्षों तक जीवित रह सकता है। इसी प्रकार की अनेक सिद्धियाँ औषधियों से होती

 

(५९)

हैं। ऐसी भी औषधियाँ होती हैं कि जिनको मुख में रख लेने से आकाश में उढ़ने की शक्ति आ जाती है।

३ - - मंत्र से सिद्धियाँ आती हैं। मंत्र का देवता अनुकूल होने पर अपने सामर्थ्यानुकूल कार्य वह करता है। यही मंत्रों के अनुष्ठान से होने वाली सिद्धियों का स्वरूप है। साधारण लोग यक्षणी या कर्ण - पिशाची आदि भूत - प्रेत या छुद्र देवताओं की सिद्धि कर लेते हैं और लोगों की भूतकाल की और वर्तमान की कुछ बातें बताकर अथवा कुछ असाधारण चमत्कारसा दिखाकर जनता में सिद्ध योगी होने का ढोंग करते हैं। इसी में सीधे - सादे लोगों को धोखा हुआ करता है।

४ - - तप से सिद्धि होती है। ब्रह्मचर्य का पालन करना, उपवासादि रहना तथा भगवत्प्राप्ति के साधनों में कष्टादि का सहन करना सात्विक तप है, इससे शान्ति व सन्तोष बढ़ता है। किसी के लौकिक उत्कर्षापकर्ष या मारण, मोहन, स्तंभन आदि के लक्ष्य से तप करना राजसी - तामसी तप का स्वरूप है। इससे शान्ति व सन्तोष न होकर अशान्ति और उद्वेगादि की वृद्धि के साथ - साथ काम - क्रोध आदि आन्तरिक शत्रुओं की वृद्धि हो जाती है और साधक का पतन हो जात्ता है।

५ - - समाधि से सिद्धियाँ आती हैं। किन्तु ये सिद्धियां, साधक को सर्वोंच्च स्थिति या जीवन्मुक्ति की अवस्था प्राप्त

 

(६०)

कराने में विध्न रूप होती हैं। इन सिद्धियों से स्थिर कार्यं होते हैं और यदि इनसे बहुत कार्य न लिया गया तो ये स्थायी हो जाती हैं।

तात्पर्य यह है कि किसी मनुष्य में कोई चमत्कार देखा जाय तो उसे सर्वथा योगी ही मान लेना ठीक नहीं। योगियों में जो चमत्कार होते हैं वे गम्भीर होते हैं और उन चमत्कारों का लक्ष्य अपनी प्रसिद्धि या जनता से धनादि संग्रह करना नहीं होता। वे केवल लोक - कल्याण की भावना से किसी पर दया - दृष्टि होने से ही होता है। इन सिद्धान्तों को समझ कर जनता को भ्रम से बचाना चाहिये।

भगवान् का भजन करो। सिद्धियों के अधिकारी बन जाओगे तो सिद्धियाँ स्वयं तुम्हारे पीछे - पीछे फिरेंगी।

अधिकारी बनना क्या है। लोक - वासना का न होना। जब तक जगत में नाना प्रकार की, पुत्र की, धन की, स्त्री की, मान - प्रतिष्ठा की वासनायें रहेंगी तब तक बलहीन ही रहोगे। कहावत है कि मंगन से 'खुदा' भी डरता है। जगत की वासनायें हटाकर एक परमात्मा के मिलने की वासना बढ़ाओ तो सिद्धि - समूह तुम्हारे पीछे - पीछे फिरेगा, सिद्धि ढूँढ़ने की तुम्हें आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

मार्ग वह अपनाना चाहिये कि जिसमें अपना गौरव नष्ट न हो। जहाँ तुम साक्षात् सर्वशक्तिमान परमात्मा से सीधा

 

(६१)

सम्बन्ध स्थापित कर सकते हो वहाँ तुम यदि छुद्र सिद्धियों के पीछे यहाँ - वहाँ ठोकर खाते फिरो तो तुम्हारा दुर्भाग्य है। निश्चय रखो कि यदि तुम सिद्धियों के पीछे भागोगे तो दूर से तुम्हें देखकर सिद्धियाँ दूर भागेंगी। यदि सिद्धियों की इच्छा न करके, सिद्धियों को अपनी आध्यात्मिक उन्नति मे बाधक मानते रहोगे तो हठात् तुम्हें घेर कर सिद्धियां तुम्हारे आसपास् रहेंगी। सिद्धियों को अपने वश में रखने का उपाय है कि निरन्तर भगवान् के तरफ झुके रहना और सिद्धियों से काम लेने की इच्छा न करना - यह है स्वाधीनता का मार्ग। यदि तुम्हीं सिद्धियों के पीछे - पीछे फिरने लगे तो होगा पराधीनता अपनाना। तब तो तुम सिद्धियों के स्वामी नहीं रह सकते, उनके दास ही कहे जाओगे। इसलिए सिद्धियों के दास नहीं, सिद्धियों के स्वामी बनने की चेष्टा करो। भगवान् के दास बनोगे तो सिद्धियों के स्वामी होकर रहोगे। भगवान् के सेवक बनकर रहोगे तो सब तुम्हारी सेवा कर्ंगे - यही वास्तव में स्वतन्त्र और स्वावलंबी होने का मार्ग है।

X X X

 

३६

जीव - ब्रह्म की एकता

*

निष्काम कर्म से जन्म - मरण की निवृत्ति। धर्माचरण से ही त्रण

अज्ञान का पर्दा हटाने पर जीव और ब्रह्म का अभेद स्पष्ट अनुभव में आता है। जीव और परमात्मा में जो भेद

 

(६२)

दिखाई देता है वह ऐसा है जैसा धान और चावल का भेद। जब तक भूसी है वह धान कहा जाता है और भूसी निकाल लेने से चावल तो वह है ही। इसी प्रकार जीव जब तक कर्म - बन्धन में पड़ा है तब तक पर्मात्म से भिन्न है। कर्म - बन्धन नष्ट होने पर वह पर्मात्मा ही है।

यद्यपि धान चावल ही है, परन्तु भूसी बिना निकाले कोई उसे उबाल कर नहीं खाता। इसी प्रकार कर्म - बन्धन को नष्ट किये बिना वेदान्त की पुस्तकें पढ़कर 'शुद्धोऽहं, विशुद्धोऽह' कहने लगने से कोई ब्रह्म नहीं हो जाता। कर्म - पाश से छुटकारा दिलाने का मार्ग बताने के लिये ही वेद और शास्त्र हैं। यदि हम क्रियमाण (आगामी) कर्मों को ही पर्मात्मा को अर्पण करते जाएं तो भी पुनर्जन्म के चक्र से छूट सकते हैं। यदि धान से समूची भूसी न हटे, केवल उसकी नोंक ही तोड़ दी जाय तो भी उसमें किसी प्रकार अंकुर नहीं निकल सकता। पुनः जन्म लेना ही कर्म का अंकुरित होना है। निर्मली में जल को साफ करने का गुण है, पर यदि उसे घिस कर पानी में न मिलाया जाय तो जल की गन्दगी नहीं हट सकती। उसी प्रकार सनातन वैदिक धर्म कितना ही अच्छा हो पर यदि उसे आचरण में नहीं लगाओगे तो तुम्हारा यह दुःख और दारिद्रय दूर नहीं हो सकता।

X X X

 

(६३)

३७

तृष्णा का त्याग और

ईश्वराराधन से ही सुख संभव

*

जगत के पदार्थों से जब कोई निराशा आती है तभी परमात्मा को प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न होती है। राजा भर्तृहरि को अपनी स्त्री के दुश्चरित्र का पता लगने पर धक्का लगा। तुलसी और पिंगला के उदाहरण भी यही बात पुष्ट करते हैं कि जगत में सुख की आशा भंग होने पर लोग परमार्थ की ओर उन्मुख होते हैं। परन्तु फिर भी ऐसे कितने मूर्ख हैं जो बार - बार संसार की असारता का अनुभव करने के बाद भी पिशाचिनी आशा का त्याग नहीं करते।

निरन्तर सावधान होकर विचार करते रहने की आवश्यकता है। स्त्री, पुरुष, धन, परिवार, वैभव आदि इनके अभाव में यदि दुःख मानते हो तो जिनके पास यह सब हैं उनके जीवन को जाकर देखो। यदि उन्हें उनसे सुख मिलता हो तो तुम भी इन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करो। जिनके पास यह सब वस्तुयें हैं उन्हें और भी अधिक क्लेश है। इसलिये तृष्णा को त्यागो। सुख तो तृष्णा को त्याग कर ईश्वर की आराधना करने ही से मिलेगा। संसार में सुख की आशा से

 

(६४)

कभी भी किसी के सामने दीन मत बनो ; क्योंकि सुख कभी किसी बाहरी वस्तु से प्राप्त नहीं होता। सुख का भंडार तो अपने अन्दर ही है। बाहर तों जो कुछ है सब दुःख का ही सामान है।

बाहर के सांसारिक पदार्थों में जो लोग सुखबुध्हि कर लेते हैं, उन्हें बाद में अनुभव होता है कि धोखा हो गया। मृग - मरीचिकी में जल की प्राप्ति तो हो नहीं सकती। यही है कि दूर से जल दिखेगा और उसकी प्राप्ति के लिये दौड़ते रहो। ठीक यही हाल उन लोगों का होता है, जो जगत् के पदार्थ धन, स्त्री, पुत्र आदि में सुख की भावना करके इनके संग्रह के लिये परेशान रहते हैं। इसमें केवल परेशानी ही उनके हाथ लगती है।

यदि सुख और शान्ति का अनुभव करना चाहते हो तो उसे बाहर के पदार्थों में न धूँढ़ कर अपने अन्दर ही धूँढ़ो। सर्वान्तर्यामी परमात्मा ही सुखस्वरूप है और अपने हृदय में ही उसका नित्य निवास है। इसलिये अपने अन्दर ही उसे धूँढ़ो। अपने अन्दर ही उस धूँढ़ोगे तभी वह जल्दी मिलेगा।

X X X

 

(६५)

३८

योजनायें बना - बना कर अपने जीवन को

उलझन में न डालो

*

जगत् तो धर्मशाला है। चार दिन यहाँ रहना है, फिर आगे चलना है। धर्मशाला के निवास में कोई भी प्रबन्ध की उलझन में बहुत अधिक नहीं फँसता - - जैसे होता है काम निकाल लिया जाता है। किसी चीज की कमी भी होती है तो लोग अधिक परेशान नहीं होते - सोचते हैं' कि धर्मशाले में दो दिन किसी तरह काट लो फिर तो इसे छोड़ ही देना है।'धर्मशाले में यदि कोई अपनी इच्छा के अनुसार प्रबन्ध करने लगे तो उसका सारा समय रहने का प्रबन्ध करते - करते ही बीत जाय और जिस कार्य के लिये वह उस नगर या ग्राम में आया है, वह कुछ न हो पाये।

जगत् को भी धर्मशाला ही मानना चाहिये। थोड़े दिन का जीवन है, यहाँ किसी को स्थायीरूप से रहना नहीं है। इसलिये जगत् के प्रबन्ध में बहुत दिलचस्पी मत रखो। उतना ही भाग लो कि जिससे निर्वाह होता चले। यह सदा स्मरण रखो कि जितनी तुम योजनायें बनाओगे, वे सब कभी भी पूरी नहीं हो सकतीं। इसलिये व्यर्थ में 'स्कीमें' (योजनायें) बना -

 

 

(६६)

बना कर अपने को आशा के सूत्र में टाँगे रहना और उसी के सम्बन्ध में सोचते - विचारते रह कर रात - दिन अशान्त बने रहना, इसमें समय की बरबादी के सिवा और कोई लाभ नही है।

जगत् में कितना भी प्रबन्ध करो, फिर भी कोई कमी बनी ही रहेगा। इसलिये जो मद्द कभी पूरा होने वाला नहीं है उसमें हाथ लगाना ही व्यर्थ है। जीवन - यापन के लिये सामान्य रूप से शास्त्र विहित पुरुषार्थ करते चलो और मुख्य पुरुषार्थ उसमें करो जिससे स्थायी सुख व शान्ति की प्राप्ति होना है। भगवान् की प्राप्ति के लिये प्रधान रूप से पुरुषार्थ करते हुए लौकिक पदार्थों की प्राप्ति में यह दृढ़ विश्वास रखो कि 'यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम्।' जो हमारा है वह दूसरे का नहीं हो सकता। जो अपने भाग्य (प्रारब्ध) में है वह अपने पास अवश्य हो आयेगा, उसे कोई रोक नहीं सकता। ऐसी धारणा बनाकर जगत् में लौकिक कार्यों के लिये अधिक व्यस्त न रहते हुए सामान्य लगाव से व्यवहार करते रहो। मुख्य लगाव परमात्मा में रखो। ऐसा करने से जीवन में शान्ति का अनुभव होगा और आगे का मार्ग भी उज्वल बनेगा।

X X X

 

(६७)

३९

भगवान् का अवतार किस लिये होता है?

*

गीता में भगवान् ने स्वयं अपने अवतार का हेतु यह बतलाया है कि "जब धर्म नष्ट होने लगता है तो उसका अभ्युत्थान करने के लिये, सज्जनों की रक्षा तथा दुष्टों का संहार एवं धर्म की संस्थापना करने के लिये, मैं युग - युग में अबतरित होता हूँ।"

प्रश्न हो सकता है कि भगवान् तो सर्वशक्तिमान् है, उनकी इच्छा मात्र से सारी सृष्टि का प्रलय हो सकता है, तब क्या बिना अवतार लिये ही वह धर्म की रक्षा और दुष्टों का संहार नहीं कर सकते? इसका उत्तर यह है कि अवतार धारण कर धर्म तथा धर्मिक जनों के उद्धार के लिये भगवान् जो लीलायें करते हैं, अपने जो यश का विस्तार करते हैं, उसका गान करते हुए भक्त जन मुक्त हो जाते हैं। ज्ञान - योग तो अत्यन्त कठिन है, सहस्रों में कोई विरला ही उसका अधिकारी है। परन्तु भक्ति - योग सुगम है और मनुष्य मात्र का उसमें अधिकार है। यदि भगवान् अवतार धारण कर साकार रूप में न आते तो भक्ति - योग का प्रचार ही कैसे होता।

भगवान् को साकार रूप में आ - आकर उन योनियों के सुख - दुःख भोगने की लीला नहीं करनी पड़ती, क्योंकि भगव

 

(६८)

अपनी योगमाया से शरीर धारण करते हैं - जैसे, नट नाना प्रकार के स्वरूप बनाकर उन्हीं के अनुरूप कार्य करने लगता है परन्तु उनके गुणों से अप्रभावित रहता है, वैसे ही भगवान् भी लीला मात्र ही करते हैं।

X X X

 

४०

मन के थोड़े सहयोग से ही व्यवहार चल

सकता है

*

प्रश्न यह उठ सकता है कि मन के सहयोग के बिना व्यावहारिक कार्य कैसे चलेंगे? इसका यही समाधान है कि जिस प्रकार कृपण ( कंजूस) मनुष्य सब व्यावहारिक कार्य करते हुए भी अपने धन को मुख्य मानकर हमेशा मन से धन का चिन्तन करता है, धन का ध्यान हमेशा रखते हुए भी वह समस्त व्यावहारिक कार्यो को करता रहता है ; इसी प्रकार मन से हमेशा भगवान् का चिन्तन करते रहने पर भी व्यावहारिक कार्य यथाविधि होते रह सकते हैं - - इसमें संदेह नहीं।

प्रधान व अप्रधान का भेद कर लेने से इस प्रश्न का उत्तर ठीक हो जाता है। एक बात और है - - मन जब परमात्मा में

 

 

(६९)

प्रधान् रूप से लग जाता है तब परमात्मा की कृपा प्राप्त होती है। परमात्मा सर्वशक्तिमान है। उसकी थोड़ी भी कृपा जीव का पूर्ण रूप से कल्याण कर सकतो है। ऐसे सर्वशक्तिमान भगवान् की प्रतिज्ञा है कि :-

अनन्याश्चिन्तयन्तोमां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमेंवहाभ्यहम्॥

अर्थात् - - जो मुझे अनन्य भाव से भजता है उसके लिये योग (अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त वस्तु का रक्षण) का प्रबन्ध मैं ही करता हूँ। योग और क्षेम में ही मनुष्य का सारा व्यवहार आ जाता है। जब सर्वशक्तिमान भगवान् समस्त व्यवहार संचालन का भार अपने ऊपर लेने को तैयार हैं तब भी मनुष्य व्यवहार के पीछे परेशान रह कर मन को सदा व्यवहार में लगाये रहकर परमार्थ से वंचित रहे इससे अधिक अज्ञानता और मूर्खता क्या हो सकती है!

भगवान् की जब यह प्रतिज्ञा है तब तो यह प्रश्न ही नहीं हो सकता कि मन को प्रधान रूप से भगवान् में लगा दें तो व्यवहार कैसे चलेगा। जब मन भगवान् में लग जायगा तो व्यवहार जो आवश्यक होगा, वह अधिक उत्तम रीति से चलेगा। यही उपनिषद् और गीता का सिद्धांत है और यही भगवान् के भक्तों का अनुभव भी है।

 

(७०)

अभी थोड़े दिन की बात है - - ४० - ५० वर्ष हुए होंगे, अधिक समय नहीं हुआ कि चुनकाई दास नाम के एक कानिस्टबिल थे। उनका नियम था कि सबेरे उठकर स्नान करके रामायण का पाठ करके फिर कुछ काम करते थे। एक दिन रामायण - पाठ करते - करते उसी में तल्लीन हो गये, देर तक पाठ ही करते यह गये। डिवटी का समय आया और दो घण्टे की डिवटी का समय भी समाप्त हो गया तब उन्हें याद आई कि डिवटी पर जाना है।

पूजन से उठकर देख तो मालुम हुआ कि डिवटी का समय बीत गया। घबराये हुए दिवटी में गये और जो सिपाही पहरा से रहा था उससे बोले की बड़ी गलती हुई, आज इतनी देर हो गई कि डिवटी का पूरा समय बीत गया, आपको बड़ा कष्ट हुआ होगा।

डिवटी वाले सिपाही ने कहा कि चुनकाई दास तुमको क्या हो गया है। अभी तो तुम हमको अपनी डिवटी का चार्ज दे गये हो, और फिर लौट कर आ गर और ऐसा कह रहे हो, क्या तुम्हारा मस्तिष्क तो नहीं फिर गया है। चुनकाई दास ने कहा - "नहीं मित्र, मुझको आज पूजन में देर लग गई। मैं तो अभी भागा चला आ रहा हूँ।"

उस सिपाही ने बार - बार निश्चय कराया कि आप ने ही अभी डिवटी दी है और मेरे आने के पहले आप की ही

 

(७१)

डिवटी थी और आप डिवटी पर बराबर थे। समय पूरा होने पर मुझको डिवटी देकर आप अभी गये हो। उसके बार - बार कहने पर चुनकाई दास को विश्वास हो गया कि मैं घर में भगवान् की आरधना में लीन था और यहाँ भगवान् ने स्वयं आकर मेरी डिवटी दी।

उसी समय चुनकाई दास ने नौकरी छोड़ दी। उसने कहा कि हमारे इष्ट को जब इतना कष्ट हमारी डिवटी के लिये करना पड़ा तो हम अब नौकरी नहीं करेंगे। नौकरी छोड़कर चुनकाई दास चित्रकूट चले गये और वहीं भगवान का भजन करने लगे।

ऐसे - ऐसे अनेक भक्तों को प्रत्यक्ष अनुभव हुए हैं जहाँ पर भगवान ने स्वयं उनके व्यावहारिक कार्यों को पूरा किया है। वेद - शास्त्र तो प्रमाणित करता ही है कि भगवान् की प्रतिज्ञा है कि जो अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करता है उसका आवश्यक व्यवहार भी मैं संचालन करता हूँ, परन्तु भक्तों के अनुभव भी भगवान् की इस प्रतिज्ञा को प्रमाणित करते हैं। इतने पर भी कोई भगवान् के भजन - पूजन - चिन्तन में न लगे तो उसका दुर्भाग्य ही है और क्या कहा जा सकता है।

अन्त में हमारा यही कहना है कि मन को तो प्रधान रूप से भगवान् के स्मरण में लगाओ और तन - धन को शास्त्रानुसार

 

(७२)

व्यावहारिक कार्यों में लगाओ - लोक - परलोक दोनों उज्ज्वल रहेंगे।

X X X

 

४१

लोक - परलोक में सर्वत्र सुख - शान्ति चाहते हो तो

सर्वशक्तिमान परमात्मा की शरण लो

*

मोक्ष तो मिलेगा ही, धन - धान्य व मान - प्रतिष्ठा भी मिलेगी।

यह न समझो कि परमात्मा के भजन से केवल मोक्ष ही मिलेगा - निश्चय रखो कि भगवान् के भजन से मोक्ष भी मिलेगा और धन - धान्य, मान - प्रतिष्ठा भी मिलेगी।

इसका कारण यह है कि भक्त भगवान् की उपासना करता है और भक्ति की पहली सीढ़ी 'श्रवण' दूसरी सीढ़ी 'कीर्तन' और तीसरी सीढ़ी 'स्मरण' को पार करके जब चौथी सीढ़ी में पहुँच कर 'पाद सेवन' अर्थात् मन से निरन्तर भगवच्चरणों का ध्यान करता है तो अहर्निष भगवत्पाद - सेविनी लक्ष्मी को भय हो जाता है कि कहीं भगवान का प्रेम अपने इस भक्त पर अधिक न हो जाय।

स्त्री यह कभी नहीं चाहती कि उसका पति किसी दूसरे से प्रेम करे। इसलिये उस भक्त को भगवच्चिन्तन से हटाने

 

(७३)

से लिये विघ्न रूप में लक्ष्मी उसे धन, यश, मान, प्रतिष्ठा देना प्रारम्भ करतो है जिससे वह इसी लौकिक जाल में पड़ जाय और भगवान् को छोड़ दे। इस प्रकार भगवान के भक्तों के पास लक्ष्मी विघ्न रूप में आती है।

आज आप जिसका इष्ट बुद्धि से चिन्तन करते हुए रात दिन परेशान हों और मारे - मारे भटकते हों वही रुपया - पैसा, मान - प्रतिष्ठा जबरदस्ती बिना आवाहन के आप के पास आयेगा, आप भगवान् की तरफ तो झुको।

गति - मुक्ति के लिये तो भगवान का भजन है ही, किन्तु लौकिक ऐश्वर्य चाहते हो तो भी भगवान् की शरण में आओ। साधक जब तप करता है तो देवराज इन्द्र का आसन डोल जाता है और वह तप में विघ्न करने के लिये नाना प्रकार के प्रलोभन सामने उपस्थित करता है इसी प्रकार भगवान का स्मरण छुटाने के लिये लक्ष्मी लौकिक ऐश्वर्य सामने लाती है। जिस प्रकार जब कोई कुत्ता काटने को दौड़े तो रोटी का दुकड़ा फेंक दो, वह उसी में उलझ कर रह जाता है ; ठीक उसी प्रकार लक्ष्मी भी सोने का टुकड़ा फेंकती है कि जिससे वे भक्त मेरे पति भगवान् के निकट न आवें तो अच्छा है!

भगवान के स्मरण से गति - मुक्ति भी होगी और लक्ष्मी भी धक्का खाएगी। व्यापार ऐसा करो जिसमें अधिक लाभ हो।

 

(७४)

तात्पर्य कहने का यह है कि भगवान के भजन से सब कुछ हो जाता है। जब तुम सर्वशक्तिमान का ध्यान अपनी तरफ खींच लोगे तो तुम्हारे लिये क्या अप्राप्त रह सकता है। आजकल अपना घर छोड़ कर भी लोग सेठों के यहाँ धक्का खाते - फिरते हैं। उन्हें धनवान का विश्वास है ; परन्तु सर्वशक्तिमान का विश्वास नहीं है। तभी दरवाजे - दरवाजे वे ठोकर खाते हैं।

जिन्हें भगवान का विश्वास है उनके पीछे संसार आज भी धक्का खा रहा है। इसलिये जब किसी का स्तोत्र करना ही ह तो भगवान का ही स्तोत्र करो जिससे लोक - परलोक दोनों बने।

लौकिक वासना कम करो और परमात्मा में राग बढ़ाओ। मनुष्य शरीर का यही उपयोग है कि विचार करके उस रास्ते पर चलो जहाँ सब प्रकार की सुविधा मिले।

X X X

 

४२

मन को संसार में कोई नहीं चाहता

तन और धन से व्यवहार करो

मन परमात्मा में लगाओ

*

इष्ट मित्र कुटुम्बो आदि सब अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति चाहते हैं। आप के मन को कोई नहीं चाहता! अपने पुत्र को लिखने - पढ़ने की सामग्री का प्रबन्ध मत करो और पास बैठा कर कहो कि बेटा हम मन से तुमको प्यार करते हैं, तो क्या वह संतुष्ट रहेगा? अपनी स्त्री की आवश्यकताओं की पूर्ति मत करो और उससे कहो कि हम हमेशा तुम्हारा स्मरण करते रहते हैं, मन से कभी तुमको नहीं भूलते, तो क्या वह संतुष्ट रहेगी?

इष्ट मित्र जो तुमसे व्यवहार में सहायता या सहयोग चाहते हैं उनको कुछ सहयोग न दो और कहो कि मन से हम आपको बहुत मानते हैं। वे यही कहेंगे कि अपना मन अपने पास रखिये, बन सके तो हमारा अमुक - अमुक कार्य कर दीजिये।

तात्पर्य यह कि संसार में कोई भी आप का मन नहीं चाहता। यहाँ सभी तुम्हारे तन और धन के ग्राहक हैं। मन तो तुम जबरदस्ती दूसरों के गले लगाते हो।

 

 

(७६)

स्मरण रखो कि जिस मन को संसार में कोई नहीं चाहता वही मन परमात्मा के निकट पहुँचने में काम आता है। इसलिये संसार के बाजार में तन और धन से व्यापार करो और परमात्मा के मार्ग में मन को लगाओ, तो संसार का व्यवहार भी नहीं बिगड़ेगा और परमार्थ का मार्ग भी साफ होता चलेगा।

जिसकी जहाँ जरूरत है उसको वहीं लगाना बुद्धिमानी है। मन को संसारी कार्यों में मत फँसाओ। मन का बहुत थोड़ा सहयोग देने से व्यवहार चलता जायगा। अधिक मन भीतर - भीतर परमात्मा में लगाओ।

जो संसार यहीं छूट जाने वाला है उसमें यहीं छूट जाने वाले तन और धन को लगाओ। जिस परमात्मा का कभी वियोग नहीं होना है उसमें सदा अपने साथ जाने वाले मन को लगाओ।

जैसा सौदा हो वैसा दाम चुकाओ। क्षणभंगुर सांसारिक व्यवहार में क्षणभंगुर तन और धन को ही लगाओ। मन तो सदा साथ रहने वाली स्थायी चीज है, परलोक में भी साथ ही रहेगा। इसलिये इसके साथ स्थायी वस्तु का सम्बन्ध जोड़ो। परम स्थायी चराचर में रमा हुआ सर्व व्यापक सदा सर्वत्र विराजमान जो परमात्मा हैं उसके साथ मन का सम्बन्ध जोड़ो। परमात्मा ही मन के साथ सम्बन्ध कराने योग्य है।

 

 

(७७)

और कोई वस्तु संसार में ऐसी नहीं है जिसके साथ मन का सम्बन्ध जोड़कर मन को संतुष्ट किया जा सके।

आप लोगों को स्वयं अनुभव है कि मन को आप धन में, स्त्री में, पुत्र में या इष्ट मित्र में लगाते हैं। पर क्या कहीं पर मन स्थिर रहता है? एक स्थान में अधिक समय तक नहीं ठहरता। यदि मन को धन से संतोष हो जाय या पुत्र से संतोष हो जाय तो वह फिर दूसरी जगह क्यों जायगा। किन्तु मन कभी भी एक पदार्थ में नहीं टिकता ; यही इस बात का प्रमाण है कि मन को कोई भी सांसारिक पदार्थ अच्छे नहीं लगते। किसी पदार्थ को अच्छा मानकर उसके निकट जाता है ; परन्तु थोड़ी देर में उससे हट जाता है। इससे मालूम होता है कि कोई भी सांसारिक पदार्थ मन को संतुष्ट नहीं कर सकता।

इसलिये सिद्धान्त यही निकलता है कि संसार में मन को कोई नहीं चाहता और मन भी किसी संसारी वस्तु से संसुष्ट नहीं होता - तात्पर्य यह कि न मन संसार के योग्य है और न संसार मन के योग्य है।

मन जब परमात्मा को पा जाता है तो वहीं स्थिर हो जाता है, फिर कहीं किसी दूसरी वस्तु की इच्छा नहीं करता। इसलिये यही निश्चय होता है कि मन के योग्य परमात्मा ही है। अतः जो वस्तु जिसके योग्य हो उसको वहीं लगाओ।

X X X

 

(७८)

४३

पतन से बचना चाहते हो तो पाप से बचो

और पुन्य को बढ़ाओ

*

जो शास्त्रानुकूल पुरुषार्थ है वही पुण्य है और वही अभ्युदय, लौकिक उन्नति और मोक्ष का देने वाला है।

जो काम जितने पुरुषार्थ से होने वाला है उतने ही पुरुषार्थ से होता है। जितने पुण्य से भवसागर से पार होते हैं उतने पुण्य के बिना पार होना संभव नहीं। किसी को एक सेर जल की प्यास लगी हो तो वह एक छटांक जल से कैसे बुझ सकती है!

धार्मिक ग्रंथों के पढ़ने से पुण्य अवश्य होता है। गीता, रामायण आदि का पाठ पुण्य - प्रद होता है। परन्तु केवल पाठ से इतना पुण्य संग्रह नहीं होता जो भवसागर से पार कर दे।

धार्मिक ग्रंथों के पाठ का खंडन यहाँ नहीँ कर रहे हैं। - पाठ तो करना चाहिये ; परन्तु पाठ करके ही अपना कर्त्तव्य समाप्त नहीं मान लेना चाहिये। जो उसमें लिखा है उसको कार्य रूप में लाने का प्रयत्न करना चाहिये, तभी उसका पूरा पूरा उपयोग माना जा सकता है और तभी विशेषरूप से पुण्य का संचय होगा। यदि पतन से बचना चाहते हो तो पाप से

 

(७९)

बचो, शास्त्र - विरुद्ध पुरुषार्थ मत करो ; पाप से बचो और पुण्य करो -- यही उन्नति का प्रकार है।

X X X

 

४४

मन को संसार में लगाओ पर इतना ही कि

परमार्थ न बिगड़े

*

हमारा तात्पर्य यह नहीं है कि आप लोग सब विरक्त बन कर व्यवहार छोड़ दो और भगवान् के भजन में लग जाओ। व्यवहार करो, परन्तु उसी प्रकार से करो कि जिससे व्यवहार भी भद्दा न हो और परमार्थ भी न बिगड़े। मन को संसार में लगाया और कहीं अधिक लगा दिया तो फिर रोजगार घाटे का हो जायगा।

जैसा लिफाफा हो वैसा ही गोंद लगाना चाहिये। किसी छोटे लिफाफे में ज्यादा गोंद लगा दी जाय तो गोंद से लिफाफा भी गन्दा हो जायगा और गोंद तो व्यर्थ जायगा ही।

मन तो गोंद के समान है, जहाँ लगाओ वहीं चिपक जाता है। व्यवहार में मन को विचार पूर्वक ही लगाना चाहिये। किस स्थान में मन को कितना लगाया जाय, यह अवश्य ही विचार कर लेना चाहिये। मूल बात यही है कि

 

(८०)

व्यवहार में मन को कम लगाओ और परमार्थ में अधिक लगाओ।

व्यवहार में यह ध्यान रहे कि जहाँ तक ह