Last updated 25th November 2007

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श्री शंकराचार्य उपदेशामृत

ब्रह्मलीन जगद्‌गुरु भगवान श्री शंकराचार्य

श्रीमद् स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज

ज्योतिर्मठ , बदरिकाश्रम ( हिमालय )

के पावन उपदेश

जब मन नहीं पहुंचता और वाणी नहीं पहुंचती तो आखिर जब मन - वाणी ही तो हमारे दो साधन है। परमात्मा को जानने का और व्यवहार जानने का। व्यवहार भी हम जानेंगे तो मन - बुद्धि से जानेंगे , परमार्थ भी जानेंगे तो मन। बुद्धि से जानेंगे और वेद में लिखा है :-

" स्मृतियो बाचो निवर्त्यन्ते प्राथमन साभः "

जहाँ वाणी - मन के सहित ही वाणी निवृत्त हो ; अब बतला‍इये निराशा न हो तो क्या हो ? घोर निराशा है। जब हमारे पास और साधन क्या है? जब प्रत्यक्ष वायु चक्षु से दिखते नहीं और मन - बुद्धि उनके निकट पहुंची नहीं सकती , तो पूरी निराशा होती है। पर इसी पर इसलि‍ए। कहा।

" मन संवादं दृस्श्टव्यं "

कहे , नहीं निराशा मत करो - " मन संवादं दृष्टव्यं " वह , मन ही से जाना जाता है। अब यहां थोड़ा सा विचार हु‍आ है कि नहीं , मन संवादम् दृष्टव्यं , मन से ही परमात्मा जाना जाता है। अब दोनों श्रुति हैं में। दोनों श्रुति हैं। दोनों वेद के वाक्य हैं। उपनिषद् वाक्य हैं। -

" मन संवादं दृष्टव्यं।" " यतो वानो निवर्त्यण्ते प्राभमन साभः।"

दोनों में विशेष होता है - एक वाक्य है के मन के सहित वाणी निवृत्त है। एक में है कि मन से देखा जाता है , जाना जाता है। जब ये श्रुति ने कहा कि - ' मन संवादं दृष्टव्यं ' - मन से अनु दृष्तव्य है।

मन से ही करके जाना जाता है। तब कुछ जीवों को धैर्य हु‍आ। हो - कौन मन है जिससे जाता है ? और कौन मन ऐसा है कि जो निवृत्त होता वहाँ से ? भ‍ई - " मनो इति उधं प्रबुद्ध शुद्ध चातुर्धनेवच " दो प्रकार के मन हैं - एक शुद्ध , एक् अशुद्ध। जो अशुद्ध मन है , उस करके तो अप्राप्य है। और जो शुद्ध मन है उस करके अनुदृष्तव्य है। दोनों श्रुतियों का अर्थ तो गया - दो प्रकार के मन होने के नाते एक मन तो संसारी है , उसमें तो परमात्मा दूर - अति दूर है। एक मन शुद्ध है जहां शम - काम संकल्प नहीं है , को मन शुद्ध है। शुद्ध मन अनुदृष्तव्य है। शुद्ध मन से ही अनुभव होता है। तो हमारा कर्तव्य क्या होता है ? कि हम जिससे परमात्मा को जानेंगे उसको बना‍ओ। परमात्मा तो बनी - बना‍ई चीज है। उसे हम बना नहीं सकते हैं। किन्तु जिससे हम जानेंगे वो साधन हमे बनाना चाहि‍ए। अब आहार शुद्धि पर जोर दिया , अब जो इसको नहीं समझते , इसके महात्म को परन्तु -

" आहार शुद्धौ सत्त्व शुद्धिः ; सत्त्व शुद्धौ , ध्रुव स्मृतिः "

[By performance of yajnas, all activities become purified, as it is stated in the Vedas: aahara-shuddhau sattva-shuddhih sattva-shuddhau dhruva smRitih smRiti-lambhe sarvagranthinam vipramokShah .]

लिखा है आहार शुद्धि से सत्व - अंतःकरण की शुद्धि हैं। अंतःकरण की चार वृत्तियां हैं - मन , बुद्धि , चित्त अहंकार। अंतः करण एक चीज है उसके चार वृत्ति हैं , चार भेद हैं , चार पाद हैं। वो कौन हैं - मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार। मन और बुद्धि , चित्त और अहंकार। ये चार - एक का भी नाम से सो - तब भी अंतःकरण का बोध होता है।

बुद्धि कहो तब भी अंतःकरण आ गया , केवल मन कहो तब भी अंतःकरण आशय , अहंकार कहो तब भी अंतःकरण आशय और यह सब है - मन , बुदि , चित्त और - - - - सो इसलि‍ए ये हो चार वृत्तिय हैं , यही संसार में आत्म को भरमाया करती हैं। कभी तो मन के झगड़े - नाना प्रकार के - मन को तो भस्मक रोग हो गय है। भस्मक रोग ये हो गया है कि खाते जा‍ओ चाहे जितना खाते जा‍ओ भी पेट न भरे। वैध्य लोग समझते होंगे भस्मक रोग। बस भस्मक रोग यह् स्वभाव है कि खाते जा‍ओ - खाते जा‍ओ - मनो खाय डालो पेर न भरे। इसी तरह से भस्मक रोग जो है आते जा‍ओ दस हजार आने , पांच हजार अन्ने , दसलाख आने , बीस लाख आने , क‍ई करोड़ अभ्य जाय हाथ - हाथ मचा‍ई हु‍ई है भस्मक रोग। ये कभी सन्तुष्ट , नहीं होता है। यदि किसी के पास दस लाख है तो सोचता है कि दस करोड़ हो जाता तो बहुत अच्छा जिसके दस करोड़ हैं , दस अरब हो जाता तो ठीक है। अब पीछे तो नहीं देखता है कि , दस अरब नहीं जितना भूमण्डल में धन है और जितनी भूमण्डल में ब्रह्मांड के अन्दर स्त्रियां हैं , जितने बच्चे हैं , जितना भोग सामग्री है सब हमको मिलजाय तो हम क्या करेंगे। मानलिया , है असंभव पर कदाचित मिल ही जाय तो हमारे किस काम की चीज होगी। जब हमे हाथ - हाथ करके मरना है तब तो फिर ये बेकार की चीज है। जहां से सुख - शांति मिले वही चीज है। तो

कभी धन से , स्त्री से , पुत्र कभी सुख - शान्ति किसी को मिली है , है को‍ई उदाहरण। भगवान रामचन्द्र विष्णु रूप में हु‍ए विष्णु भगवान पुत्र रूप में आये , दशारथ के यहां। हमारे यहां तो सब औरत पुत्र हैं , अर्थात मैथिली सृष्टि से संसार उत्पन्न हु‍आ। उनसे हम क्या सुख उठायेंगे , जो साक्षात भगवान माया के गर्भ में आये और जगत कल्याण के लि‍ए आये परन्तु प्रत्यक्ष में तो कौशल्या - दशरथ के पुत्र कहाये। पर दशरथ की हालत - कौशल्या वैधव्य भोगा कौसल्या विधवा हो ग‍ई और दशरथ मर गये। भगावान रामचन्द्र अपना वन - वन गये। परन्तु दशरथ को क्या सुख हु‍आ। भगवान के पुत्र रूप में आने से दशरथ तो हमेशा ही परेशान रहे। वृद्धावस्था में चिन्तित रहे सन्तान के बिना। और जो सन्तान किसी प्रकार से हु‍ई तो थोड़े दिन में वियोग हु‍आ उसके साथ उनका प्राण भी चला गया। ऐसा संसार विलक्षण है। जब दशारथ को लाभ नहीं हु‍आ तो हम भला इन पुत्रों से , इन वृत्तान्त से क्या लाभ उठा सकते हैं ? जिसके लि‍ए हम परेशान हैं। दिखलाया है कि थोड़ी सी बातें जो हम कहते हैं खण्डन कर देते हैं। तो हम लोगों का तो खण्डन करना का स्वभाव रहा मण्डन तो जगत का कभी किया नहीं। जीवन में जगत का मण्डन करने का अवसरे नहीं आया , खण्डने - खण्डन रहा। तो कभी

कभी ऐसा उद्‌गार आ जाता है कि जब हम बहुत बढ़ जाते हैं तो लोगों को कष्ट होने लगता है। केवल राग जो होता है , सांसारिक पदार्थों में राग हमारे लि‍ए घातक है। पदार्थ घातक नहीं। हमारे लि‍ए को‍ई भी स्त्री - पुत्र धन को‍ई भी बाधक नहीं है। केवल हमारे विचार हमको परेशान करते हैं। बस विचार हमारा ठीक हो जाय , मन को काम संकल्प रहित कर हो -

" अशुद्धं काम संकल्पम् शुद्धां काम विवर्जितम् "

जैसा की शास्त्रों में कहा है - मामा प्रकार की कामनायें भरी हु‍ई हैं , वह मन तो अशुद्ध है , और काम संकल्प से रहित जो मन है सो अशुद्ध है - अरे - शुद्ध है। तो मन को काम संकल्प रहित करो स यही पुरुषार्थ है , यही धर्म है। काम संकल्प रहित मन को करो यही धर्म है। आपका का धर्म क्या - कर्तव्य है। काम संकल्प से रहित हो तो कैसे हो ? उसके लि‍ए हमारे यहां - आहार शुद्धि है। आहार शुद्धि का हमारे यहां इतना बड़ा उदाहरण दिया है कि इससे भारी ज्वलन्त दुसरा उदाहरण नहीं हो सकता महाभारत के अन्दर - कि भीष्म ऐसे वीर और भीष्म पितामह इस प्रकार के बालक - ब्रह्मचारी परन्तु दुर्योधन का अन्न खाकर के ऐसी बुद्धि उनकी हो ग‍ई कि द्रौपदी का चीरहरण होने लाग - चुप - चाप बैठे रहे। दुःसाशन द्रौपदी के चीर का हरण करता है , बड़ा धोर अत्याचार हो रहा है , सभा के अन्दर , परन्तु भीष्म मौन बैठे हैं। कथा है इसका फल। वो दुर्योधन - दुरात्मा का अन्न खाते से , जिससे भीष्म की बुद्धि भ्रष्ट थी , तमोगुणी बुद्धि थी। अन्त में

जब मरने लगे , बाणप्रज्ञा पर गये तो लगे ज्ञान का उपदेश करने। तमाम लोग ऋषि - महर्षि गये और ज्ञान की चर्चा होने लगी। द्रौपदी बैठ करके थोड़ा सा मुस्करा‍ई। समझ गये - अपनी कमजोरी मालूम हो जाता है। को‍ई दुराचारी - पापाचारी होय , जरा हंसी दे वो तो सोचेगा कि हमारे ऊपरी हंस रहा है हंसते हैं सभी । ये जो है , स्वाभाविक बात है। कहीं की हंसी ऐसी होती है कि उसमें खटकती है। वो हंसी ही में अपना अपमान मान लेता है। एक समय एक जमींदार का किस्सा है , प्रत्यक्ष ही वो कहीं बाजार से निकला , तो एक बार एक महाजन ने कहा - " महाराज पाय लगी " कहा - " निरंजीव रहो ", दूसरी बार फिर लौटा तो " पाय लागि " तो उसने समझा कि लगादा है थे। सभी पुनः हंन्सते हैं । एकबार तो " पाय लागि " ठीक है। हम ब्राह्मण है। ये वैश्य है और बाजार से निकलते प्रणाम किया। जब फिर लौटे , फिर भी नम्बार दार " पाय लागि " तब उसने सोचा कि जो इसके हमारा थोड़ा सा जो रुपया लिया है इससे उसका तगादा है। बता‍ओ " पाय लागि " में तगादा समझ लिया उसने। जब ये व्यवहार की बात है , तो जब द्रौपदी को थोड़ा सा हास्य अब विमुक्त हु‍आ तब मालूम होगया भीष्म का कि हमारी गलतियों का सम्बन्धं ये बतला रही है हंसन - कहा कि।।।। भीष्म जी बोलते हैं कि " बेटी हम समझ जिस समय तूं हंसी , उस समय जब ये तेरा अपमान हो रहा था , मैं उसी सभा में बैठा था। और जो - जो काम होता था। मुझे बुश नहीं

लगता था। पर अब जो है कारण है कि दुःशासन पतित दुर्योधन का धान्य मैं खाला था इसलि‍ए मेरी बुद्धि उस समय रजागुणी , तमोगुणी थी इसलि‍ए न्याय - अन्याय का ज्ञान ही नहीं रहा। दुःशासन को‍ई इतना बलवान नहीं। भीष्म के एक चपेटिया का था। एक थप्पढ़ लगा देते , दुःशासन समाप्त हो जाता। ऐसे - ऐसे महारथी बैठे ये फिर भी द्रौपदी का अपमान हो रहा था। किन्तु बुद्धि ही से तो विचार होता है बुद्धि अन्न के द्वारा भ्रष्ट रही , तब भीष्म ऐसे ब्रह्मचारी , की बुद्धि जब भ्रष्ट हो ग‍ई दुर्योधन का अन्न खाकर और अनुचित को अचित् मानने लगे। तब आप लोगों की बुद्धि भ्रष्ट हो जाय तो क्या आश्चर्य है। इसलि‍ए आप लोगों की बुद्धि यदि तमोगुणी हो जाय और विपरीत ज्ञान हो जाय , अर्थात विपरीत ज्ञान वो है कि जो शुद्ध को अशुद्ध मानना ; उचित को अनुचित मानना यही जो है अज्ञान का चिन्ह है। अविध्या का चिन्ह क्या है ? प्रत्यक्ष में , - जो वस्तु विहित है , उसको अविहित मानना। जो वस्तु उत्तम है उसको निकृष्ट मानना। आज क्या हो रहा है ? सब कुछ मिथ्या , आजकल यही संसार है। नाना प्रकार के वाद उत्पन्न हो रहे हैं। ये वाद उत्पन्न होना बुद्धि ही का काम तो है ? मनुष्य तो वही है। अनेक प्रकार के विचार हो रहे हैं , इसी विचार धारा से संसार का पतन भी हो रहा है , इसी विचार धारा से

अत्थान भी हो सकता है। इस भाव से अशुद्ध मन कैसे निवृत्त हो ? काम संकल्प निवृत्त हो ? इसका यही भाव है कि आहार शुद्धि। आहार शुद्धि की गड़बड़ी। आहार शुद्ध न होने से मन में॥॥

साफ ही लिखते हैं -

" आहार शुद्धौ सत्व शुद्धिः "

ये चन्दोग्य उपनिषद का वाक्य है। वेद का वाक्य है। ये आहार शुद्धि से सत्व शुद्धि होती है।

" सत्त्वं " अंतःकरण का नाम हैं। अंतःकरण की चार वृत्तियां होती हैं। उन चारों वृत्तियों पर आहार शुद्धि का प्रभाव पड़ता है। मन , बुद्धि , चित्त और अहंकार।

" सत्त्व शुद्धौ ध्रुव स्मृतिः "

यदि सत्त्व शुद्ध हो जाय , अंतःकरण शुद्ध हो जाय , तो स्मरण शक्ति तीव्र होती है। स्मृति जो है - अभी तो यह है कि कालेज में पढ़कर आ‍ओ , स्कूल में पढ़कर आ‍ओ , घर में विचार करो , टीचर भी दांती पर चढ़ा रहता है। तब भी जो है जब परिक्षा देने जाते हैं तो देवतै उनाते हैं किसी तरह से चहे हम मध्यम ष्रेणी में भी आ जाते , तब भी अच्छा था , फर्स्त क्लास न आते , अपनी बुद्धि का भरोसा नहीं। इसलि‍ए भरोसा नहीं कि बुद्धि काम नहीं कर रही है। और -

" स्मृति लम्धे सर्व ग्रन्थिनं विप्र मोक्षः "

और जब स्मृति प्राप्त होती है तो जितनी ग्रन्थियां

है , समस्त ग्रन्थि - जीव - ब्रह्म के बीच जितनी ग्रन्थियां हैं। वे सब नष्ट हो जाती हैं। इसी पर आगे कहा है -

" विध्यन्ते हृदय ग्रन्थि हृद्रन्ते सर्व सम्शयाः। दिरयन्ते चार्त्स् - कर्माणी प्रयमिन परावरे।"

परावर परमात्मा को जानने के बाद , हृदय की ग्रन्थि का भेदन हो जाता है और सर्व संशय का भेदना हो जाता है।

" विध्यन्ते हृदय ग्रान्थि हृद्रन्ते सर्व सम्शयाः।"

जितने संशय हैं , संशय जो है - अनेक प्रकार का - संशय का तो महकमै अलग है। संशय - प्रमाण गत संशय , प्रमेय गत संशय। प्रमाण हैं - वेद - शास्त्र। और प्रमेय है - परमात्मा तो परमात्मा - वेद - शास्त्र परमात्मा के प्रतिपादन करने वाले हैं या संसार के प्रतिपादन करने वाले हैं। संसार की चर्चा - जीव - ब्रह्म को अभेद क प्रतिपादित करती हैं श्रुतियां , या भेद को प्रतिपादित करती हैं ? इसी में संशय ! इस वास्ते प्रभाण गत , प्रमेय गत अनेक प्रकार के संशय निस्संशय आदिक हैं। तो जब संशय हमारा निवृत्त नहीं होता है , तो

" नायं लोकोऽस्ति न परो , न सुखं संशयात्मनः " गीत को देखो - " नायं लोकोऽस्ति न परो , न सुखं संशयात्मनः "

जो सशयात्मक लोग हैं उनको न यहां सुख और न परलोक की प्राप्ति हो सकती है।

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" सम्शयात्मा विनश्यति "

संश आत्मा जो है , वह सनातनी होता है इसलिये संशय कैसे निवृत्त हो , आत्म शुद्धि पहले , उसके बाद वातावरण का विचार करना चाहि‍ए हम परमात्मा। को जानने की चेष्टा करते हैं तो विषयी पामर दुराचारी , पापाचारी यों का सम्पर्क कम रखें। पहले तो नहीं ही रखें , यदि इतना आवकाश नहीं है तो कम से कम कम तो कर दें। धीरे - धीरे कम करते चलें , कभी कम हो जायगा और बुद्धि में मलिनता है ही , और साथ ही साथ आप लोगों का वातावरण भी उसी तरह का है। तो मन शुद्ध हो तो कैसे हो और जबतक मन नहीं शुद्ध होता है तब तक परमात्मा के निकट जाने का को‍ई साधन नहीं। मन शुद्धी का प्रकार यही है। जिस समय आपका मन शुद्ध हो जायगा , यही परीक्षा है , उस समय आप किसी से ईर्ष्या नहीं करेंगे। आज जो को‍ई धनी - धनी हैं , एक तो धनी है दुसरा रोता है बैठ को कैसे इतना बड़ा आदमी हो गया थे ? अब बतला‍इये उसे अपने कर्म का फल है , तुम्हें क्या विपत्ति धेरे है तुम् क्यों रोते हो ? इस वास्ते निरर्थक को‍ई - को‍ई आदमी ऐसे जला करते हैं , जिसका को‍ई मतलब नहीं अपने भग्य का फल भोग रहा है , तुमको क्या चिन्ता है ? तुम भी धर्म - कर्म करो , वेद शास्त्र को मानने पहले तो नहीं होगा पहले तो जन्म होगा तो तुम इसी प्रकार

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के होगे , जिसके लि‍ए इस समय ईर्ष्या कर रहे हो मत्सर कर रहे हो। तो ऐसे भी लोग हैं कि पाप करै को‍ई और चिन्तन करें थो। को‍ई धनी हो , तो चिन्तन करना ईर्ष्या करना कि इसको किसी तरह से हानि पहुंचा‍ओ , ये कैसे आगे बढ़ रहा है ? यदि बुद्धि अशुद्ध है , तो इस तरह की बातें होती हैं। और बुद्धि शुद्ध हो जाय तो यह भावना उत्पन्न हो सकती है कि यह बलाय परमात्मा इन्ही को दे हम इससे अलग रहें तो अच्छा है। यह धन - दौलत , मान - पान प्रतिष्ठा ये कूड़ा - करकट इन्ही के पास रहे तो बड़ा अच्छा है , हम तो बचे। उसे हैं। यह शुद्ध मन का लक्षण है। और अशुद्ध मन का लक्षण है , कि ईर्ष्या करना , द्वेष करना। किसी की हानि नहीं पहुंचाना। मन , वाणी और शरीर से किसी की हानि हो। उस काम को नहीं करना। यह शुद्ध मन का लक्षण है। क्योंकि हमारी॥। हानि करें भी तो हम कुछ नहीं कर सकते केवल कलंकै हम लेंगे यहि उसका रक्षक उसके कर्म हैं , प्रबल हैं तो हम कुछ करी नहीं सकते। प्रहलाद कि हानि करने के लि‍ए हिरण्यकश्यपु ने क्या नहीं किया ! प्रहलाद को परेशान करने के लि‍ए उन्होने क्या नहीं किया ! पर सब निष्कारण होता चला गया। इसलि‍ए यदि आप लोग परमात्मा का सहारा लेते हैं तो प्रहलाद की रजिस्ट्री नहीं हो ग‍ई है भक्ति। आप भी प्रहलाद ही हैं। केवल

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भावों की कभी के कारण आप गली - गली ठोकर खाते हो। यदि आप के भाव शुद्ध हो जाय , वही परमात्मा प्रहलाद के लि‍ए थे , हमारे लि‍ए हैं। हम कूड़ा - करकट को भजते हैं , भगवान को नहीं भजते। हमारे भजने के लि‍ए तो बहुत लोग हैं। न जाने कितने इष्टदेव हमारे हैं। कामुक लोग जो हैं वो अपनी स्त्री को भजते हैं। को‍ई जो है आनपत्य है , सन्तान हीन हैं तो पुत्रों को भजता है। पुत्रों की बात जो है वो इस प्रकार की है कि जिसके सन्तान नहीं है , वो रात्रि दिन परेशान , किसी भी तरह से को‍ई सन्तान हो। जब नहीं हु‍आ तब परेशानी , और हो गया तो उसके पालन - पोषण में परेशानी। नाना प्रकार के देवी - देवता , भूत - भवानी पूजते - पूजते मेर जाते हैं कि किसी भी तरह से इसकी रक्षा रहे। मस्जिद में जायेंगे , फूँक डलवायेंगे इनकी मुसलमानों की , ये नहीं समझतें कि भला इन मांसाहारी की फूँक से क्या होगा ? पर देखो तो मस्जिद के सामने हिन्दु‍ओं कि स्त्रियां बस खड़ी। ये वासना क्या नहीं करा देती है।

एक समय , हम पंजाब में थे , तो ब्रह्मचारी थे उस समय। तो चाय बहुत पीने की आदत वहा थी लोगों की। तो ले आये कुल्हड़ में। चाय तो हमने कभी पीया नहीं तो एक व्यंग हमने कहा - " चाय चूहड़ी , चाय चमारी , चाय नीच न की नीच तु तो शुद्ध ब्रह्म है जो चाय न होती बीच "

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यही , कहे करके हंसते हु‍ए हमने गाया - चाय चूहड़ी चूहड़ा को पंजाब में भंगी कहा जाता है। तो भंगी की स्त्री चूहड़ी हु‍ई - तो चाय चूहड़ी - चाय - चमारी , चाय नीच न की नीच तूं तो शुद्ध ब्रह्म है जो चाह न होती बीच "। तू तो साक्षात परमात्मा ही है तेरे बीच में चाय जो है यही एक खराबी की चीज है। चाय हमने नहीं कहा - चाह ही कहा इसलि‍ए - इसलि‍ए हमारे बीच जो अन्याय की चीज है वो इच्छा ही है। वो इच्छै जो है रात्रि दिन हमको परेशान करती है और एक इच्छा जो प्रबल हो जाय भगवान के मिलने की , तो सारी इच्छायें समाप्त हो जाया को‍ई रहे‍ई नहीं सकती। और अनुभव आप लोग करो कि जो जो इच्छा आप लोगों ने किया , और सब चीजें आपको मिली भी , और उससे कितनी तृप्ति आपको हु‍ई ? आपना अनुभव करो , हमारे कहानी की जरूरत नहीं। जो - जो इच्छायें आपकी हु‍ईं , वो - सब आ‍ईं। दो आने , चार आने आ‍ई , अनुभव तो हु‍आ , पर परन्तु उन इच्छा‍ओं की पूर्ति से आपको क्या लाभ हु‍आ ? आप नोट करो तो पता चले। यदि एक आना भर लाभ हु‍आ , तो पंद्रह आने दुःख आपको भोगना पड़ा। एक आने तो लाभ और पंद्रह आना दुःख उठाना पड़ा उन चीजों के लि‍ए। तो इस वास्ते - वासना - लौकिक वासना साध्य जो वस्तु है वह तो मिथ्या ही है। कभी हमारे हित की चीज नहीं। जब लड़का पैदा हु‍आ , पालन - पोषण ,

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विवाह - विवाह भी हो गाया। पढ़ाया - लिखाया भी गया और कहीं बहु आय ग‍ई , और " कहीं अंग्रेजी पढ़ी आय ग‍ई , अंग्रेजी पढ़ी लिखी आ‍ई बस " उसने यही कहा - " देखो बात यही है ये एक अपने माता पिता को हमने छोड़ा। तुमको भी छोड़ना पड़ेगा , इसलिये हमारी - तुम्हारी तभी बनेगी , जब तुम भी हमारी तरह से बनो। हमने अपने माता - पिता को छोड़ा , तुम भी छोड़ो अपने माता - पिता को। बस माता - पिता के लि‍ए॥॥ को‍ई प्राचीन विचार की हों , ऐसा नहीं है बहुत सी ऐसी साध्वी है कि सबका बिचार ऐसा नहीं है। पर जो अच्छे बिचार की हैं उनके लि‍ए तो कुछ कहना ही नहीं है। कहना क्या ? वह तो ठीक ही हैं। पर जो इस प्रकार के बिचार की हैं उनके लि‍ए यह कहा जाता है। तो ये क्या हु‍आ ? धार्मिक शिक्षा यदि उनकी होतीं तो कभी बिचार न करतीं की तुम भी अपने माता - पिता को छोड़ो तब हमारा तुम्हारा व्यवहार बनेगा। खैर माता - पिता तो रोते हैं ; बहू के नाम से पुत्रों के नाम से। बहू हमारा॥। न जाने हमारे यहां ऐसे कितने प्रश्न के आते हैं , को‍ई बनावटी बात नहीं। कहीं कह ना बिगाड़ गया , पिता का अपमान हो रहा है। तो इस प्रकार का दुःख - रुपये में हम समझते हैं - सौ में नब्बे इस प्रकार के लोग हैं कि जो अपने पुत्र से , पुत्र बधू के पीछे रो रहे हैं। दस वो नहीं हों तो कह सकते हैं। को‍ई सामने रोते

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हैं , को‍ई हृदय में रोते हैं। को‍ई तो सामने रोया करते हैं , को‍ई अपने हृदय में रोते हैं। इसी रोना छुड़ाने के लि‍ए हमारे शास्त्रों में लिखा है कि चतुर्थ पन में वन में चला जाना चाहि‍ए। चरुर्थ पन में॥। तब तक गृह में रहो। अपना बल ठीक है , हम रुपया - पैसा खर्च करते हैं , तब तक तो गृहस्थ आश्रम में रहो , जिस समय हम में

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