updated 26th November 2007 

Excerpt of article in  कल्याण  'Kalyana' - a magazine of the Gita Press, originally published in 1946.
(Typed into Itrans on 21st September 2005 & posted at:-
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गोधन

भगवत्पूज्यपाद अनन्तश्रीविबूषित जगद्गुरु श्रीशङ्कराचार्य ज्योतिष्पीठाधीश्वर श्री ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज क उपदेश )

धमशास्त्र में गोधन का विशेष माहात्म्य बतलाया गया है। लिखा है -

सर्वेषामेव भूतानां गावः शरणमुत्तमम्।

हिन्दू - संस्कृति इस भावना से परिपूर्ण है कि -

यद्‌गृहे दुःखिता गावः स याति नरके नरः।

किन्तु जब से पाश्चात्त्यों की सभ्यता - संस्कृति का हमारी सभ्यता - संस्कृति के साथ सम्मिश्रण हु‍आ है , तब से भारतीय शिक्षा - विधान के लोप होने से अधिकांशतः शास्त्र - पुराणादि की अनभिज्ञता के कारण गो - ब्राह्मण आदि के प्रति शास्त्रीय धार्मिक बुद्धि का लोप - सा हो गया है।

गोवंश आज व्यावहारिक उपयोगिता की हृष्टि से भौतिक तुला पर तौला जा रहा है किन्तु स्मरण रहे कि आज का भौतिक विज्ञान गोवंश की उस सूक्ष्मातिसूक्ष्म धरमोत्कृष्ट उपयोगिता का पता ही नहीं लगा सकता , जिसे भारतीय शास्त्रकारों ने अपनी दिव्यद्रिष्टि से प्रत्यक्ष कर लिया था। गोवंश की धार्मिक महानता उसमें जिन सूक्ष्मातिसूक्ष्म कारण - रूप तत्त्वों की प्रखरता के कारण है , उनकी खोज और जानकारी के लिये आधुनिक वैज्ञानिकों के भौतिक यन्त्र सदैव स्थूल ही रहेंगे। यही कारण है कि बीसवीं सदी का प्रौढ़ विज्ञानवेत्त भी गोमाता के लोम - लोम में देवता‍ओं के निवास का रहस्य और प्रातः गोदर्शन , गोपूजन , गोदेवा आदि का वास्तविक तथ्य समझने में असफल रहता है। गोधन का धार्मिक महत्त्व भाव - जगत से सम्बन्ध रखता है और वह या तो ऋतम्भरा प्रज्ञाद्वारा अनुभवगम्य है अथवा शास्त्रप्रमाणद्वारा जाना जा सकता है , भौतिक यन्त्रोंद्वारा नहीं।

धमशास्त्र तो गोधन की महानता और पवित्रता का वर्णन करता ही है , किन्तु भारतीय अर्थशास्त्र में गोपालन का विशेष महत्त्व है। कौटिलीय अर्थशास्त्र में गो - पालन और गो - रक्षण का विस्तृत विवरण मिलता है। जिस भूमि में खेती न होती हो , उसे गोचर बनाने का आदेश अर्थशास्त्र का ही है। इस प्रकार गोधन ' अर्थ ' और' धर्म ' दोनों का प्रबल पोष क है। अर्थ से ही काम कामना‍ओं की सिद्धि होती है और धर्म से ही मोक्ष की। अत‍एव गोधन से अर्थ , धर्म , काम , मोक्ष - चारों की प्राप्ति होती है। इसीलिये भारतीय जीवन में गोधन का इतना ऊँचा माहात्म्य है। जो हिंदू धर्मशास्त्र पर विश्वास रखते हैं , उन्हें चाहिये कि चतुर्वर्ग - फल - सिद्धयर्थ शास्त्रविधान के अनुसार गो सेवा करते हु‍ए गोधन की वृद्धि करें और जो धर्मशास्त्र पर आस्था नहीं रखते , उन्हें चाहिये कि ' अर्थ ' और ' काम ' की सिद्धि के लिये अर्थशास्त्र के नियमों के अनुसार गोपालन करते हु‍ए गोवंश की वृद्धि करने का प्रयत्न करें।

प्रल्यक्षवादियों के लिये इससे अधिक गोमाता की दयालुता हो ही क्या सकती है कि वह सूखे तृण भक्षण करके जन्म भर उन्हें दुग्ध - घृत - जैसे पौष्टिक द्रव्य प्रदान करे। इतने पर भी यदि वे गोमाता के कृतज्ञ हु‍ए , तब तो उन में मानवता का लेश भी नहीं माना जा सकता। गोमाता के द्वारा मानवसमाज को जो लाभ है , उसे पूर्णतय व्यक्त करने के लिये सहस्रों पृष्ठों की क‍ई पुस्तकें लिखनी होंगी। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि गोमाता से मानवसमाज को जो लाभ है , उससे मानवजाति गोमाता की सदा ऋणी रहेगी।

वध आदि हिंसक उपायोंद्वारा गोवंश का ह्रास करना धार्मिक और आर्थिक दोनों हृष्टियों से राजा - प्रजा दोनों के लिये हानिकर है। अत‍एव ऐसी भय्ंकर प्रथा‍ओं को सर्वथा रोकने का प्रयत्न सभी को करना चाहिये। क‍ई देशी रजवाड़ों ने इस सम्बन्ध में प्रशंसनीय कार्य किया है किन्तु जबतक केन्द्रीय सरकार को इसके लिये बाध्य नहीं किया जायगा , तबतक सन्तोष - जनक परिणाम असम्भव - सा प्रतीत होता है। इसके लिये देशव्यापी यथेष्ट प्रयत्न होना चाहिये।

साथ - ही - साथ प्रत्येक गृह में गोपालन की प्राचीन प्रथा को बढ़ाने का प्रयत्न भी सभी सद्गृहस्थों को करना चाहिये। तालुकेदारों , जमींदारों , सेठ - साहूकारों आदि को चाहिये कि गोशाला‍ओं की वृद्धि करें , जहाण् से आदर्श हृष्ट - पुष्ट गौ‍ओं और बैलों की प्राप्ति हो सके। गोचर भूमि के सम्बन्ध में आज कल की व्यवस्था अत्यन्त शोचनीय है। इस सम्बन्ध में मनुजी ने लिखा है - ' प्रत्येक गाण्व और शहर के चारों ओर काफी गोचर भूमि छोड़नी चाहिये।' सभी समर्थ किसानों , जमींदारों और सेठ - साहूकारों को अपने - अपने केन्द्रों में गोचर भूमियों चाहिये। इसी में भारत और भारतीय सभ्यता का गौरव तथा सच्चा स्वार्थ निहित है। का यथोचित्र प्रबन्ध करना चाहिये। और गोधन की वृद्धि का सदैव ध्यान रखना चाहिये। इसी में भारत और भारतीय सभ्यता का गौरव तथा सच्चा स्वार्थ निहित है।