25th November 2007

transcript of the 'salt statue' Part 1of4 parts of a talk by Guru Dev, Shankaracharya Brahmanand Saraswati.

premanandpaul@yahoo.co.uk

 

श्री शंकराचार्य उपदेशामृत

ब्रह्मलीन जगद्‌गुरु भगवान श्री शंकराचार्य

श्रीमद् स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज

ज्योतिर्मठ , बदरिकाश्रम ( हिमालय )

के पावन उपदेश

 


" और मनन वह मन क्या है

मन गया परमात्मा को डूंढने के लि‍ए

और वहीं चलो समाप्त हो गया पकड़ा गया

और पकड़ा जायेगा अवश्य

जैसे लवण के पुतली

लवण का चित्र बना कर के समुद्र में छोड़ दिया जा‍एण् कि

जा‍ओ - तुम इसका समुद्र - की पैमा‍इश करो इसका थाह लो कितना गहरा समुद्र है।

तो पुतली चली तो जायेगी

वोह् नम नमक की जो प्रतिमा है

वह चली जायेगी पर लौट कर चली आ सकती ही है

वोह् लौट न जाने नहीं को‍ई सच कठिन‍ई नहीं

वोह् लौट कर जाने न को‍ई कठिन‍ई है

जहां समुद्र में ग‍ई गल ग‍ई लौट कर कौन कहे कि कितना गहरा समुद्र है

इसलि‍ए मुमुक्षु जब परमात्मा का अनुभव करता है

तो फिर लौट कर तब कह ही नहीं सकत है

कैसा परमात्मा है

कैसा आत्म है

गूढ़ तरु वह उस में लीन ही हो जायेगा

कहना सुनना तभी तक है

बोलना बताना तभी तक है

जब तक परमात्मा को देखा नहीं "

 

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