Last updated 25th November 2007
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श्री शंकराचार्य उपदेशामृत
ब्रह्मलीन जगद्गुरु भगवान श्री शंकराचार्य
श्रीमद् स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज
ज्योतिर्मठ
, बदरिकाश्रम ( हिमालय )के पावन उपदेश
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तो हम मूल तो नहीं जानते केवल सबूत के ऊपर मिथ्यावादियों के साथ
, हम उसको सजा दे दिया इसलिए जो मिथ्यावादी साक्षी है उसके साक्ष्यत्व ही उसके। - - - केवल पेट के लिए यमराज का पीड़ा करना अच्छा नहीं। ये जनम से हमारे यहां आदेश होता है कि केवल पेट के लिए - क्योंकि जन समस्त - - - परन्तु पेट ही तो है। वेतन पाओगे , रुपया पाया , --- खड़ा तो किया , खाया - पकाया , सोया , फिर सबेरे बैंक , कचहरी जुट गया फिर कचहरी में। इसीलिए बल्कि हमारा तो कहना ये होता है कि स्टेशन पर पल्लेदारी कर लेना अच्छा और जज होना अच्छा नहीं। ----- कि महाराज हम लोगों को तो बड़ी वासना रहती है इसकी। कहीं जज हो गये तो बड़े प्रसन्न होते हैं। कोई वकील२२
अगर कहीं
, कलक्टर - - - कहीं जज हो गया तो अपने --- ऊन लेता है कि पहले हैं ॑ हुजूर ॑-॑ हुजूर ॑ कहा करता था , अब मेरे सामने हुजूर - हुजूर कहेंगे सब। अल्ल् अरे लौघिन्ग् क्यों कि हुजूर - हुजूर हुजूरं बोलते - बोलते अब मैं भी हुजूर बन जाउंगा। तो ऐसी वासना इस संसार में है , इन वासनाओं को प्रवृत्त हो कर के मनुष्य महर्षि लोग त्रिकालज्ञ होते हैं। अचित अनुचित का विचार कही करता।* * * चार हजार तनखाह होगी आपकी सौ रुपये होगी किन्तु उसकी जिम्मेदारी कितनी है की अनायास दण्ड दे देना , इसलिए इन लोगों को * * * ऐसा नहीं , योग्य होना चाहिए जजों को। यह समझ लो यदि हमको यह मालूम पड़ जाय कि यह केश झुठा है , तो सब कुद कागज में प्रतीत होते हुओ भी हम लेखनी से उसको बरी कर सकते हैं। यदि हमे प्राणान्त दण्ड देने का अधिकार् है तो हम अपने लेखनी से बरी भी कर सकते हैं , अलग कर सकते हैं पर हम जानते नहीं है मिथ्या कागजों के सबूत के ऊपर मातहत अदालत ने सजा कर दी , प्राणान्त दण्ड दे दिया अपील में भी वही कागज , घसीटा गया तो क्या रहा उसके अन्दर , यें तो आपके * * * कि यदि ** जज भी तो कोई होगा। यह कहना हमारा नहीं की ये कचहरी टूट जाय , ये तो समय * * * जो त्रिकालज्ञ होता है , त्रिकालज्ञ दो प्रकार के होते हैं - एक * * * , एक परमात्मा होते हैं। महर्षि मत लोग नेत्र जन्य हो सकते हैं , और परमात्म स्वयं त्रिकालज्ञ होते हैं।
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परन्तु आनरेरी आनरेरी , लोकल वादी नहीं। महर्षि लोग ऐसे - ऐसे पदों पर रखे जाय तो कभी अन्याय नहीं हो सकता। परन्तु मैतर नौकर तो होंगे नहीं किसी के ; नहीं हो अन्याय ने लोग , क्यों कि परमात्मा के नौकर हो चुके है हैं इससे उनका स्वामी कौन है ? जिसके वे नौकर बनेंगे यही सुख * * * अंतर्यामी परमात्मा न हे तो कुद कर नहीं सकता सच तो यह है कोर्ट के जनो की तरह से - जैसा सबूत देना तैसा कर देगा। इतना बड़ा अन्याय परमात्मा के यहां नहीं हो सकता है। वह अन्तर्यामी है और व्यापक है। तो व्यापकता मात्र से सत्ता मात्र है वो। व्यापक है तो इसे केवल व्यापकता का अधिष्ठानता है। अधिष्ठान वो कहाता है - जैसे कि - कुर्सी पर हम बैठे हुओ हैं , यह हमारा अधिष्ठेय है। हम अधिष्ठेय हैं। ये सभी हमारा अधिष्ठेय है। अधिष्ठान है ये कुर्सी। इसलिए जहां पर अधिष्ठान एक से जगत में व्यापक है। अधिष्ठान की लक्षण किया है -
" सकला सुर विप्र प्रशानन्भ - अधिष्ठात्दत्तम "
( अधिष्ठानता क्या है ? शत्रु - सत्ता और शोषित ही प्रधानतहि अधिष्ठानता हो।)
सत्ता - सुर्य
, सत्ता - वृक्ष और शरीर में जो हल चल होती है , चेतना करती है थे शोषित है। यदि सत्ता सत्ता सूर्य ही देता हि परमात्मा , की तख्त से जैसे - तखत में कृषक को जोत देते है , बैल में गाड़ी - गाड़ी में२४
बैल को जोत देते हैं लोग ऐसा नहीं जगतृत्व में है। केवल सत्ता कुर्सी देना ही उसकी अधिष्ठानत है
, प्रेरकता है। और यदि कोई कहे कि परमात्मा ही प्रेरक है नहीं है कि जैसे गाड़ी में बैलों को जोत दिये जाते हैं , हल में बैल जोत दिये जाते हैं , इस - प्रकार का प्रेरकत्व नहीं है। केवल सत्ता , कुर्सी देनी ही प्रेरक्त है परमात्मा की। इसी से हमारे यहां जगत को मिथ्या कहते हैं। जगत मिथ्या है , और परमात्मा में ही जगत अध्यक्त है , कल्पित है , कल्पित चीज की सहज सत्ता नहीं होती। ये बात जो हम कह रहे हैं - वेदान्त के सिद्धान्त का अनुवाद कर रहे हैं। क्योंकि अलग दर्शनों का अलग मत है। किन्तु इस समय जो हम बोल रहे हैं ये शुद्ध वेदान्त का विषय है वेदान्त इस प्रकार से मानता है। वो सत्ता , और कुर्सी देना चिन्तन जगत का कार्य है ; और जगत का सचालन जो हो रहा है , ये चैतन्य देव की ही , उसी का गुण है थे। दे खिए इस प्रकार से है - लोग बहुत कहा करते है कि परमात्मा ही सब करवाता है - ऐसी बात नहीं है। परमात्मा किस प्रकार से करवाता है , देखिए जैसे इस - प्रकार - यहां पर शुभ - कर्म अशुभ - कर्म करने के लिए , कही वह किसी को कह नहीं रहा है कि तुम चोरी - डाका करो , या व्यभिचार करो या वर्जित अन्न का सेवन करो या जोग - समाधि करो , ऐसा कुछ भी नहीं कह रहा है केवल इस प्रकार से व्याक्त को ज्ञान हो रहा है। तो शासकत्व जो है केवल ज्ञान है , अज्ञान हो गया आपको अब२५
अपने कर्तव्य - अकर्तव्य का आप् विचार करें। जीव स्वतन्त्र है कर्म करने के लिए जीव कर्म करने में परतन्त्र नहीं। फल भोगने में परतन्त्र है। जीव को कर्म करने में भी परतन्त्र मानोगे तो कि तन्त्र में रहेन्गा
? परमात्मे के तन्त्र में तो रहेगा। परमात्मा जो है उन्ही के अधिकार में है कर्म , उन्ही की प्रेरक्ता से कर्म करता है , तब तो परमात्मै अपराधी होता है , किसी से यज्ञ करवाना - किसी से चोरी करवाना। तो ये तो सब अनर्थ का मूल परमात्मै है। असली जीव कर्त्ता स्वतन्त्र है। कर्म करने में स्वतन्त्र। तब पर्मात्मा * * * कर्ता अलग समझा जाता है। अलग मानना ही पड़ता है। इस प्रकार की , किसी प्रकार की गुलामी नहीं है। केवल आपको सुझाव देता है। इस प्रकार से कि आपको शुभाशुभ कर्म कर सकते हैं। अब हमारे यहां कर्म के सम्बन्ध में केवल पात्र हीं प्रमाण , वेद ही प्रमाण है। पांच प्रकार के कर्म माने गाये हैं। चार तो हि निहित है। एक अविहित है। पांच प्रकार के कर्म हैं।" नित्य कर्म , नैमित्तिक , प्रायश्चित्त , काम्य कर्म, निषिद्ध , नित्य कर्म , नैमित्तिक कर्म , प्रायश्चित्त कर्म , काम्य कर्म "
ये पांच प्रकार के कर्म करने के लिए शास्त्र परन्तु निषिद्ध कर्म करने के लिए शास्त्र कभी भी आदेश नहीं। नित्य कर्म अविहित है। और चार प्रकार - के कर्म
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विहित हैं।
नित्य कर्म क्या है
? - संध्या , वन्दन आदि। संध्या है। द्विजातीय जातक आदि के लिए संध्या है , गायत्री का जप है। पर जो लोग गायत्री जप के अधिकारी नहीं माने जाते वेद - शास्त्रानुसार उनके लिए भगवद् नाम स्मरण ही नित्य कर्म है। उन्हे खाली नहीं रहना है , बल्कि ये ही कोई भगवान का नाम जपना चाहिए। नित्य कर्म , प्रातः कालः उठो , पृथ्वी को नमस्कार करो ," कालः सत्तं समस्तमेव।"
नित्य ही प्रातःकाल उठ कर के पृथ्वी को वन्दन करो। तब पृथ्वी पर चरण धरो। उसको नमस्कार कर के। यह हमारे यहां भारत की जो है सभ्यता है। दिन भर पृथ्वी पर रहना है आपको
, मल , मूत्र आदि करना है। सारा प्रपंच आपको पृथ्वी के ऊपर करना है। इस वास्ते पृथ्वी को नमस्कार पहले। पृथ्वी के पश्चात यदि माता - पिता जीवित हैं तो माता की चरण - स्पर्श करो , पिता का चरण स्पर्श करो -" ंआत्रु देवो भव , पित्रु देवो भव "
माता - पिता का वन्दन करो। इसके पश्चात्
" आचार्य देवो भव् "। शुरु यदि हैं तो उनका चरण स्पर्श करो। नहीं हैं तो उनके शिष्य नमस्कार करो। शिष्य भी नहीं है तो मानसिक प्रणाम करो जिसके अभी तक गुरु नही है , तो भगवान तो " गुरुर्र ब्रह्मा , गुरुर्विष्णु , गुरुर्देवो महेश्वरः गुरुः साक्षात् प्रब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः "२७
ये सब
, सबका शुरु का शुरु परमात्मा ब्रह्म ही है उनको प्रणाम करो। ये हमारे यहां का नित्य कर्म है। ये माता का वन्दन करना , पिता का वन्दन करना। क्या होगा माता - पिता पुत्र के वन्दन करने से बहुत बड़े मोरे - फूले नहीं हो जाते। पुत्र जा के माता का चरण स्पर्श करे तो माता जो है बहुत लम्बी - चौड़ी नहीं हो जाती है। वो प्रसन्न हो जाती है। आशीर्वाद देवी है। तब उसके आशीर्वाद से पुत्र जो है तब आगे बढ़ता है अपने कार्यों में। जीव को आशीर्वाद लेना चाहिए। पहले माता का आशीर्वाद लो उसके पश्चात पिता का आशीर्वाद। फिर आचार्य का आशीर्वाद लो। ये आशीर्वादों से आप लोगों की वृद्धि होगी। इसलिए , अब इस पर कोई उदाहरण देना है आशीर्वाद ही से हम कैसे माने कि हमको उदाहरण क्या है कि केवल आशीर्वाद ही से हमारा कल्याण हो जायगा। तो हम उदाहरण देते हैं कि जैसे कमठ , कूर्मि और मत्स्य - - - - -
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